समाचार4मीडिया पर साल भर में सर्वाधिक पढ़ा गया इंटरव्यू ।
टेलीविज़न न्यूज़ इंडस्ट्री में विनोद कापड़ी का नाम ख़बरों की रफ़्तार और टीआरपी दोनों ऊंची बनाए रखने के लिए जाना जाता है। आंध्रप्रदेश के सिकंदराबाद में जन्मे और उत्तराखंड से ताल्लुक रखने वाले कापड़ी 38 साल की उम्र तक टीवी पत्रकारिता में अहम मुकाम बना चुके हैं। अभिनव प्रयोगों में माहिर और न्यूज़ टेलीविज़न की दशा-दिशा बदलने में इनका ख़ासा योगदान रहा है। विनोद कापड़ी ने अपने पत्रकारिता कॅरियर की शुरुआत 1992 में दैनिक जागरण बरेली से बतौर ट्रेनी रिपोर्टर की, उसके बाद वे 1993 में अमर उजाला बेरली-मुरादाबाद पहुंच गए। वहां दो साल काम करने के बाद 1995 में दिल्ली पहुंचे जहां ज़ी न्यूज के साथ ट्रेनी रिपोर्टर के तौर पर जुड़ गए। ज़ी न्यूज में ही विनोड़ कापड़ी को प्रमोट कर आउटपुट एडिटर बना दिया गया। ज़ी न्यूज में 2004 तक रहने के बाद उन्होंने स्टार न्यूज की ओर रुख किया, जहां तीन साल तक डिप्टी मैनेजिंग एडिटर के तौर पर काम किया। 2007 में इंडिया टीवी से जुड़ने के बाद यहां मैनेजिंग एडिटर की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। इंडिया टीवी की लोकप्रियता और पत्रकारिता से जुड़े मुद्दों पर विनोद कापड़ी से बातचीत कर रहे हैं समाचार4मीडिया के असिस्टेंट एडिटर नीरज सिंह और संवाददाता आरिफ खान मंसूरी...
हिंदी न्यूज को खास से आम तक ले आने में इंडिया टीवी और खासकर विनोद कापड़ी की बड़ी भूमिका रही। यह आइडिया कहां से आया ?
देखिए, न्यूज टेलीविजन की जब से शुरुआत हुई मतलब 1995 से लेकर तकरीबन 1999 तक टेलीविजन बड़े ही ट्रेडिशनल तरीके से चल रहा था। ऐसा नहीं है कि इसके पीछे कोई सोच थी कि टीवी को बदलना है, लेकिन परिवर्तन की दरकार थी। 2000 के बाद से हुआ यह कि उन खबरों को प्रमुखता दी जाने लगी जो आम व्यक्ति के हित से जुड़ी हुई होती थीं। 2000 से पहले ऐसा वक्त था कि जब तक प्रधानमंत्री ने कुछ न कहा हो तब तक पहली हेडलाइन ही नहीं मिलती थी। न्यूज रूम में यह चिंता रहती थी कि आज प्रधानमंत्री या विपक्ष के नेता ने कुछ नहीं कहा है, तो आज हेडलाइन क्या बने। लेकिन 2000 के बाद से खबर के तेवर बदलने शुरू हुए। मुझे याद है कि 2000 के आस-पास की बात है बसंत कुंज में एक मर्डर हुआ था और वह पहली घटना थी, जहां से टीवी न्यूज में क्राइम की खबरों को प्रमुखता मिलनी शुरू हुई। तब मैं जी न्यूज में था और चार घंटे तक खबर चली। उस खबर की रेटिंग बहुत ज्यादा आई, तो क्राइम से जुड़े कार्यक्रमों को प्रमुखता मिलनी शुरू हुई। यहां उद्देश्य कोई सनसनी फैलाना नहीं था उद्देश्य था कि सरकार को इस बात का इल्म देना कि राजधानी के एक पॉस इलाके में किस तरह से डबल मर्डर हो जाता है। तब से धीरे-धीरे खबरें सत्ता के गलियारों पर ही केंद्रित न होकर आम आदमी तक पहुंचने लगी। इसी दौरान पहली बार टेलीविजन में स्पीड न्यूज शुरू हुई। यह 2003 की बात है तब मैं जी न्यूज में था और तब टॉप टेन खबरों का दौर शुरू हुआ। एक घंटे में साठ खबरें दिखाई जाने लगीं। उसके बाद जब मैं स्टार गया तो वहां पर चौबीस घंटे-चौबीस रिपोर्टर शुरू किया। मेरी यह कोशिश रहती है कि मैं कभी भी किसी खबर को संपादक या प्रोड्यूसर के नजरिए से नहीं देखता। मैं हमेशा उसे एक दर्शक की तरह देखता हूं आम आदमी की तरह देखता हूं। इंडिया टीवी और बाकी चैनलों में जो फर्क है वह यह की इंडिया टीवी किसी भी खबर को आम इंसान की तरह देखता है आम आदमी की तरह देखता है, यही वजह है कि हमें आम आदमी के सरोकार से जुड़ी खबरों को पहले पहचान लेते हैं।
आम आदमी के देखने का दायरा क्या है, इसे आप कैसे निर्धारित करते हैं ?
मुझे लगता है कि आम आदमी अपने सरोकार से जुड़ी चीजें देखना चाहता है। अगर आम आदमी को इस चीज को लेकर परेशानी है कि मुंबई में बारिश होती है, उसके बाद उसका जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। मुंबई की बारिश का बिहार और दिल्ली के लोगों से कोई वास्ता नहीं है, लेकिन देशभर के लोग मुंबई से जुड़े हैं। तो यह आम आदमी की खबर है क्योंकि इस खबर से बस्ती, दुमका और सिलचर के लोग भी जुड़े हुए हैं। उनके अपने लोग वहां पर हैं। गुजरात के सूरत में अगर कोई बाबा यह दावा करता है कि वह चार थप्पड़ मारकर ठीक कर सकता है, तो अगर आप उसे दिखाएंगे नहीं तो फिर उसका पर्दाफाश कैसे होगा? हिंदुस्तान में आज भी 80 फीसदी लोग अंधविश्वास में जीते हैं तो कहीं न कहीं आप जनता के लिए जनता का काम कर रहे हैं।
सभी चैनल ना-ना करते हुए इंडिया टीवी को फॉलों करते हैं और फिर आलोचना भी। आप इसे इंडिया टीवी की सफलता मानते हैं या असफलता ?
आज की तारीख में तकरीबन सभी चैनल, जिनमें देश के कई बड़े चैनल भी शामिल हैं, वे सभी इंडिया टीवी को कॉपी कर रहे हैं। इससे एक बात तो साफ जाहिर है कि वे सब जानते हैं कि इंडिया टीवी न्यूज जोन का सबसे बड़ा चैनल है। क्यों ऐसा होता है कि तालिबान की एक खबर इंडिया टीवी पर लगातार एक सप्ताह तक दिखाई जाती है और जब अगले हफ्ते उस खबर की रेटिंग आ जाती है, तो वही खबर दूसरे चैनलों की रोजना की खबर बन जाती है ? एक उदाहरण और है कि स्वाइन फ्लू की खबर जब इंडिया टीवी पर लगातार दिखाई जाती है फिर अगले हफ्ते उसकी रेटिंग आ जाती है, तो सभी चैलनों पर स्वाइन फ्लू की खबर इतनी प्रमुखता से क्यों दिखाई जाती है ? अगर बात चीन के साथ खराब रिश्तों वाली खबर की करें, तो वह खबर इंडिया टीवी पर दिखाई जाती है तो सात-आठ चैनल उसको फॉलो करते हैं। मेरा यह कहना है कि कहीं ना कहीं इंडिया टीवी का न्यूज रूम बहुत संजीदा है। हम उन खबरों को बहुत जल्दी पकड़ लेते हैं जो उस हफ्ते दर्शक देखना चाहता है। और जब उस खबर की रेटिंग आ जाती है और तो बाकी चैनलों को लगता है कि अरे इस खबर को बहुच अच्छा रेस्पॉन्स मिल रहा है, उसके बाद सभी चैनल उस खबर के पीछे भागते हैं। आरुषी हत्याकांड पहले हफ्ते तक किसी के लिए बड़ी खबर नहीं थी, लेकिन जब इंडिया टीवी पर वो खबर हफ्ता भर चली और जब उसकी रेटिंग आई तो उसके बाद आरुषी हत्याकांड देश की सबसे बड़ी मिस्ट्री बन गई। इसके बाद सभी ने आरुषी हत्याकांड को देश की सबसे बड़ी मिस्ट्री लिखना शुरू कर दिया। इंडिया टीवी की खासियत यह है कि वह खबरों को सबसे पहले समझ लेता है, लोग उसके बाद हमें फॉलो करते हैं। मेरा कहना है कि क्या उससे पहले समझ में नहीं आ रहा था यह रेटिंग आने के बाद ही क्यों समझ में आया? इंडिया टीवी की आलोचना करने वालों का स्वागत है, वे आलोचना करें। लेकिन आलोचना करते हुए यह भी देखना चाहिए कि जिसकी वे आलोचना कर रहे हैं वे आपसे कितना बेहतर काम कर रहे हैं। मेरे ख्याल से अगर वो ईमानदारी के साथ आलोचना करते होंगे, तो वे यह जानते होंगे और यह मानते होंगे कि इंडिया टीवी में काम वाकई में बेहतर होता है।
इंडिया टीवी खबरें समझ लेता या खबरों के क्लाइमेक्स को समझ लेता है, जैसे शेयर बाजार के गिरने पर इंडिया टीवी दिखाता है कि एक सांड़ इतने पैसे ढकार गया, यह खबर है या खबर का क्लाइमेक्स ?
मुझे लगता है कि इंडिया टीवी यह समझ लेता कि आम आदमी की इस खबर में दिलचस्पी है या नहीं।मेरे खयाल से दोनों में ही दर्शक की दिलचस्पी है। अगर उस सांड़ का कोई काम नहीं है, तो उसको हटा देना चाहिए। उसका कोई मतलब है, तभी तो उसके आगे लगा रखा है। वह किसी ना किसी का प्रतीक होगा और उस प्रतीक की जांच अलग से होनी चाहिए। लेकिन कहीं ना कहीं कोई विश्वास जरूर है। जिसकी वजह से उसे वहां पर लगाया गया है। मैं यह नहीं कर रहा कि उस पर पूरे दिन खबर चलानी चाहिए। लेकिन वह खबर का एक छोटा सा पहलू हो सकता है। वह सांड़ ही एक मात्र खबर हो यह गलत है।
क्या कभी ऐसा होता है कि इन सभी पहलुओं को दिखाने में ऐसी खबरें छूट जाती हैं जो विशेष होती हैं ?
यह समस्या पूरे टेलीविजन इंडस्ट्री के साथ है। टेलीविजन में एक आम चलन हो गया है कि हम तीन या चार खबरों को पकड़तें हैं और उन्हीं पर दिन भर चलते हैं। यह एक दिक्कत है, जिससे पूरा टेलीविजन जूझ रहा है। लेकिन इसको लेकर कोशिशें की जा रही हैं। हर खबर को तवज्जो मिले इस तरह की कोशिशें हर जगह हो रही हैं और इंडिया टीवी भी हो रही हैं।
तो क्या न्यूज चैनलों के पास खबरों का संकट है ?
मैं आपको एक हैरान करने वाली बात बताता हूं कि आज के समय में हिंदी न्यूज चैनलों में अकेले इंडिया टीवी है जो 5 बजे से लेकर 10 बजे तक सबसे ज्यादा न्यूज दिखाता है। यह एक अकेला चैनल है जो कि केवल ख़बर दिखाता है। पांच बजे हमने शो शुरू किया है ‘पांच मिनट पच्चीस खबरें’, चार बजे हमारा शो ‘टॉप टेन रिपोर्टर’ आता है जिसमें दस रिपोर्टर अपनी खबरें दिखाते हैं। सात बजे हमारा शो आता है ‘चक दे क्रिकेट’ जिसमें सिर्फ क्रिकेट की खबरें होती हैं। साढ़े सात बजे ‘टॉप टेन रिपोर्टर’ प्राइम टाइम एडिशन होता है। आठ बजे हमारा ‘पांच मिनट आठ खबरें’ प्राइम टाइम एडिशन, साढ़े नौ बजे दिन भर की खबर पर विशेष पेशकश, दस बजे हमने रखा है ‘नॉन स्टाप सुपरफास्ट प्रोग्राम’। आपको नॉन स्टॉप सुपरफास्ट के बारे में जानकर आश्चर्य होगा कि अभी इसको लॉन्च हुए तीन हफ्ते ही हुए हैं और वह शो लगातार तीन हफ्ते से सभी चैनलों में नंबर वन है। इसमें सिर्फ खबरें होती हैं जैसे मनमोहन सिंह ने यह कहा, अंबिका सोनी ने यह कहा, रूस में यह हुआ, किर्गिस्तान में हिंसा हो रही है, मुंबई में बारिश हो रही है, दिल्ली में दो लोग मर गए केवल इसी तरह की खबरें होती हैं। 10 बजे का स्लॉट न्यूज जोन में खबरों का सबसे बड़ा स्लॉट है। उस समय में इंडिया टीवी एक शो शुरू करता है वह शो तीन हफ्ते से चैनलों में नंबर वन बना हुआ है, यह कैसे हुआ खबरें दिखाने से ही हुआ न। अब कहां गए वो लोग जो कहते हैं कि इंडिया टीवी खबरें नहीं दिखाता। अगर लोगों को ऐसा लगता है कि अपने सुख के लिए चार लोगों को बैठाकर उस पर एक घंटे तक चर्चा करते रहे और वे कहते हैं कि वह खबर है। तो माफ किजिए मैं उसे खबर नहीं मानता। दर्शक उस चर्चा को नहीं देखेगा। दर्शक को अपने मतलब की खबर चाहिए। खबरों की कोई कमी नहीं है। अभी हमने जो 5मिनट पच्चीस खबरें बुलेटिन शुरू किया है, उसमें रोजाना आठ-दस खबरें मजबूरन छोड़नी पड़ती हैं। पहले मैं सोचता था कि इतनी खबरें कहां से आएंगी। लेकिन आज 25 खबरों के बाद भी आठ दस खबरें छूट जाती है जिन्हें पब्लिक को दिखाना चाहिए। तो खबरें हैं और खबरों के दर्शक भी हैं। खबरों के दर्शक इंडिया टीवी देख रहे हैं यह हमने साबित कर दिया।
आपने अभी कहां कि कुछ चैनल दो तीन-लोगों को बैठा कर उसी पर चर्चा करते रहते हैं और अंग्रेजी के चैनल उसी राह पर चल रहे हैं। फिर भी उनके पास विज्ञापन है, रेटिंग भी है। तो क्या अंग्रेजी और हिंदी का दर्शक खबरों को लेकर बंट गया है ?
यह बात सही है कि हिंदी और अंग्रेजी का दर्शक बंट गया है। अगर हिंदी के चैनल में यह सब होता है कि चार लोग बैठकर ज्ञान दे रहे हैं, तो वह नहीं चलेगा। हिंदी का दर्शक थोड़ा-सा उतावला है। उसे बोझिल बातें और भाषण पसंद नहीं है। उसे एक्शन चाहिए। उसको ना तो भाषण देना पसंद है और ना ही सुनना पसंद है। यह समस्या हिंदी के दर्शक के साथ है। हिंदी का दर्शक रिजल्ट चाहता है। इस तरह टीवी पर चार लोगों को बैठा कर जुगाली करना कई टीवी चैलनों की परम्परा हो गई है। उन लोगों को अच्छा लगता है कि चार लोग बैठे हैं। और एक घंटे तक गप्प मार रहे हैं। हिंदी का दर्शक आम आदमी है अंग्रेजी का दर्शक आम आदमी नहीं है। आम आदमी समझ जाता है कि मुझे मूर्ख बनाया जा रहा है। इसलिए जिस भी हिंदी चैनल में दर्शको को मूर्ख बनाया जाता है, दर्शक उसे नकार रहा है और नकार चुका है। यह नतीजा आपके सामने है। दर्शक को आप मूर्ख नहीं बना सकते। आपको बहुत पसंद है ज्ञान देना, ज्ञान बांटना और ज्ञान सुनना आपने रात को आठ बजे तीन मेहमान बुला लिये और कहते हैं कि आज हम बात करते हैं संविधान संशोधन विधेयक की और हमारे साथ यह साहब जी हैं। उसके बाद हम उम्मीद करें की दर्शक देखेगा, दर्शक कभी नहीं देखेगा। दर्शक को सब पता है कि वह जो बातें बोल रहा है उससे उसके जीवन पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। उसे उसके मतलब की खबर चाहिए। उसे खबर दिखा दीजिए और उस खबर के जरिए अगर आप कोई कार्यवाई करा सके या प्रसाशन और सरकार पर दबाव डाल सकें तो उसे पसंद आयेगा। एक बात साफ है कि यहां का दर्शक बहुत जागरूक है। यहां कोई शो पसंद आये या नहीं आये दर्शक मेल करके शो का फीडबैक जरूर देता है। न्यूज चैनल दर्शक को मूर्ख नहीं बना सकते, जो भी दर्शक को मूर्ख बनाएगा दर्शक उसे नजर अंदाज कर देगा। जो लोग हमारे पर आरोप लगाते हैं अगर ये आरोप सच होते तो दर्शक को यह बात समझ में आती और दर्शक हमें नकार देता। एक कहावत है कि काठ की हांडी एक ही बार चढ़ती है। इंडिया टीवी ने कहीं ना कहीं दर्शकों का विश्वास जीता है। हमने दर्शकों को यह समझाने की कोशिश की है हम आपको वह खबर दिखाते हैं जो आपके सरोकार से जुड़ी हुई है।
क्या इंडिया टीवी की खबरों से समाज पर कुछ प्रभाव पड़े हैं ?
क्यों नहीं ? हमने एक स्टोरी की थी कि कॉमनवेल्थ गेम्स के चलते बच्चों को सेक्स रेकेट में धकेला जा रहा है, इस खबर के दिखाये जाने के बाद कई जगह छापे पड़े। एक खबर थी कि एक लड़की मेट्रो स्टेशन पर दूसरे यात्री के द्वारा धक्का देने से मेट्रो के आगे गिर गई और उससे उसके दोनों पैर कट गए। हमने उस लड़की की सहायता के लिए एक मुहिम चलाई। बहुत सारे लोग उसकी सहायता के लिए आगे आये। जयपुर फुटवियर ने उसके पैर लगाने के लिए पेशकश की। हमने मिलावट को लेकर एक खबर चलाई थी जिसको लेकर दर्शकों की ढेर सारी मेल आई। दर्शकों का कहना था कि आप लोग हमारी आंखें खोल रहे हैं। अब हम लोग हर चीज देख कर खरीद रहे हैं। मुझे लगता है कि यह बताना हमारी जिम्मेदारी है कि क्या हो रहा है। और सबसे बड़ी बात है कि रजत शर्मा जी की छवि संघर्षों से पैदा हुए और संजीदा पत्रकार की है, लोग उनकी बात पर विश्वास करते हैं, इसलिए हमारे द्वारा दिए गए मैसेज का असर पड़ता है। जनता से जुड़ी खबरों का असर भी है और उसमें रेटिंग भी है। जब इन खबरों की रेटिंग आ जाती है तो लोग कहते हैं कि हम लोग यह सब रेटिंग के लिए कर रहे हैं, लेकिन जब हम कर रहे होते है तब तो हमें नहीं पता होता न कि हमें रेटिंग के लिए यह कर रहे हैं। रेटिंग के खिलाफ केवल वो ही लोग बोलते हैं जिनको खबर की समझ नहीं है। अगर मंगलौर हादसे के चौबीस घंटे बाद जबकि पूरा देश उस हादसे से जुड़ी खबरें देखना चाहता है, तब आप अपने सुख के लिए किसी आदिवासी इलाके से जुड़ा हुआ फीचर दिखाकर आम जनता से अपना जुड़ाव दिखाना चाहते हैं, तो मैं बता दूं कि जनता इसे नकार देगी, क्योंकि उसका सरोकार स्वांत:सुखाय के लिए की गई खबरों से नहीं अपने हित से जुड़ी खबरों से होता है।
आप रेटिंग सिस्टम में सुधार चाहते हैं, जबकि भारत में मीडिया के लिए रेवेन्यू एड से पैदा होता है न कि सब्सक्रिप्शन से, ऐसे में रेटिंग जरूरी हो जाती है ?
रेटिंग को मैं बिल्कुल भी बुरा नहीं मानता हूं। हम जो कर रहे हैं, हमें जो लोग देख रहे हैं और कल को जो लोग हमसे जुड़ना चाहते हैं चाहे वे एडवरटाइजर ही क्यों न हों। वो देखेंगे कि आप क्या कर रहे हैं कैसा कर रहे है। रेटिंग का दायरा बढ़ना चाहिए। रेटिंग न हो इसके मैं खिलाफ हूं। रेटिंग में सुधार की गुंजाइश है। इसमें हर तरह की नई पहल का स्वागत होना चाहिए रेटिंग का बंद होना स्वागतयोग्य नहीं है। रेटिंग विद रेस्पांसबिलिटी। सचिन पर यह सवाल क्यों नहीं उठते कि आप रन बनाने के लिए क्यों खेलते हैं, जबकि टेलीविजन चैनल पर यह सवाल उठता है कि हम रेटिंग सिस्टम के लिए चीजें दिखाते हैं। अगर मंगलौर हादसे के चौबीस घंटे बाद जबकि पूरा देश उस हादसे से जुड़ी खबरें देखना चाहता है, तब आप अपने सुख के लिए किसी आदिवासी इलाके से जुड़ा हुआ फीचर दिखाकर आम जनता से अपना जुड़ाव दिखाना चाहते हैं, तो मैं बता दूं कि जनता इसे नकार देगी, क्योंकि उसका सरोकार स्वांत:सुखाय के लिए की गई खबरों से, नहीं अपने हित से जुड़ी खबरों से होता है।
आपने खोजी पत्रकारिता के माध्यम से तेलगी जैसे मामले उजागर किए थे आज स्टिंग ऑपरोशनों के माध्यम से क्या खोजी पत्रकारिता सफल है ?
खोजी पत्रकारिता की दशा अभी अच्छी नहीं है, क्योंकि कुछ लोगों ने इसका गलत इस्तेमाल करके बदनाम किया है। जिसकी वजह से खोजी पत्रकारिता पर से भरोसा उठा। लेकिन मुझे भरोसा है कि खोजी पत्रकारिता की गुंजाइश अभी बाकी है। खोजी पत्रकारिता का दौर दोबारा से आयेगा। उसके लिए जो खबरें आपको करनी पड़ेंगी वो ऐसी करनी पड़ेंगी, जिनसे लोग आप पर भरोसा करें। जब से खोजी पत्ररकारिता के नाम पर कुछ भी होने लगा, वहीं से इसने विश्वास खोया। हमने पिछले दिनों कई खोजी पत्रकारिता वाली खबरें की हैं। जैसे मैंने आपको बच्चों वाला केस बताया था, उसका रेसपॉंस भी बहुत अच्छा मिला। आप जो भी रिपोर्ट विश्वसयनीयता और जांच पड़ताल के साथ करते हैं, उसके अच्छे रिजल्ट्स मिलते हैं। मुझे लगता है कि पक्की खोजी पत्रकारिता के दिन लौटेंगे। प्रिंट में भी अगर एक-आध अखबार छोड़ दें तो बाकी अखबारों में खोजी खबरें नहीं हो रही हैं। टीवी और प्रिंट में खोजी रिपोर्ट करने में बहुत फर्क है। टीवी में दिखाना जरूरी है, इसलिए मुश्किल आती है। इसके बावजूद भी टीवी में जो कुछ खोजी पत्रकारिता हुई है, उसके अच्छे नतीजे भी आये हैं।
आपने लंबा समय प्रिंट मीडिया में भी बिताया है तो क्या आप मानते हैं कि टीवी में रफ्तार ज्यादा है तो प्रिंट में धार ज्यादा है ?
एक न्यूज चैनल को चलाना और एक विमान चलाना बराबर है। क्योंकि यहां पर आपको सेकेंडों में फैसला करना पड़ता है कि इस खबर को लेना या नहीं लेना, इस खबर को कितना समय दें, यह सब कुछ सेकेंडों में करना पड़ता है। साथ ही उसी सेकेंड में आपको खबर की धार और रफ्तार दोनों तय करनी है, तो मुझे लगता है कि यह अपने आप में बहुत ही मुश्कित काम है। जिसे टेलिविजन चैनल बखूबी अंजाम दे रहे हैं। क्योंकि अखबार में चौबीस घंटे में एक ही संस्करण आता है और एक ही बार छपता है, तो संपादकों के पास समय होता है खबर को समझने का उसकी धार तय करने का। इसीलिए वो प्रभावशाली हो जाते हैं लेकिन मेरे हिसाब से टेलिविजन का जो असर है, वो बहुत ज्यादा है।
नोट: समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडिया पोर्टल एक्सचेंज4मीडिया का नया उपक्रम है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें samachar4media@exchange4media.com पर भेज सकते हैं या 09999064949 / 09818848564 पर संपर्क कर सकते हैं।
टिप्पणी
विनोद जी, तेलई की सीमा होती
विनोद जी,
तेलई की सीमा होती है। मेरी बात मानिये जब तक इंडिया टीवी में नौकरी कर रहे हैं सार्वजनिक टिप्पणी से बचिये। मै ये मान सकता हूं कि नौकरी करते वक्त आदमी संस्थान का विरोध नहीं कर सकता। लेकिन कम से कम इस तरह की बातें मत करिये जिसे सुनकर आपकी योग्यता पर शक होने लगे। इंडिया टीवी को एक एक आदमी गरियाता है। अब क्या गपबाजी कर रहा है इंडिया टीवी ये देखने के लिए लोग उसे देखते है। इसी में उसकी टीआरपी बढ जाती है।
ये माफी तो मीडिया इंडस्ट्री तक ही पहुची
विनोद जी , खुशी हुई कि किसी टेलीविजन चैनल के प्रबंधन स्तर के व्यक्ति ने गलती स्वीकारी चाहे देर से ही सही । अच्छा होता कि अखबारों कि तरह टीवीचैनल पर कुछ लाइन लिखकर ये गलती मानी गयी होती। अगर दर्शकों को आप अपनी माफी का अहसास नही करा पाये तो कोई फायदा नही उस माफीनामे का। समाचार4मीडिया के द्वारा भी आपकी बात केवल मीडिया इंडस्ट्री तक ही पहुचेगी। लेकिन उन हजारो, लाखों दर्शकों का क्या जो देश और दुनिया में आपका चैनल देखते हैं और बेवकूफी भरी खबरों को देख कर सिर्फ हंसते हैं।
bas bahut ho gaya vinod bhai
vinod ji,mujhe pehle bhi tajub hua jab aapne kisi andhekhe anjane ankur ka jawab diya.aese log farzi namo se sirf gaal bajana jante hain.inki asliyat kuch aur hoti hai.aapne yakinan baddapan ka parichay diya galti bhi man ke aur mafi bhi maang ke.lekin ab aap jawab mat dijiyega yonki ankur jaise log pahle ungli pakadte hain,phir kandhe par koodne lagte hain.inhone kaha ki aap ko samachar4media ke zariye mafi mangni chahiye.aapne mangi to ab ye kah rahe hain tv par boliye.tv par aap bol chuke hain apne bataya.inke kahne par tv par bolenge to ye kahenge akhbaaro me chapwaiye.phir kahenge ab zara let kar mafi mangiye.aese nakaratmak logo ko nazarandaz karo vinod bhai.ye sab jivan se hatash aur haare hue kunthit log hain isilye india tv bhi dekhte hain aur kahte hain ki bewakufi bhari khbron ko dekh kar hanste hain.ye sochne wali bat hai aur apko bhee pata lagana chahiye ki bewakufi bhari khabre kya sirf bewakuf hi dekh rahen hain?aur itne bewakufo me ek hi gyani kaisa paida ho gaya ?
The Show Man
विनोद कापड़ी टीवी पत्रकारिता के `शो मैन` है। मुझे इंडिया टीवी पसंद है और मिस्टर कापड़ी जहा है वे मुफीद जगह पर है। समाचार मीडिया के सवाल भी तीखे रहे तो उत्तर भी मिस्टर कापड़ी ने सटीक दिए।
विनोद का कहना ठीक है
पता नहीं मुझे क्यों लगता है कि हम मीडिया में आए सारे दोषों का ठीकरा इंडिया टीवी के माथे पर फोड़ रहे हैं। सच तो यह है कि समाज के सारे क्षेत्र में अवमूल्यन हो रहा हो वहां मीडिया भी कैसे बच सकता है? फिर अकेले सारे भूत-प्रेत-नाग-एलियन्स के लिए इंडिया टीवी को दोषी बताया जाता है। और इतिश्री कर दी जाती है।
कौन नहीं जानता कि "आजतक" ही वो चैनल था जहां सबसे पहले छह घंटे तक बिना ड्रायवर के कार दौड़ाने का नाटक लाइव दिखाया गया था। प्रिंस के गढ़ढे में जाने को तीन दिन तक "जी न्यूज़" ने अनुपात से ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। और चैनल भी इसी गढ्ढे में कूद पड़े थे। जबकि तीन दिन बाद बंगाल की एक खदान में फंसे ग्यारह मजदूरो की किसी को कोई खबर नहीं हुई थी। इसमें चैनलों का दोष कतई नहीं है। मेरा तो यह मानना है कि कारपोरेट संस्कृति ने हमें इस हाल में लाकर छोड़ दिया है जहां विचारवान होने की कोई गुंजाइश नहीं रखी जाती है। सारा वक्त नौटंकी दिखाकर हमारा ध्यान असल मुद्दों से हटाया जा रहा है।
जिन्हें मीडिया की वाकयी चिंता है वे सबसे पहले इंडिया टीवी को कोसना बंद करें और खुद के गिरेबां में झांककर देखें कि व्यवस्था विरोधी कितनी स्टोरियां उन्होंने खुद कितनी की हैं जिसने सरकार को हिलाकर रख दिया हो। इंडिया टीवी पूरे सिनारियो का बेहद छोटा प्यादा है। वे जो बड़े मोहरे हैं उनके पत्रकार क्या कर रहे हैं?
मैं विनोद की बातों से सहमत हूं और वे जो कुछ कर रहे हैं वह कारपोरेटिया कर्तव्य है उनका। वरना तो वे भी खद्दर का झोला टांगकर बरेली में छापा खाना खोलकर बैठ जाते- छोटा रिसाला छापते और उनकी आवाज भी नक्कारखाने की तूती बन जाती। आज अगर वे बाजार और पत्रकारीय धर्म के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं तो इसमें बुरा क्या है?
उंगली उठाने वाले किनारे पर बैठकर मछलियां ना पकड़ें। मगरमच्छों पर वार करें।
vinod kapri ne badi lakeer kheench di
whenever a person is there on the top, its likely to generate rivalry from ur counterparts and colleagues...but vinod kapri has set an example of being quiet and by drawing a much bigger line than against its foes....ummeed hai ki un so called dushmano ko ye interview padhne ke baad karara jawab mil hi gaya hoga. And i also agree with shastree ji... You have revealed all your secrets. But i bet, even after reading this ur critics can not even implement and execute these ideas. Well done kapri sir... Accolades....
प्रतिक्रिया
विनोद कापड़ी का यह कथन ख़ासतौर से उनके लिए है जो बौद्धिक जुगाली को ख़बर समझ बैठे हैं-
""अगर लोगों को ऐसा लगता है कि अपने सुख के लिए चार लोगों को बैठाकर उस पर एक घंटे तक चर्चा करते रहे और वे कहते हैं कि वह खबर है। तो माफ किजिए मैं उसे खबर नहीं मानता। दर्शक उस चर्चा को नहीं देखेगा। दर्शक को अपने मतलब की खबर चाहिए। खबरों की कोई कमी नहीं है।""
इंटरव्यू का मर्म इंडिया टीवी की उक्त पंक्तियों में समाहित है। यक़ीनन उनके लिए जो व्यूज़ को न्यूज़ समझने की ग़लती कर बैठे हैं और बार-बार दर्शकों से नकारे जाते हैं। लगातार इतने आरोपों और आलोचकों की कटु व्याख्याओं के बाद इंडिया टीवी के विनोद कापड़ी जी के पेश किए गए तर्क कहीं ज़्यादा दमदार और मज़बूत नज़र आ रहे है।
vinod kapri pl dont reveal your secrets
Dear Vinod,
Job well done and well said. But you have disclosed so many success secrets to all media people by giving this interview. How come? Better think of some new strategies to START again.:)
The best part of the interview I copy pasted here below....was Well Said.
आपने लंबा समय प्रिंट मीडिया में भी बिताया है तो क्या आप मानते हैं कि टीवी में रफ्तार ज्यादा है तो प्रिंट में धार ज्यादा है ?
एक न्यूज चैनल को चलाना और एक विमान चलाना बराबर है। क्योंकि यहां पर आपको सेकेंडों में फैसला करना पड़ता है कि इस खबर को लेना या नहीं लेना, इस खबर को कितना समय दें, यह सब कुछ सेकेंडों में करना पड़ता है। साथ ही उसी सेकेंड में आपको खबर की धार और रफ्तार दोनों तय करनी है, तो मुझे लगता है कि यह अपने आप में बहुत ही मुश्कित काम है। जिसे टेलिविजन चैनल बखूबी अंजाम दे रहे हैं। क्योंकि अखबार में चौबीस घंटे में एक ही संस्करण आता है और एक ही बार छपता है, तो संपादकों के पास समय होता है खबर को समझने का उसकी धार तय करने का। इसीलिए वो प्रभावशाली हो जाते हैं लेकिन मेरे हिसाब से टेलिविजन का जो असर है, वो बहुत ज्यादा है।
Long live your BRAIN which should not drain but RAIN from up above the Sky - NEWS ! Your formula sells the NEWS and this ERA is Market Driven.
What Sells is what Survives. PERIOD.
Best Wishes
विनोद कापड़ी में दिमाग कहां है ?
शास्त्री जी, कापड़ी में दिमाग कहां है ?, अगर इनमे दिमाग होता तो वो वाई.एस.रेड्डी को जिंदा नहीं बताते...
vinod kapri is GENIUS
Galthi kis sampadak se nahi hoti ramanand ji?un se bhee galthi hui.lekin jin logo ne unke sath kaam kiya hain wo sabhi jante hen ki vinod sir genius hen.maen khud india tv me kam krta hoon.bahut mamuli sa adna sa karmchari.apna naam janbujh kar anjaan likha hai kyonki naam nahi dena chahta kyonki naam doonga to sab chamchagri samjenge.maen to khud ko dhnya manta hoon ki unke sath kaam krta hoon.roz unko dekhta hoon.ek seeda saral insan jo sab par chillata hai aur agle hi pal pyar bhi krta hai.reddy ki ghalat khabar chala kar vinod sir ko kitna afsos tha ye hum sab ne dekha tha us rat.bhot sare logo se unhone mafi mangi.aankhon me ansu bhi dikhe they.aesa editor ab kahan hota hai.ghalti krte hain to har wqt mafi mangte hain.hum ko pata chala bad me ki reddy wali khbr unko khud reddy ke OSD ne cm house se phone kar ke di thi.koi bhi unki jagah hota to is khabar ko chalata jab osd khud bata raha ho.is ke bavjud bhi unhone darshako aur ham sab se mafi mangi.