उपेन्द्र राय, एडिटर और न्यूज डायरेक्टर सहारा इंडिया न्यूज नेटवर्क
1 जून, 2000 को लखनऊ में राष्ट्रीय सहारा से कॅरियर की शुरुआत करने के बाद राष्ट्रीय सहारा के सबसे कम उम्र के ब्यूरो चीफ बनकर मुंबई पहुंचे। साल 2002 में स्टार न्यूज की लॉन्चिंग टीम का हिस्सा बन गये और दो साल से भी कम समय में वरिष्ठ संवाददाता बनने का मौका मिला।
वहीं से सीएनबीसी टीवी 18 में 10 अक्टूबर, 2004 को प्रमुख संवाददाता के रूप में ज्वाइन किया. बतौर विशेष संवाददाता अक्टूबर 2005 में स्टार न्यूज़ में वापसी की। और दो वर्षो के अंदर एक और प्रोन्नति मिली और चैनल में सबसे युवा एसोसिएट एडिटर बने गये।
बिजनेस, राजनीति और मनोरंजन की बीट पर बराबर की दखल रखने वाले उपेंद्र राय ने अपनी रिपोर्टिंग के जरिये कई कारनामों को उजागर किया। इसका इनाम भी इन्हें मिला जिनमें स्टार अचीवर अवार्ड 2006, स्टार पत्रकार रत्न अवार्ड 2007, बेस्ट रिपोर्टिंग के लिए नेशनल टेलीविजन अवार्ड 2007, लॉयन्स गोल्ड अवार्ड 2008 और साल 2010 में भरोसा पत्रकार सम्मान। 1 जनवरी 2010 से सहारा इंडिया न्यूज़ नेटवर्क में एडिटर और न्यूज डायरेक्टर की जिम्दारी को सबसे बड़ी चुनौती मानने वाले उपेंद्र राय से सहारा मीडिया की आगामी योजनाओं और मीडिया के कुछ ज्वलंत मुद्दो पर बातचीत की समाचार4मीडिया के वरिष्ठ संवाददाता हरेश कुमार और संवाददाता रण विजय प्रताप सिंह ने।
प्र. माना जाता है कि सहारा मीडिया के पास जितने संसाधन हैं अगर उसका पूरा इस्तेमाल हो, तो वह देश का सबसे बड़े मीडिया हाउस में शुमार हो सकता है , कहां कमी रह जाती है
उ. देखिए, सहारा परिवार ने जब मीडिया, इंटरटेनमेंट और न्यूजपेपर इन सभी विधाओं के बारे में विचार शुरू किया तब मुझे लगता है कि देश में बहुत कम अखबार और टीवी चैनल थे. टीवी चैनल तो न के बराबर थे। सहारा टीवी नेटवर्क की स्थापना तकरीबन 1992 में मुंबई में हुई। सहारा श्री ने तभी कहा था कि जब मैं न्यूज़ चैनल खोलूंगा तो लगभग जितनी भाषाएं हमारे देश में बड़े पैमाने पर बोली जाती हैं मैं उसमें अपना पब्लिकेशन और न्यूज चैनल शुरू करने की कोशिश करुंगा। 15 अगस्त 1991 को राष्ट्रीय सहारा की शुरुआत हुई। 16 फरवरी 1992 को लखनऊ में प्रिंट एडिशन लॉन्च हुआ उसके बाद अभी हमारे पास राष्ट्रीय सहारा के छ: एडिशन है जिसे हम छ: जगहों से छापते हैं और 49 जगहों से सर्कुलेट करते हैं। मुझे नहीं लगता कि छ जगहों से छपकर किसी अखबार का 49 एडिशन जाता होगा। उर्दू अखबार हम दस जगहों से छापते हैं और उर्दू के करीब 17 से ज्यादा एडिशन हमारे पास हैं। टेलीविजन में पांच रीजनल चैनल हैं और ये रीजनल चैनल है उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड, बिहार-झारखंड, एमपी-छत्तीसगढ़, एनसीआर- हरियाणा और मुंबई। एक नेशनल चैनल है समय। लेकिन संसाधनो की जो बात आपने की उसमें जरूर कहूंगा कि जब मुझे सहारा मीडिया के नेतृत्व की जिम्मेदारी दी गई तब यह बात मुझे भी महसूस हुई कि संसाधन हमारे पास बहुत हैं और इतने संसाधनों से दो और नए चैनल चलाए जा सकते हैं। उसका बेहतर उपयोग मैने सुनिश्चित किया है और हमारे चैयरमैन साहब ने उसमें बहुत सहयोग दिया और बहुत हौसला अफजाई की। हमने एक उर्दू नेशनल चैनल का सॉफ्ट लॉन्च किया है और मुझे लगता है कि 1 अक्टूबर से यह मार्केट में आ जाएगा और इसे देश में हीं नहीं, बल्कि दुनिया के करीब 66 देशों में देखा जा सकेगा। जो संसाधन हमारे पास थे हमने उन्हीं का इस्तेमाल किया। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि न तो हमने इसके लिए एक कैमरा खरीदा, न ही हमने स्विच खरीदा और न ही हमने पीसीआर में इस्तेमाल होने वाले कोई इंस्ट्रूमेंट खरीदा। जो उपलब्ध संसाधन हैं उसी का बेहतर इस्तेमाल करके हम एक नया चैनल लॉन्च कर रहे हैं। और इसके आलावा एक और नया चैनल खोलने की हमारे पास योजना है जिसके बारे में जल्द ही हम चेयरमैन साहब से दिशा-निर्देश लेंगे और आगे बढ़ेंगे। हम बनारस से प्रिंट एडिशन 1 नवंबर को मार्केट में लाने जा रहे हैं। बनारस के तुरंत बाद आगरा एडिशन और उसके बाद मुंबई और फिर बंगलुरू एडिशन लॉन्च करने की योजना है। सहारा की वेबसाइट को बेहतर बनाया. राष्ट्रीय सहारा का ई-पेपर पर नहीं था उस दिशा में काम किया गया। हमारी मैगजीन सहारा टाइम का ई-मैगजीन वर्जन नहीं था। उसका ई-वर्जन लॉन्च किया। इसके अलावा उर्दू भाषा में हमारा एक और अखबार लंदन से निकलने जा रहा है बहुत जल्द इस दिशा में काम शुरू होने वाला है। मुझे लगता है कि लंदन में जितने उर्दू अखबार छपते हैं उनमें पहले दिन से ही हमारा अखबार सबसे बड़ा अखबार हो जाएगा।
प्र. अगर न्यज चैनल की बात करें तो सहारा के रीजनल चैनल खबरों को ब्रेक करने के लिए जाने जाते थे और कई बार नामी-गिरामी नेशनल चैनल उसकी खबरों को फॉलो करते नजर आते थे, लेकिन यह क्रम बहुत बड़ा रुप नही ले पाया। इसकी क्या वजह है?
उ. मई तक की जो स्थिति थी, आप जो बोल रहे हैं मैं उसे मानता हूं कि थोड़ा डिटोरिएशन था. 6 मई के बाद जबसे मुझे इस मीडिया वेंचर का कार्यभार दिया गया, और मैं इसे स्वतंत्र रूप से देख रहा हूं तब से ऐसा नहीं हैं. हमारे नेशनल चैनल ‘समय’ की जो टीआरपी थी वो ढ़ाई से तीन के बीच थी, जीआरपी पांच थी और हमारी पहुंच 9.5 मिलियन थी। अब मैं कह सकता हूं कि हमारी पहुंच 22 मिलियन की है। जीआरपी हमारी 13 से उपर है और चैनल शेयर हमारा 6 फीसदी के करीब है। पहले हम चौंदहवें-पंद्रहवें नंबर के चैनल थे अब हम टॉप 8 में हैं और एक बार हम टॉप 5 में भी आ चुके हैं। रीजनल चैनल की बात करें तो हमारा एमपी चैनल पिछले तीन महीनें से नंबर वन है और एमपी मार्केट में करीब 54 फीसदी शेयर हमारे पास है। हिंदी भाषी मार्केट में अगर आप जोड़ना चाहें तो हमारे नेशनल चैनल की जीआरपी 13 के करीब है। एमपी चैनल की जीआरपी 23 की है। यूपी चैनल की जीआरपी 12 की है और बिहार की जीआरपी 15-16 की है। इस हिंदी भाषी मार्केट में रीजनल और नेशनल मिलाकर 60 फीसदी शेयर हमारा अकेले बनता है। तो हम कह सकते हैं कि हमने पिछले तीन महीनों में हमने जबर्दस्त बढ़ोतरी हासिल की है। इन्हीं दिनों रेवेन्यू के ग्रोथ में भी हमने जो हासिल किया है इसके पहले सहारा न्यूज के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ था। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि गाड़ी अब हाइवे पर आ गई है और दौड़ रही है।
प्र. अभी आपने कहा कि एक बार आप पांचवे नंबर पर आ गए थे फिर इसे बरकरार क्यों नहीं रख पाए?
उ. उस सप्ताह कई चैनल एक ही रैंकिंग पर थे। इंडिया टीवी नंबर एक पर था, वहीं स्टार न्यूज और आजतक एक साथ नंबर दो पर थे आइबीएन-7 और जी न्यूज़ एक ही रैंकिग पर थे इसमें पांच चैनल टॉप थ्री में एक साथ आ गए उससे हमारी रैंकिंग थोड़ी ऊपर हो गयी। फिलहाल हमारा चैनल टॉप 7-8 में हैं जो चार महीने पहले 16-17 पर था।
प्र. यहां चार महीने में आप टॉप फाइव में आ चुके हैं तो अब टॉप थ्री को लेकर क्या योजनाएं चल रही हैं?
उ.देखिये, जो भी चैनल हेड होता है या जिसको प्रोजेक्ट मिलता है वह चाहता है कि उसका चैनल टॉप पर हो। मैं भी यही चाहता हूं। लेकिन हम लोग ग्रामीण पृष्टभूमि के हैं। वहां कहावत है कि हथेली पर सरसो नहीं उगता है, अगर बहुत लंबे समय से चैनल पिछड़ा हुआ है और जीआरपी, टीआरपी उस तरह से नही मिल पा रही है और सब चीजों में आमूल-चूल परिर्वतन की जरुरत है और परिस्थियां ऐसी हैं कि बहुत सारे लोग जिसमें कुछ ऐसे लोग भी हैं जो उस टाइम फ्रेम में काम नहीं कर पा रहें हों। या उस वातावरण में काम करने की आदत नहीं हैं। तो जाहिर सी बात है कि वे लोग नएपन का स्वागत नहीं करना चाहते और उसमें कहीं न कहीं एक विरोध होता है और कई बार ये प्रतिरोध मुंह से नहीं होता, बल्कि साइलेंटली होता है। बॉडी लैंग्वेज से होता है। काम में असहयोग करके होता है। सब तरह की चीजें हैं लेकिन मैं ये कह सकता हूं कि इस मामले में मैं बड़ा सौभाग्यशाली हूं कि मैने जितना चाहा इन दिनों में उतना मुझे पूरा-पूरा रिजल्ट भी मिला। लिहाजा एक बात तो मैं कह सकता हूं कि अगर मैं दसवीं सीढ़ी पर खड़ा हूं तो दशवीं पर हूं। पीछे जाने का दिन नहीं देखना पड़ा। आगे हमें कैसा करना है इस पर हम लगातार विचार कर रहे हैं। क्योंकि टेलीविजन इंडस्ट्री में इतनी गला-काट प्रतियोगिता है। आप कोई भी नया सॉफ्टवेयर या प्रोग्राम लेकर आते हैं तो लोग अगले ही दिन मार्केट में उसकी काट खोजनी शुरू हो जाती है। तो जाहिर सी बात है कि न्यूज के क्षेत्र में दर्शक को बांधे रखना रखना बड़ी चुनौती है। बाजार का भी दबाव है। कई बार लगता है कि कंटेंट हम नहीं बाजार तय करता हैं? जैसे एक छोटा उदाहरण दे रहा हूं। अगर आप एक छोटे बच्चे के सामने माजा की बोतल रखिए और चार ताजे ताजे आम रखिए तो छोटा बच्चा आम की अहमियत नहीं जानता । वह देखता है कि माजा की बोतल में कैसे एक परी आती है और उसमें घुस जाती है तो उसको वो सब चीजें ज्यादा आकर्षित करती हैं। तो ताजा आम रिजेक्ट हो जाता है और माजा की बोतल बच्चा पकड़ लेता है। तो कहीं न कहीं बाजार इतनी तेजी से अपनी जगह बना रहा है कि आप बहुत अच्छी-अच्छी स्टोरी भी लेकर आते हैं तो दर्शक उसे रिजेक्ट कर देते हैं। मैने कोशिश की है कि जो न्यूज मेकर की मुख्य जिम्मेदारी है उसमें मैं न्याय कर सकूं। मैं मानता हूं कि जो भी न्यूज मेकर्स हैं उनको इतना एकाउंटेबल होना चाहिए कि जब कोई भी सवाल करे तो जनता के सामने उसे ईमानदारी से रख सकें।
प्र.आप जहां भी रहे वहां बड़ी स्टोरी ब्रेक करने के लिए जाने जाते रहे हैं। यहां भी यह कोशिश जारी है.
उ. कोई भी रिपोर्टर अपनी बीट पर या समाज में घट रही घटनाओं पर नजर रखे तो उसके लिए बड़ी स्टोरी ब्रेक करना मुश्किल नहीं है। लेकिन होता क्या है कि जो चीजें अखबार में छपती हैं उसे हम मान लेते हैं कि वह हमारे लिए नहीं हैं। वो किसी और के लिए है। अखबार में छपा तो उसमें क्या रखा है। लेकिन मुझे हर वक्त लगता था और अभी भी लगता है और जिसे मैं अभी भी प्रैक्टिस में रखता हूं कि खबर के पीछे भी खबर होती है अगर आप उसकी तलाश करें तो खबर अखबार में छपने के बाद भी उसमें चार बातें जरुर पता चलती हैं। मैं मुंबई पहली बार 99 में गया था उसके बाद जून 2000 में वहां शिफ्ट कर गया। वहां मैने ब्यूरो इंचार्ज के रुप में काम किया, फिर ‘स्टार न्यूज’ में आया। वहां मेरी नियुक्ति असाइनमेंट डेस्क पर हुई। मैने असाइनमेंट से रिपोर्टिंग में जाने के लिए बड़ी मेहनत की और यह साबित किया कि मैं रिपोर्टिंग के लायक हूं तमाम ऐसी खबरों के बारे में जब मीटिंग हो रही होती थी और रिपोर्टर बता रहे होते थे तो मैं ये जानता था कि ये मेरा काम नहीं है फिर भी मैं बोल पड़ता था कि खबर ऐसे नहीं, ऐसे करना चाहिए और ऐसे ही बात-बात में ही एक ऐसी बात आई तो किसी ने कहा कि आप करके दिखा सकते हैं क्या? तो मैंने कहा कि मैं बिलकुल इससे अच्छा करके दिखा सकता हूं। तो मैने इस चैलेंज को स्वीकार किया। पहले टैक्सेशन, इनफोर्शमेंट एजेंसीज के बारे में महीनें में एक-दो खबरें छपा करती थी लेकिन मैंने इसे एक बीट के रूप में डेवलपमेंट करने का काम किया और ‘स्टार न्यूज’ में रहते हुए मैंने बीस से भी अधिक ऐसी बड़ी खबरें की जो देश में हीं नही पूरी दुनिया में जानी गईं जिनमें से एक खबर मैं गिना सकता हूं जिसके लिए मुझे जुलाई 2007 में एनटी अवार्ड भी मिला था। स्विस बैंक में जो ब्लैकमनी जमा होने की बात की जाती है मेरे ही स्टोरी के बाद भारत सरकार ने पहल की और मेरी ही स्टोरी के बाद रामजेठमलानी ने एक पीआईएल फाइल किया सुप्रीम कोर्ट में। इसके बाद पहली ऐसी आधिकारिक बातचीत हुई भारत सरकार और स्वीटजरलैंड के बीच कि स्विस बैंक में खाते हैं और ब्लैकमनी है. इसका ऑफिसियल कन्फरमेशन आया। स्विस सरकार ने स्वीकार किया कि बहुत खाते हैं स्विस बैंक में और इनका डिटेल मिलेगा भारत सरकार को स्विस सरकार की तरफ से। यह मेरे जीवन की बड़ी खबर है जिसको मैने ‘स्टार न्यूज’ में रहकर किया। अमिताभ बच्चन के टैक्सेशन विवाद पर मैने नवंबर 2005 से लेकर जून 2006 तक उसके जितने भी डेवलपमेंट थे 10-15 किस्तों में उस खबर को प्रसारित किया। उसके बाद पहली बार लोग इस विवाद को अधिकारिक रुप से समझ पाए कि अमिताभ बच्चन का सेंट्रल सर्किल में क्यों असेसमेंट होता है। ये पूरा मामला क्या था, अभिताभ बच्चन से टैक्स वसूलने का और अभिताभ बच्चन की क्या देनदारियां है उसको मैंने डिटेल्स में पेश किया लोगो के सामने। इन खबरों को अच्छा रिस्पांस मिला इस तरह की और भी खबरों की लिस्ट है। खबर जिससे भी प्राप्त की पूरी ईमानदारी से उसे लोगों के सामने रखा। कई बार होता था कि खबर गिरा दी जाती थी, मैं उस खबर की अहमियत को साबित करता था कि यह खबर जरूरी है, चैनल के इंटरेस्ट में यह सही है और 99 फीसदी मामलों में मैं सही साबित होता था। विरोध करने वाले और उस खबर को ड्रॉप करने वाले गलत साबित होते थे।
प्र.न्यूज चैनल की बात करें तो कंटेंट और टीआरपी बटोरू कार्यक्रमों में आप किसे प्राथमिकता देंगें?
उ.मैं तो हमेशा कंटेंट के साथ खड़ा रहना चाहता हूं और मुझे लगता है कि टीआरपी और जीआरपी वैसे ही है जैसे कोई आदमी मेकअप करके अपने चेहरे के दाग-धब्बों को कुछ देर के लिए छिपा लेता है लेकिन अंतत: कंटेंट और समाज की आवाज बनने का जिम्मा मीडिया पर है। वही शाश्वत है और रहेगा। क्योंकि टीआरपी और जीआरपी एक पैमाना हो सकता है चैनल की सफलता और असफलता की। लेकिन समस्या को, किसी की तकलीफ को, किसी के मन के अंदर की पीड़ा को मापने का पैमाना नहीं है ये। अगर आप ये दिल से महसूस करते हैं कि यहां मेरे कैमरे का लेंस खुलना चाहिए मुझे ईमानदारी से इसका कवरेज देना चाहिए और इसे ऑन एयर देना चाहिए, तो आखिर हमारे पास क्या प्रोडक्ट है हमारे पास प्रोडक्ट ही यही है। अगर हम किसी भी चीज को कवर करते हैं समाज के लिए उसका पैकेज करते हैं, उसको ऑन एयर ले जाते हैं, हम किसके लिए ले जाते हैं अंतत: अगर यह सवाल पूछा जाय? तो यही उत्तर मिलता है कि समाज के हक में है। समाज के भले के लिए है, देश के लिए है। मैं तो हमेशा कंटेंट के साथ खड़ा रहा हूं, खड़ा हूं और खड़ा रहूंगा। हां ये जरूर है कि रास्ते में टीआरपी, जीआरपी से भेंट हो जाती है।
प्र.लेकिन विज्ञापन तो टीआरपी से ही आता है?
उ.हां मैं बिलकुल ये मानता हूं कि विज्ञापन टीआरपी से आता है लेकिन विश्वसनीयता से भी आता है। विश्वसनीयता एक बहुत बड़ी चीज होती है। अगर मार्केट में आपकी विश्वसनीयता नहीं है तो जाहिर सी बात है कि आपको विज्ञापन नहीं मिलेंगे। कुछ ऐसे चैनल है जिनके पास टीआरपी है, लेकिन वे लोग टीआरपी वालों से भी कम बिजनेस करते हैं।
प्र. मार्केटिंग और एडिटोरियल में अपनी श्रेष्ठता को लेकर बराबर रस्साकस्सी चलती रहती हैं। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?
उ.इन दोनों चीजों को अलग-अलग करके नहीं समझा जा सकता है। दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हैं। होता क्या है कि एक प्रोडक्ट है और प्रोडक्ट फैक्टरी में बनता और ब्रांड इमेज दिमाग में बनती है। अगर अच्छा प्रोडक्ट होता है तो जो मार्केटिंग के लोग हैं वो आपकी ब्रांड इमेज को बेचकर विज्ञापन लाते हैं। तो ब्रांड बनता कैसे है? अगर अच्छा संपादकीय नहीं होगा, तो मार्केटिंग और सेल्स के लोग क्या बेचेंगे? उसी तरह ब्रांड इमेज बनाने का काम मार्केटिंग और सेल्स के लोग करते हैं। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जहां दोनों एक साथ काम करते हैं संस्थान काफी आगे जाता है और अगर कहीं दोनों के बीच में अनबन है तो नुकसान संस्थान का ही होता है।
प्र.सहारा मीडिया के पास प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक, दोनो माध्यम मौजूद हैं इसे आप ताकत मानते है या कमजोरी
उ. मैं तो इसे ताकत ही मानता हूं कमजोरी तो मैं इसे बिलकुल नहीं कहूंगा। क्योंकि यह देश में इकलौता ऐसा मीडिया हाउस है जिसके पास ऊर्दू और हिंदी अखबार है, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी है और यहां तक कि मैगजीन भी है, सहारा टाइम मैगजीन है, ऊर्दू में भी दो मैगजीन है, ‘सहारा बज्मी’ और ‘सहारा अल्मी’। इसको ताकत मैं इस सेंस में मानता हूं कि एक छोटा उदाहरण है। कोई खबर हमारे टेलीविजन पर चलती है और उस खबर को हम अपने अखबार में जगह देते हैं तो उस खबर का इंपैक्ट उस खबर की धमक और लोगो के भरोसा को बनाये रखने के लिए ये माध्यम बहुत ज्यादा सहयोग देता है। क्योंकि टीवी में खबर चली और टीवी एक ऐसा मीडियम है जिसमे जब खबर जब घटती है उसी क्षण चलती है । लेकिन अखबार एक ऐसा मीडियम है जिसमे घटना होने के 24 घंटे के बाद ही उसमे छप कर आती है। एक दिन बाद, तो जब कोई खबर हमें बड़े पैमाने पर ले जाना होता है, बड़े पैमाने पर महत्व देना होता है। तो हम इस रास्ते को अपनाते हैं। तो समाज के हक में, देश के हक में, एक आम आदमी के हक में आम आदमी की आवाज को और ज्यादा मजबूती से बुलंद कर पाते हैं। जो बाकी किसी मीडिया हाउस के पास नहीं है, विशेषकर हिंदी मीडिया में। अगर इतिहास पर नजर दौड़ाएं तो सहारा मीडिया इस तरह के कॉन्सेप्ट के साथ बाजार में उतरने वाला पहला ग्रुप है। इसे मैं कमजोरी न मानते हुए ताकत मानता हूं।
प्र.विवादों से टीआरपी बटोरने वाला मीडिया पिछले कुछ समय से खुद विवादों में रहा है। कभी सेल्फ रेगुलेशन की बात चलती है तो कभी कुछ और। इसे किस रुप में देखते हैं।
उ.देखिए इसे मै दो तरह से देखता हूं। अगर प्रेस की आजादी को छीनने की दिशा में सरकार काम करेगी तो मुझे लगता है कि यह स्वस्थ लोकतंत्र के लिए कहीं से भी जायज नहीं होगा। लोकतंत्र के सभी अंगो में भ्रष्टाचार का दीमक लग चुका है। और बहुत गहराई से विश्लेषण किया जाए तो वक्त-वक्त पर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को लेकर इस तरह की बातें आती रहती है। लेकिन प्रेस ही एक ऐसी शक्ति है जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करके आज भी अपने दामन को बहुत हद तक बचाये हुए है।
दूसरी बात मीडिया की ताकत लोकतंत्र की दी हुई ताकत है, इस देश की व्यवस्था की दी हुई ताकत है। हालांकि चैनल चलाने का लाइसेंस सरकार ने ही दिया है। लेकिन जब सरकार को भी कुछ कहना होता है तो सूचना और प्रसारण मंत्रालय के जरिये संपादकों की मीटिंग बुलाकर वह भी निवेदन करती है। जरूरत पड़ने पर सरकार विश्वास में लेकर ही काम करती है। कॉमनवेल्थ खेल को लेकर सरकार ने मीडिया से सहयोग मांगा। यह एक अद्वभुत बात है खासकर जब हम अपने कुछ पड़ोसी देशों पर नजर डालें। क्योंकि आप उन जगहों पर इतनी स्वतंत्र पत्रकारिता नहीं कर सकते। वहां सरकार की योजनाओं की आप इस तरह आलोचना नहीं कर सकते है। ये लोकतंत्र की ही देन है कि आप यहां सरकार की आलोचना इतने उन्मुक्त तरीके से कर लेते हैं। लिहाजा सेल्फ रेगुलेशन बेहतर विकल्प है वरना आप खुद पर नियंत्रण नही रखेंगे तो कोई और हाथ आप पर नियंत्रण के लिए बढ़ेगा और यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक होगा।
प्र. आपने मीडिया में काम करते हुए एमबीए किया इसकी क्या वजह रही? कहीं मीडिया से वैराग्य तो नहीं आ गया था?
उ. अरे नहीं भाई जिस राग को गाते हुए मैं गांव से यहां तक पहुंचा उससे वैराग्य कैसा? बात ऐसी है कि उस समय मुंबई में नरसी मुन्जी इंस्टीट्यूट में वर्किग प्रोफेशनल्स के लिए नया कोर्स लॉन्च हुआ था जो काफी सुविधाजनक था लिहाजा मैने कर लिया।
प्र. मीडिया अक्सर आलोचना करती है और आलोचना का शिकार भी बनती है लेकिन मीडिया में रहते हुए आप आलोचकों को किस नजरिये से देखते हैं।
उ.देखिए आलोचक आपके “कन्फ्यूज्ड प्रशंसक’ होते हैं उनको लेकर ज्यादा चिंता नहीं करनी चाहिए मेरा मानना हैं कि कहीं न कहीं वे आपकी कमियों को उजागर करके आपको भूल सुधार का मौका देते हैं।
टिप्पणी
उपेन्द्र राय जी आपने बिलकुल
उपेन्द्र राय जी आपने बिलकुल ठीक कहा कि आलोचक कन्फ्यूज्ड प्रशंसक होते है...और जितने आपके आलोचक होंगे उतना ही आप निखर कर सामने आएंगे तभी तो कबीर ने भी कहा है कि अयोध्या विवाद पर फैसले को लेकर लखनऊ हाई कोर्ट की सुरक्षा कड़ी की गई। लखनऊ के कैसरबाग बस अड्डे को खाली कराया गया।
निंदक नियरे राखिये, आंगन कुटी छवाय