विरोध का जनतंत्र बनाम कारपोरेट मीडिया प्रबंधित जनतंत्र

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आनंद प्रधान, एसोसिएट एडिटर आईआईएमसी

देश-दुनिया में राजनीतिक झंझावातों और छोटे-बड़े राजनीतिक परिवर्तनों, सामाजिक-आर्थिक उथल-पुथल और प्राकृतिक-मानव निर्मित त्रासदियों के बीच एक और साल गुजर गया। कई मामलों में काफी हद तक गुजरे सालों से मिलता-जुलता होने के बावजूद कई मामलों में यह साल बहुत खास रहा। देश के लिए भी और दुनिया के लिए भी।
 
निश्चय ही, इस साल को पारिभाषित करने वाली सबसे महत्वपूर्ण परिघटना दुनिया भर में कारपोरेट लूट, भ्रष्टाचार, बढ़ती सामाजिक-आर्थिक गैर बराबरी-विषमता और तानाशाही के खिलाफ और सच्चे जनतंत्र के लिए भड़के आन्दोलनों, विरोध प्रदर्शनों और कब्ज़ा-घेराव-धरना-हड़ताल में आम लोगों खासकर मध्य वर्ग की बड़े पैमाने पर हिस्सेदारी थी।
 
आश्चर्य नहीं कि मशहूर समाचार पत्रिका “टाइम” ने वर्ष २०११ के ‘पर्सन आफ द इयर’ के बतौर उन ‘प्रदर्शनकारियों’ को चुना है जिन्होंने अरब जगत में ट्यूनीशिया से लेकर मिस्र में दमनकारी तानाशाहियों, यूरोप में बड़ी पूंजी को खुश करने के लिए सामाजिक सुरक्षा में कटौतियों और अमेरिका में कारपोरेट और आवारा पूंजी के लालच और हवस के खिलाफ ‘वाल स्ट्रीट कब्ज़ा करो’ (आक्युपाई वाल स्ट्रीट) से लेकर भारत में कारपोरेट और राजनीतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल के लिए शुरू हुए आन्दोलनों की अगुवाई की है।
 
इन आम प्रदर्शनकारियों ने इस साल को बहुत खास बना दिया. इसमें कोई दो राय नहीं है कि ये आंदोलन, विरोध प्रदर्शन और प्रदर्शनकारी कई मायनों में पहले के आन्दोलनों, विरोधों और प्रदर्शनकारियों से अलग थे।
 
उनकी सक्रियता, भागीदारी, गोलबंदी से लेकर विरोध प्रदर्शनों के तरीकों और सबसे बढ़कर उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों ने न सिर्फ देश-दुनिया का ध्यान खींचा बल्कि उसके राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक एजेंडे पर कई नए वालों और मुद्दों को खड़ा कर दिया है।
 
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन आन्दोलनों ने एक बार फिर बहुत मजबूती से यह साबित करने की कोशिश की है कि लोकतंत्र को लोकतंत्र बनाने में लोगों की सक्रिय भागीदारी, गोलबंदी, उनके आन्दोलनों और विरोध प्रदर्शनों की बहुत बड़ी भूमिका है।
 
सच पूछिए तो लोकतंत्र की आत्मा है स्थापित-यथास्थितिवादी सत्ताओं और शासक वर्गों और उनके एजेंडे के खिलाफ असहमति के स्वर, विरोध प्रदर्शन और उन्हें चुनौती देनेवाले बदलाव के आंदोलन। इस मायने में बीते साल दुनिया भर में कारपोरेट भूमंडलीकरण, नव उदारवादी अर्थनीतियों, आवारा पूंजी की मनमानी और तानाशाही के बीच निरंतर सिकुड़ते और दमनकारी होते पूंजीवादी लोकतंत्रों में असहमति की तेज होती आवाजों और विरोध प्रदर्शनों की नई लहरों ने लोकतंत्र की आत्मा को पुनरुज्जीवित करने की कोशिश की है।
 
यही नहीं, इन आन्दोलनों ने राजनीति के नए मुहावरे गढे हैं, उनके मुद्दों-नारों ने समतामूलक, न्यायपूर्ण और सच्चे लोकतंत्र की लड़ाइयों को नया आवेग दिया है और लोगों खासकर मध्यवर्ग को घरों से बाहर सड़कों पर उतरने के लिए प्रेरित किया है।
 
लेकिन इन विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों के बीच मुख्यधारा का मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया कहाँ खड़ा है? यह ऐसा सवाल है जो कारपोरेट मीडिया को खुद से जरूर पूछना चाहिए। यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जो कारपोरेट मीडिया खुद को ‘जन माध्यम’ (मास मीडिया) कहता है, उसका ‘जन यथार्थ’ (मास रीयलिटी) से कितना सम्बन्ध रह गया है?
 
कहने की जरूरत नहीं है कि दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में तानाशाही और नव उदारवादी अर्थनीति के खिलाफ फूट पड़े इन विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों के प्रति कारपोरेट मीडिया का शुरूआती रुख उपेक्षा और सिरे से ख़ारिज करने का था।
 
लेकिन जब नजरंदाज करना मुश्किल होने लगा तो उसके प्रति एक शक-संदेह और हैरानी से भरा भाव सामने आया और उसकी खिल्ली उड़ाने की कोशिश की गई।
 
लेकिन जब विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों का दायरा बढ़ने और उनकी आवाज़ और तेज होने लगी तो कारपोरेट मीडिया ने अपना ट्रैक बदलकर एक ओर उन्हें यूटोपियन, आदर्शवादी, अव्यवहारिक और अराजक बताना शुरू कर दिया, वहीँ दूसरी ओर, उसे हड़पने में भी जुट गया।
 
यही कारण है कि जो विरोध प्रदर्शन उसके अपने निहित स्वार्थों और हितों के अनुकूल थे, उन्हें उसने बढ़-चढ़कर समर्थन दिया, यहाँ तक कि इन प्रदर्शनों को गोद ले लिया लेकिन जहां भी ये विरोध प्रदर्शन और आंदोलन सीधे उनके कारपोरेट हितों पर चोट कर रहे थे, उन्हें यूटोपियन से लेकर खलनायक बनाने में कोई कोर कसर नहीं उठा रखी।
 
उदाहरण के लिए पश्चिमी कारपोरेट मीडिया ने जिस तरह से अरब वसंत से लेकर रूस में पुतिन विरोधी प्रदर्शनों तक को हाथों-हाथ लिया, उसी तरह का उत्साह आक्युपाई वाल स्ट्रीट और ग्रीस से लेकर इटली में बजट और सामाजिक सुरक्षा में कटौतियों के खिलाफ भड़के विरोध प्रदर्शनों के प्रति नहीं दिखाई पड़ा।
 
वैश्विक कारपोरेट मीडिया में अरब वसंत खासकर सीरिया और लीबिया में हुए विरोध प्रदर्शनों के प्रति न सिर्फ अतिरिक्त उत्साह दिखाई पड़ा बल्कि उन्होंने असद और गद्दाफी सरकार के खिलाफ एक तरह का मोर्चा खोल दिया।
 
पश्चिमी मीडिया का यह पूर्वाग्रह खुलकर दिखाई पड़ा। उन्होंने सीरिया, ईरान और लीबिया में मानवीय आधार और परमाणु हथियारों के खतरे के मद्देनजर नाटो/अमेरिकी सैन्य कार्रवाई के लिए जनमत बनाने की पूरी कोशिश की।
 
हैरानी की बात नहीं है कि लीबिया में गद्दाफी को एक क्रूर तानाशाह के बतौर पेश करते हुए पश्चिमी मीडिया ने नाटो की सैन्य कार्रवाई को खुलकर समर्थन दिया. हालांकि इसमें कुछ भी नया नहीं है। यह पश्चिमी वैश्विक कारपोरेट मीडिया की पुरानी रणनीति है. इस मायने में वह काफी हद तक अमेरिकी विदेश विभाग और नाटो के प्रवक्ता की तरह काम करता है।
 
सच यह है कि वह ऐसी सैन्य कार्रवाइयों के लिए जनमत बनाने के जरिये जमीन तैयार करता है. लीबिया में गद्दाफी शासन के अंत के बाद इस वैश्विक कारपोरेट मीडिया के निशाने पर सीरिया, ईरान और उत्तर कोरिया हैं जिनके खलनायकीकरण का अभियान जोर-शोर से जारी है।
 
आश्चर्य नहीं होगा अगर वर्ष २०१२ में वैश्विक कारपोरेट मीडिया की मदद से अमेरिका/नाटो इन्हें सैन्य निशाना भी बनाएं।
 
लेकिन इसके ठीक उलट इन बहुराष्ट्रीय वैश्विक मीडिया कंपनियों ने यूरोप और अमेरिका में कारपोरेट पूंजीवाद और नव उदारवादी अर्थनीतियों के खिलाफ भड़के लोगों के गुस्से, विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों को उस तरह का सहानुभूतिपूर्ण कवरेज तो दूर उन्हें तथ्यपूर्ण, वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष कवरेज भी नहीं दिया। यह स्वाभाविक भी था।
 
असल में, इन विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों खासकर आक्युपाई वाल स्ट्रीट प्रदर्शनों में सिर्फ बड़े कारपोरेट समूह, सत्ता प्रतिष्ठान और राजनीतिक वर्ग ही निशाने पर नहीं थे बल्कि खुद कारपोरेट मीडिया और उसका झूठ भी निशाने पर थे।
 
सच पूछिए तो इस आंदोलन ने जिस तरह से मुख्यधारा के कारपोरेट मीडिया को नकार दिया और नए और वैकल्पिक मीडिया के जरिये लोगों के बीच सूचना-संवाद-बहस और गोलबंदी शुरू की है, वह भविष्य की ओर संकेत करता है।
 
 
 
यह कारपोरेट मीडिया के लिए खतरे की घंटी है. उसकी विश्वसनीयता दिन पर दिन नीचे की ओर जा रही है. बीते साल में भी कई ऐसी घटनाएँ हुईं जिनसे वैश्विक कारपोरेट मीडिया की विश्वसनीयता और साख को और गहरा धक्का लगा है।
 
खासकर ब्रिटेन में जिस तरह से मीडिया मुग़ल रूपर्ट मर्डोक और उनकी कंपनी न्यूज इंटरनेशनल की गैरकानूनी और अनैतिक गतिविधियां सामने आईं हैं और उसके खिलाफ लोगों का गुस्सा फूटा है, वह इस बात का सबूत है कि बड़े वैश्विक मीडिया समूहों के लिए आगे का रास्ता इतना आसान नहीं होगा. उनकी सार्वजनिक जांच पड़ताल बढ़ेगी और उनसे अब कहीं ज्यादा जवाबदेह होने की मांग की जायेगी.
 
यही नहीं, उनके लिए शासक वर्गों के हित में सूचनाओं और विमर्शों का प्रबंधन करना भी उतना आसान नहीं रह गया है. इस मायने में बीता साल पारंपरिक कारपोरेट मीडिया का नहीं बल्कि नए माध्यमों खासकर विकीलिक्स जैसे मंचों और सोशल नेटवर्किंग साइट्स का था.
 
रैडिकल समूहों ने लोगों को जागरूक बनाने से लेकर उन्हें गोलबंद करने और सामूहिक कार्रवाइयों में उतारने में इन नए माध्यमों का जिस तरह से खुलकर उपयोग किया है, उसने कारपोरेट मीडिया के साथ-साथ सत्ता प्रतिष्ठानों और शासक वर्गों को भी सतर्क कर दिया है. आश्चर्य नहीं कि इस साल सरकारों के निशाने पर ये नए माध्यम भी आ गए हैं। (लेखक के ब्लॉग तीसरा रास्ता से साभार)

 

  • 17/05/2012

    वर्तिका नंदा, मीडिया विश्लेषक.
    तस्वीरें काफी तेजी से बदलती हैं। जुलाई 2007 में को मीडिया की सुर्खियां प्रतिभा सिंह पाटिल थीं - देश की पहली महिला राष्ट्रपति, सौम्य, सजग, संवेदनशील वगैरह। उनके लिए वे तमाम विश्लेषण इस्तेमाल किए गए जो किसी की गरिमा को चार चांद लगा सकें।
     

  • 14/05/2012

    एनके सिंह, ग्रुप एडिटर, साधना न्यूज

    सम्प्रेषण के मूल सिद्धान्तों में जो एक सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त है वह यह कि सम्प्रेषण तभी कारगर होता है जब लक्षित सामाजिक समूह की चेतना के साथ तादात्म्य बना सकें। अगर संदेश के लिए गलत माध्यम चुना गया या उसकी विषय-वस्तु उसे समाज-समूह की समझ से परे रहा तब संदेश संप्रेषण बेमानी हो जाता है। सरकार की क्षेत्रीय चैनलों को लेकर नई नीति इस दिशा में एक सार्थक प्रयास है। इस नई नीति के तहत भारत सरकार न केवल क्षेत्रीय चैनलों के माध्यम से अपने कार्यक्रमों का विज्ञापन करेगी बल्कि इन चैनलों के रिपोर्टरों को अपने कार्यक्रमों के बारे में बताते हुए इन कार्यक्रमों की मॉनिटरिंग के प्रति भी रुझान पैदा करेगी
  • 10/05/2012

    संजय द्विवेदी, प्रोफेसर, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय

    हिंदुस्तान में रहते हुए हम किसी भी इलाके में जाएं उर्दू हमारा साथ नहीं छोड़ती। वह हिंदी की ही तरह राष्ट्रभाषा है, जिसकी जमीन बहुत व्यापक और जड़ें बहुत गहरी हैं। पाकिस्तान के निर्माण ने उर्दू की इस रफ्तार को रोक दिया। उर्दू एक खास तबके की भाषा बनकर रह गयी। वह हिंदुस्तानी जबान से एक कौम की जबान बन गयी या बना दी गयी। ऐसे समय में उर्दू सहाफत (पत्रकारिता) पर बात करना सच में अतीत के उन सुनहरे पन्नों को टटोलने की कोशिश है

  • 07/05/2012
    वर्तिका नन्दा
    वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक
    आमिर के बहाने ही सही, शायद सच को इस बार जीतने में मदद मिल जाए। बरसों पहले रामायण और महाभारत वाले सुबह के स्लाट पर आमिर ने सामाजिक सरोकारों पर कुछ नया करने की कोशिश की। मुबारक आमिर,मुबारक उदय शंकर, मुबारक स्टार।
  • 30/04/2012

    आनंद प्रधान, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएमसी
    बाबाओं का साम्राज्य सिर्फ धार्मिक चैनलों तक सीमित नहीं है. मनोरंजन चैनलों से लेकर न्यूज चैनलों तक पर भी सुबह की कल्पना उनके बिना संभव नहीं है. इन बाबाओं/बापूओं/स्वामियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि धर्म और ईश्वर भक्ति से उनका बहुत कम लेना-देना है.