विज्ञापनी पत्रकारिता के बीच

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वर्तिका नन्दा, वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक
 
विज्ञापन के दौर में आ गई पत्रकारिता के लिए यह साल बहुत रोचक और चुनौतीपूर्ण होने वाला है। इंदिंरा के बाद कौन, राजीव के बाद जैसे सवालों से भारतीय जनता का सामना हमेशा हुआ। अब अन्ना के बाद कौन। अन्ना के जिस ब्रांड के भरोसे मीडिया का बाजार गुलाबी हुआ, वह बहुत ही जल्द फीका भी पड़ गया। मुद्दे उठे, लाइव रिपोर्टिंग हुई, संसद तक में हंगामा भी पर फिर सब कुछ पूरी तरह से ठस्स।
              
तो यह पत्रकारिता का एक नया चेहरा है। यहां व्यक्ति विशेष या मुद्दा विशेष एकाएक परम जरूरी हो जाता है और फिर एकाएक गायब। पर न्यूज से विज्ञापन गायब नहीं होते। वे अलग-अलग तरीकों से कायम रहते हैं।
 
एक न्यूज चैनल पर हाल ही एंकर जिस लैपटाप का इस्तेमाल कर रहे थे, उस पर मसाले की एक कंपनी का विज्ञापन बचकाने तरीके से चिपक था। कुछ यूं कि विज्ञापन बड़ा और लैपटाप छोटा दिख रहा था। यह सीधा विज्ञापन है। लैपटाप इस कंपनी से मुफ्त मिला है सो हम उसे प्रचारित कर रहे हैं । यह हास्यास्पद है पर बहुत खतरनाक नहीं पर दूसरे विज्ञापन तुरंत जनता की पकड़ में नहीं आते। वारदात में यह बताया जाना कि कैसे शाहरूख खान की फिल्म के आने से पहले पाइरेसी का बाजार चल निकला है और कितने करोड़ का कारोबार करने वाला है, महज खबर नहीं है और महज अपराध नहीं है। यह एक प्रचार है। फिल्मी सितारों का बड़े परे की बजाय छोटे परदे पर ज्यादा समय बिताते हुए बार-बार यह बताना कि किस फिल्म के शूट के दौरान क्या-क्या हुआ भी कोई खबर नहीं है।
 
तो इस साल खबर की दुनिया को गैर-जरूरी प्रचारों से जूझने के बारे में सोचना होगा। जनता फिलहाल नासमझ है पर उसकी नासमझी का थर्मामीटर छ महीने बाद भी यहीं पर टिका रहेगा, यह कतई जरूरी नहीं। कैमरों को अब समाज की तरफ मुड़ने की कोई रणनीति बनानी होगी। जहां पैसा भी आए पर साथ ही मीडिया के मीडिया होने की शर्तें भी पूरी हों। यह जनता है और जनता आखिरकार सब कुछ जानती भी है।  
 
  • 17/05/2012

    वर्तिका नंदा, मीडिया विश्लेषक.
    तस्वीरें काफी तेजी से बदलती हैं। जुलाई 2007 में को मीडिया की सुर्खियां प्रतिभा सिंह पाटिल थीं - देश की पहली महिला राष्ट्रपति, सौम्य, सजग, संवेदनशील वगैरह। उनके लिए वे तमाम विश्लेषण इस्तेमाल किए गए जो किसी की गरिमा को चार चांद लगा सकें।
     

  • 14/05/2012

    एनके सिंह, ग्रुप एडिटर, साधना न्यूज

    सम्प्रेषण के मूल सिद्धान्तों में जो एक सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त है वह यह कि सम्प्रेषण तभी कारगर होता है जब लक्षित सामाजिक समूह की चेतना के साथ तादात्म्य बना सकें। अगर संदेश के लिए गलत माध्यम चुना गया या उसकी विषय-वस्तु उसे समाज-समूह की समझ से परे रहा तब संदेश संप्रेषण बेमानी हो जाता है। सरकार की क्षेत्रीय चैनलों को लेकर नई नीति इस दिशा में एक सार्थक प्रयास है। इस नई नीति के तहत भारत सरकार न केवल क्षेत्रीय चैनलों के माध्यम से अपने कार्यक्रमों का विज्ञापन करेगी बल्कि इन चैनलों के रिपोर्टरों को अपने कार्यक्रमों के बारे में बताते हुए इन कार्यक्रमों की मॉनिटरिंग के प्रति भी रुझान पैदा करेगी
  • 10/05/2012

    संजय द्विवेदी, प्रोफेसर, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय

    हिंदुस्तान में रहते हुए हम किसी भी इलाके में जाएं उर्दू हमारा साथ नहीं छोड़ती। वह हिंदी की ही तरह राष्ट्रभाषा है, जिसकी जमीन बहुत व्यापक और जड़ें बहुत गहरी हैं। पाकिस्तान के निर्माण ने उर्दू की इस रफ्तार को रोक दिया। उर्दू एक खास तबके की भाषा बनकर रह गयी। वह हिंदुस्तानी जबान से एक कौम की जबान बन गयी या बना दी गयी। ऐसे समय में उर्दू सहाफत (पत्रकारिता) पर बात करना सच में अतीत के उन सुनहरे पन्नों को टटोलने की कोशिश है

  • 07/05/2012
    वर्तिका नन्दा
    वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक
    आमिर के बहाने ही सही, शायद सच को इस बार जीतने में मदद मिल जाए। बरसों पहले रामायण और महाभारत वाले सुबह के स्लाट पर आमिर ने सामाजिक सरोकारों पर कुछ नया करने की कोशिश की। मुबारक आमिर,मुबारक उदय शंकर, मुबारक स्टार।
  • 30/04/2012

    आनंद प्रधान, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएमसी
    बाबाओं का साम्राज्य सिर्फ धार्मिक चैनलों तक सीमित नहीं है. मनोरंजन चैनलों से लेकर न्यूज चैनलों तक पर भी सुबह की कल्पना उनके बिना संभव नहीं है. इन बाबाओं/बापूओं/स्वामियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि धर्म और ईश्वर भक्ति से उनका बहुत कम लेना-देना है.