नव वर्ष के अवसर पर पूंजी वाद का उल्लास,बेबस आम जन

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अरविन्द विद्रोही, वरिष्ठ पत्रकार  
वर्ष २०११ के विदाई और वर्ष २०१२ के आगमन की बेला में सप्ताह भर चले रात के उत्सवो ने जहां लाखो नागरिको को आनंदित कर के ऐश्वर्य के रसा स्वादन का अवसर दिया वही दूसरी तरफ करोडो-करोड़ आम जन ,मेहनत कश तबका पूंजी वाद के, ऐश्वर्य व भोग विलास के इस अदभुत नज़ारे को देख कर ,सुनकर हतप्रभ से है | नव वर्ष २०१२ के बधाई संदेशो से शुरु हुआ नव वर्ष २०१२ के आगमन का उत्सव २०११ के अंतिम दिन तो सुरा-सुंदरी व ऐश्वर्य का संगम बन गया |यह रात वह रात थी जिसमे खुशियां सिर्फ धनवानों की तिजोरी से निकली रकमों से बटोरी गयी ,रात की कालिमा में रूप की बोली लगी ,प्यार के नाम पर वासना का नग्न नृत्य हुआ तथा कार्यक्रमों के नाम पर देह का खुल्लम- खुल्ला प्रदर्शन जम कर हुआ | बेशर्मी की सारी हदों को तोड़ते हुये आयोजित कार्यक्रमों को घर घर टेलीविजन के माध्यम से देखा और दिखाया गया |
 
लगभग १०दिन पूर्व से ही नव वर्ष की मुबारकबाद नव वर्ष मंगल मय हो आदि आदि लोगो ने अपने अपने परिचितों से कहना शुरु कर दिया | आखिर यह आने वाला नव वर्ष सिर्फ कहने मात्र से मंगल मय कैसे होगा यह मेरी समझ से परे है | सिर्फ औपचारिकता निभाने हेतु बधाई संदेशो का आदान प्रदान जारी रहा | यह औपचारिकता भरे तमाम अवसरों पे दिये जाने वाले बधाई सन्देश तो हम सभी अपने जीवन में देते व लेते ही आ रहे है,क्या इन संदेशो से कोई भी खुशिया मिली ,यह सोचने की बात है | अमुक ने बधाई सन्देश दिया यह ख़ुशी जरुर मिलती रही है,लेकिन अगर किसी अवसर पे उसी ने नहीं दिया तो मन भी क्लांत हो जता है |
 
कोई सार्थक परिवर्तन मेरे अपने जीवन में ,मानव जीवन में, आम जन के जीवन में कैसे हो ,क्या हो कि अगले वर्ष २०१३ के आगमन पर ह्रदय से बधाई सन्देश सभी के मुखारविंद से निकले कि आने वाला नूतन वर्ष आप सभी को भी मंगल मय हो तो बात बने | बीते वर्ष २०११ के शुरुआत में भी तमाम इसी तरह कि बधाई संदेशो का आदान प्रदान हुआ था |क्या वर्ष २०११ में आम जन को कोई भी ख़ुशी नसीब हुई है? वर्ष २०११ में तो अपने हक़ की आवाज़ उठाने वालो को आजाद भारत की सरकारों की पुलिसिया तंत्र ने अपने बूटों तले रौंद डाला ,ब्रितानिया हुकूमत की दरिंदगी को मात देते हुये हुक्मरानों ने जन भावनाओ की तनिक भी परवाह ना की | क्या २०१२ में आम जन का हक़ उनको मिलेगा ? क्या सच मुच खुशियां नसीब होंगी ?
 
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  • 17/05/2012

    पीयूष पांडे, वरिष्ठ वेब पत्रकार

    फिल्म अभिनेता आमिर खान ने अपने टेलीविजन कार्यक्रम ‘सत्यमेव जयते’ के प्रचार के लिए सोशल मीडिया के तमाम मंचों को भी रणनीतिक तरीके से चुना। नतीजा छह मई को कार्यक्रम की पहली कड़ी के प्रसारण के साथ ही दिख गया। माइक्रोब्लॉगिंग साइट ट्विटर पर उस दिन शुरुआती चार घंटों तक हर दो सेकेंड में एक ट्वीट सत्यमेव जयते से संबंधित लिखा गया। स्टारकॉम मीडियावेस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक 9 मई तक सत्यमेव जयते के फेसबुक पेज को करीब 6.5 लाख लोगों ने पसंद किया और ट्विटर पर यह कार्यक्रम लगातार टॉप-5 विषयों यानी ट्रेंडिंग टॉपिक में रहा

  • 14/05/2012

    रवि शंकर, स्वतंत्र पत्रकार

    हाल ही में विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के मौके पर भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कडेय काटजू ने मीडिया को फिर निशाने पर लेते हुए कहा कि वह अंधविश्वास और रूढि़वादिता को बढ़ावा देकर सामाजिक और आर्थिक मुद्दों से लोगों का ध्यान हटा रहा है। गौरतलब है कि जस्टिस काटजू ने मीडिया पर आरोप लगाया है कि मीडिया सनसनी फैलाने की कोशिश में तथ्यों को तोड़ – मरोड़ कर पेश करती है। ताकि मीडिया घराने दर्शकों की संख्या में इजाफे करने के साथ- साथ ज्यादा कमाई कर सकें

  • 14/05/2012

    संजय द्विवेदी, प्रोफेसर, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय

    हिंदुस्तान में रहते हुए हम किसी भी इलाके में जाएं उर्दू हमारा साथ नहीं छोड़ती। वह हिंदी की ही तरह राष्ट्रभाषा है, जिसकी जमीन बहुत व्यापक और जड़ें बहुत गहरी हैं। पाकिस्तान के निर्माण ने उर्दू की इस रफ्तार को रोक दिया। उर्दू एक खास तबके की भाषा बनकर रह गयी। वह हिंदुस्तानी जबान से एक कौम की जबान बन गयी या बना दी गयी। ऐसे समय में उर्दू सहाफत (पत्रकारिता) पर बात करना सच में अतीत के उन सुनहरे पन्नों को टटोलने की कोशिश है, जब जंगे आजादी की लड़ाई में उर्दू अखबारों ने सबसे कड़े शब्दों में अंग्रेजी सत्ता का प्रतिकार किया था
  • 10/05/2012

    अमित शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार
    फेसबुक से बहुत-से लोग दुखी हैं। इसलिए कि इस बला ने उनके अपनों को वर्चुअल दुनिया में उलझा दिया है। वे 'फेस टू फेस' रिलेशन को भूल 'फेसबुक' में उलझ रहे हैं। खुद मैं भी इसका शिकार हूं। जरा ज्यादा देर फेसबुक पर ऑनलाइन हो जाऊं तो श्रीमतीजी जली हुई रोटियां परोसकर सांकेतिक विरोध जता देती हैं। खैर...
     

  • 07/05/2012
    पंकज चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
    एक एपीसोड की एंकरिंग करने का मेहनताना तीन करोड़-- तिस पर तुर्रा कि समाज की चिंता। कुछ आंसू, कुछ भावनाएं, कुछ तथ्य और कुछ ‘‘मीडिया-हाईप’ - कुल मिला कर इसी का घालमेल है- सत्यमेव जयते।