हिन्दी पत्रकारिता ने 2009 में ‘प्रभाष जोशी ’को खोया
आरिफ खान मंसूरी
साल 2009 में हिन्दी पत्रकारिता ने एक ऐसी शख्सियत खो दी जिसकी जगह अब कोई भी नहीं ले सकता। हिन्दी पत्रकारिता के लिए वो एक ऐसे स्तम्भ थे जिन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को एक नई दिशा दी थी। हम यहां बात कर रहे हैं महान पत्रकार प्रभाष जोशी की। प्रभाष जोशी जी ने हिन्दी पत्रकारिता को पांच दशक से ज्यादा का समय दिया था। जोशी जी ने हिन्दी पत्रकारिता की एक नई भाषा शैली तैयार की थी जिसकी छत्रछाया में अनेकों प्रतिभाशाली पत्रकार पनपे हैं। प्रभाष जोशी का जाना पत्रकारिता के लिए एक आम घटना नहीं है। उनके जाने से हिन्दी पत्रकारिता पर बहुत असर पड़ेगा। जोशी जी की मीडिया जगत को बहुत सारी देनें हैं। प्रभाष जी ने पत्रकारिता में अपनी ऐसी जगह बनायी हुई थी कि उनके इस संसार से चले जाने के बाद वो जगह हमेशा खाली रहेगी उस जगह को कोई नही भर सकता। उनके बारे में जितना भी लिखा जाये उतना ही कम है। जोशी जी ने पत्रकारिता का एक धर्म बताया था, वो था “समाजपरक होना” उनका कहना था “पत्रकार की कलम हमेशा समाज को सामने रखते हुए चलनी चाहिए” निष्पक्षता को बढावा देते हुए वो किसी दल का पक्ष करना या उससे प्रभावित होने का विरोध करते थे।
हिन्दी पत्रकारिता की शैली को नया रुप देने वालों में प्रभाष जोशी का नाम मुख्य रुप से गिना जाता है। उन्होंने जनसत्ता के माध्यम से अखबार की भाषा को बदलने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। जोशी जी ने जनसत्ता में आम जन की भाषा को लिखा जो कि आम जनता की भाषा थी। उनका कहना था कि अखबार साहित्य नहीं हैं अखबार में इस तरह लिखे जिससे आम जनता को समझने में सहूलियत हो। इन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को बहुत सारे नये शब्द दिये हैं जो आम जन के शब्द हैं। वो हमेशा “अपने” शब्द को “अपन” लिखते थे। इसी तरह “आतंकवादियों को खड़ाकू, फिदायिनों को मरजीवडे़, छोटे नेताओं को चिरकुट” लिखते थे। ये शब्द दिखने में तो अटपटे लगते थे लेकिन पाठक उनकी इस शैली को बहुत पसंद करते थे। इसी शैली ने जनसत्ता को बुलंदियों पर पहुंचा दिया था। प्रभाष जी हिन्दी से शुरु करके अंग्रेजी से होते हुए हिन्दी में लौटे और हिन्दी पत्रकारिता को एक नई दिशा दी। जोशी जी के कॉलम कागद कोरे के प्रसिद्ध होने का एक मात्र कारण भी उनकी शैली थी। कुछ लोग तो केवल कागद कोरे पढ़ने के लिए ही जनसत्ता पढते थे। उनका कागद कोरे लगातार 17 साल तक जनसत्ता में छपता रहा बिना रुके। कागद कोरे में वो तथ्य होते थे जो अच्छे-अच्छे की पोल खोल कर रख देते थे इन तथ्यों को पढने वाला चौंक जाता था।
प्रभाष जोशी जी के लेखन और ईमानदारी के आगे तो सभी लोहा मानते थे। उनकी कलम दो विषयों पर तो ऐसे चलती थी कि एक बार चलने के बाद रुकने का नाम ही नही लेती थी। वो एक तो राजनीति पर और दूसरा क्रिकेट पर लिखते थे। प्रभाष जोशी क्रिकेट के ऐसे प्रेमी थे, कि एक भी क्रिकेट मैच को देखने से नहीं चूकते थे। क्रिकेट मैच की एक-एक बॉल के बारे में बारीकी से लिखते थे। जिस दिन मैच होता था वो रात को भी जाग कर मैच देखते थे। बाईपास सर्जरी होने के बाद भी वो मैच के प्रति अपने मोह को नहीं त्याग पाये। भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंदूलकर के बहुत बडे प्रशंसक थे। जोशी जी ने खेल पत्रकारिता को भी कई नए शब्द दिये हैं, वो बॉलर को “गोलंदाज” लिखते थे। इस तरह की शैली की वज़ह से प्रभाष जी के खेल पर लिखे लेखों को लोग बहुत पसन्द करते थे। जिस दिन उन्होंने इस दुनिया से विदा ली उसके पहले दिन भी वो आस्ट्रेलिया और भारत का क्रिकेट मैच देख रहे थे। इसके अगले दिन ही उन्हें दो हजार किलोमीटर की यात्रा करनी थी लेकिन फिर भी वो आधी रात तक मैच देखते रहे। सचिन के सत्रह हजार रन पूरे होने पर वो इस तरह से खुश हुए कि बच्चों की तरह कूद पडे़। और जब आखिरी ओवर की आखिरी गेंद पर भारत हार गया तो उनका इस पर कहना था कि ये लोग हारने में एक्सपर्ट हैं। लेकिन दुख कि ये बात है कि जिस समय सचिन को एक ओर मैन ऑफ द मैच दिया जा रहा था तो वही दूसरी ओर प्रभाष जोशी जी को गाड़ी से अस्पताल ले जाया जा रहा था। वो सचिन को मैन ऑफ द मैच पुरस्कार मिलते नहीं देख पाये। प्रभाष जी के इस दुनिया से चले जाने के बाद सचिन ने दुख जताते हुए कहा कि अब मेरा गाईड चला गया है। मैं शुरु से ही प्रभाष जी का लिखा पढ कर अपनी गलतियां सुधारता रहा हूं।
अगर हम बात करें उनके दूसरे विषय कि तो वो था राजनीति, जिस पर वो बैखोफ होकर लिखते थे। उनकी कलम का शिकार लगभग देश का हर प्रधानमंत्री और हर नेता हुआ है। वो नताओं से दोस्ती का नाता रखने के बाद भी उनकी धज्जियां उडाते रहते थे। उनकी लिखी हुई किताब “हिंन्दू होने का धर्म” में आडवाणी को एक फर्जी हिन्दू बताया है। लेकिन इसके बावजूद भी गांधी शांति प्रतिष्ठान में उन्हें आखिरी विदा कहने आडवाणी भी आये थे और वो बहुत ही दुखी थे। इसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी जी का जो श्रद्धांजली लेटर आया था उसमें प्रभाष जी को घनिष्ठ मित्र बताया।
प्रभाष जोशी मीडिया में जिसके खिलाफ थे वो था पत्रकारिता का व्यवसायिकरण। वो हमेशा ही इसके खिलाफ रहे और इसका विरोध करते रहे। मरते दम तक जोशी जी ने पत्रकारिता में फैले व्यवसायिकरण का विरोध किया है। चुनावों में से जिस तरह से मीडिया ने न्यूज कंटेंट बेचने शुरु किये कर दिये इससे वो बहुत दुखी थे। इसके विरोध में उनका कहना था कि “ऐसे अखबारों को रजिस्ट्रेशन रद्द करके प्रिंटिंग प्रेस के लाईसेंस दे देने चाहिए”। ऐसे मामलों की जांच के लिए उन्होंने चुनावों में निगरानी कमेटियां भी बनाई थी। यह उनकी मजबूती ही थी कि उम्र के इस पड़ाव में भी उन्होंने राजनीतिक दलों से प्रेरित पैकेज पत्रकारिता का विरोध किया। इंडियन एक्सप्रेस समूह के मालिक रामनाथ गोयनका से लेकर सभी लोग उनकी पत्रकारिता के कायल थे, उनका सम्मान करते थे।
प्रभाष जोशी जी का जन्म 15 जुलाई 1937 को मध्यप्रदेश के सिहोर जिले के अस्टा गांव में हुआ था। नई दुनिया से अपना पत्रकारिता कैरियर शुरु करने के बाद जोशी जी ने लंदन जाकर मैनचैस्टर गार्डियन में काम किया, लेकिन उन्होंने लंदन में कुछ ही दिन काम किया उसके वो फिर इंडिया लौट आये। इंडियन एक्सप्रेस का तीन चार जगह रेजीडेंट एडिटर रहते हुए उन्हें इस ग्रुप के सीईओ बनने का ऑफर मिला लेकिन इन्होंने इसे ठुकराते हुए 1983 में जनसत्ता हिन्दी समाचारपत्र में काम करना स्वीकार किया और जनसत्ता को बुलंदियों तक पहुंचाया। जनसत्ता हमेशा अपने को लीक से हटा कर रखता था। जिन मुद्दो पर कोई चर्चा नही करता था वो उन्हीं मुद्दो को उठाते थे और उस पर चर्चा करते थे।
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