कुलदीप कुमार को मिलेगा म्यूजिक फोरम का मीडिया एक्सीलेंस अवार्ड

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शेष नारायण सिंह, वरिष्ठ पत्रकार  
 हिन्दी के नामी कवि और संगीत मर्मज्ञ कुलदीप कुमार को इस साल का मीडिया एक्सीलेंस अवार्ड दिया जाएगा. २१ दिसंबर को मुंबई के एन सी पी ए सभागार में रोल आफ मीडिया इन द प्रमोशन ऑफ़ म्यूजिक इन इण्डिया नाम का  सेमिनार आयोजित किया गया है . इसी अवसर पर इस पुरस्कार को देने का  कार्यक्रम है . संगीत की तरक्की के लिए बहुत बड़े पैमाने पर काम कर रही कंपनी आई टी सी के तत्वावधान में बनाए गए इंटरनैशनल फ़ौंडेशन फार द फाइन आर्ट्स  के म्यूजिक फोरम की तरफ से यह अवार्ड पिछले कई वर्षों से  दिया  जा रहा है . कुलदीप कुमार को इस महीने की ५ दिसंबर  को ही चिट्ठी भेज दी गयी थी और उनसे  म्यूजिक फोरम के संयोजक अरविंद पारिख ने अनुरोध किया था कि कृपया इस अवार्ड को स्वीकार कर लें . पता चला है कि कुलदीप कुमार ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है.
 
कुलदीप हिन्दी के बड़े कवि हैं . जवाहरलाल नेहरू  विश्वविद्यालय के छात्र के रूप में ही वे एक कवि के रूप में पहचाने जाते थे. छात्र जीवन में हिन्दी आलोचना के कुछ भारी मठाधीशों से कुलदीप कुमार का पंगा हो गया था . उनको कवि के रूप में स्थापित न होने देने के लिए भी कुछ कोशिशें हुईं लेकिन वे  रुके नहीं . अपना काम करते रहे. कुलदीप इतिहास के विद्वान् हैं और  देश के बहुत बड़े अखबारों में नौकरी की है . पत्रकार के रूप में उनको बहुत सम्मान से देखा जाता है . आजकल जनसत्ता,द  हिन्दू , फ्रंट लाइन ,  इकानामिक टाइम्स आदि अखबारों में उनके कालम छपते हैं . देश के कई बहुत बड़े अखबारों में वे बाकायदा नौकरी कर चुके हैं. जर्मनी के रेडियो द्वाइचे वैले  में भी  उन्होंने दिल्ली प्रतिनिधि के रूप में नौकरी की है . 
 
कुलदीप कुमार की पहचान एक ऐसे  लेखक के रूप  में है जो संस्कृति की बारीकियों और नफासत को पूरी संजीदगी से न केवल समझते हैं , उसे आम बोलचाल की भाषा में समझा भी सकते हैं . आजकल  संगीत के बारे में लिखे जा रहे उनके द हिन्दू के  कालम को चाहने वालों की संख्या बहुत बढ़ रही है . कुलदीप के लेखन  से संगीत की समझ को विकसित करने के मौके बहुत लोगों को मिल रहे हैं. कुलदीप कुमार को सम्मनित करके जहां एक तरफ म्यूजिक फोरम ने एक बहत ही संवेदन शील रचनाकार को समानित किया है वहीं उन्होंने यह ऐलान  भी किया है कि उनके संगठन ने  मीडिया के क्षेत्र में सक्रिय संगीत के  सबसे बड़े जानकारों को पहचानने में कभी कोई  गलती नहीं की है . १९९५ से शुरू हुए इस सम्मान  को पाने वालों की सूची में देश के बहुत बड़े संगीत समालोचाकों के नाम मौजूद हैं . १९९५ में पहला सम्मान छाया  गांगुली को मिला था. बाद के वर्षों में  इस सम्मान को  लक्ष्मी नारायण गर्ग, पट्टाभि  रमण .मोहन नाडकर्णी, शांता गोखले ,अमरेन्द्र धनेश्वर और मुकुंद सगोरम जैसे प्रसिद्ध लोगों को दिया गया  . पिछले साल यह सम्मान सम्मान द  हिन्दू अखबार के एन मुरली को  दिया गया था . 
 
एक बेहतीन लेखक और पत्रकार के अलावा कुलदीप कुमार एक संवेदनशील कवि के रूप में भी जाने जाने जाते हैं.औरत के बारे में लिखी गयी उनकी कविता को कई गुणी लोगों  के  मुंह से सुनने का अवसर मिला है . उस कविता के अंत में जब कुलदीप कहते हैं कि ," अपने पुरुष होने के अभिमान पर लजाता हुआ " तो लगता है कि सामंती सोच वाले पूरे पुरुष समाज को झकझोड़  कर बता रहे हैं कि औरत  वास्तव में पुरुष से कम नहीं है , सुपीरियर है . कुलदीप कुमार को सम्मानित करके   आई टी सी और म्यूजिक फोरम ने अपना भी मान बढाया है 
 
  • 17/05/2012

    पीयूष पांडे, वरिष्ठ वेब पत्रकार

    फिल्म अभिनेता आमिर खान ने अपने टेलीविजन कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ के प्रचार के लिए सोशल मीडिया के तमाम मंचों को भी रणनीतिक तरीके से चुना। नतीजा छह मई को कार्यक्रम की पहली कड़ी के प्रसारण के साथ ही दिख गया। माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर उस दिन शुरुआती चार घंटों तक हर दो सेकेंड में एक ट्वीट सत्यमेव जयते से संबंधित लिखा गया। स्टारकॉम मीडियावेस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक 9 मई तक सत्यमेव जयते के फेसबुक पेज को करीब 6.5 लाख लोगों ने पसंद किया और ट्विटर पर यह कार्यक्रम लगातार टॉप-5 विषयों यानी ट्रेंडिंग टॉपिक में रहा

  • 14/05/2012

    रवि शंकर, स्वतंत्र पत्रकार

    हाल ही में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कडेय काटजू ने मीडिया को फिर निशाने पर लेते हुए कहा कि वह अंधविश्वास और रूढि़वादिता को बढ़ावा देकर सामाजिक और आर्थिक मुद्दों से लोगों का ध्यान हटा रहा है। गौरतलब है कि जस्टिस काटजू ने मीडिया पर आरोप लगाया है कि मीडिया सनसनी फैलाने की कोशिश में तथ्यों को तोड़ – मरोड़ कर पेश करती है। ताकि मीडिया घराने दर्शकों की संख्या में इजाफे करने के साथ- साथ ज्यादा कमाई कर सकें

  • 14/05/2012

    संजय द्विवेदी, प्रोफेसर, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय

    हिंदुस्तान में रहते हुए हम किसी भी इलाके में जाएं उर्दू हमारा साथ नहीं छोड़ती। वह हिंदी की ही तरह राष्ट्रभाषा है, जिसकी जमीन बहुत व्यापक और जड़ें बहुत गहरी हैं। पाकिस्तान के निर्माण ने उर्दू की इस रफ्तार को रोक दिया। उर्दू एक खास तबके की भाषा बनकर रह गयी। वह हिंदुस्तानी जबान से एक कौम की जबान बन गयी या बना दी गयी। ऐसे समय में उर्दू सहाफत (पत्रकारिता) पर बात करना सच में अतीत के उन सुनहरे पन्नों को टटोलने की कोशिश है, जब जंगे आजादी की लड़ाई में उर्दू अखबारों ने सबसे कड़े शब्दों में अंग्रेजी सत्ता का प्रतिकार किया था
  • 10/05/2012

    अमित शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार
    फेसबुक से बहुत-से लोग दुखी हैं। इसलिए कि इस बला ने उनके अपनों को वर्चुअल दुनिया में उलझा दिया है। वे 'फेस टू फेस' रिलेशन को भूल 'फेसबुक' में उलझ रहे हैं। खुद मैं भी इसका शिकार हूं। जरा ज्यादा देर फेसबुक पर ऑनलाइन हो जाऊं तो श्रीमतीजी जली हुई रोटियां परोसकर सांकेतिक विरोध जता देती हैं। खैर...
     

  • 07/05/2012
    पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
    एक एपीसोड की एंकरिंग करने का मेहनताना तीन करोड़-- तिस पर तुर्रा कि समाज की चिंता। कुछ आंसू, कुछ भावनाएं, कुछ तथ्य और कुछ ‘‘मीडिया-हाईप’ - कुल मिला कर इसी का घालमेल है- सत्यमेव जयते।