मीडिया के इंडियन आइडल

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मृणाल पाण्डे, वरिष्ठ पत्रकार
 
महाभारत में मार्कण्डेय युधिष्ठिर के आगे कलियुग का जो खाका खींचते हैं, उसके अनुसार कलियुग में लोग देवपूजक के बजाय ऐडूक (अस्थियों पर बने मठ) पूजक बन जाएंगे। मीडिया में, खासकर हिंदी मीडिया में, इधर यह बहुत तेजी से होता दिख रहा है। मीडिया के मान्य दिवंगत बुजुर्गों ने अपने जीवनकाल में जो कहा और लिखा, उसे नज़ीर मानकर इस पेशे को अब स्वयं आगे बढ़ाने के बजाय, अकसर स्वघोषित चेले उनके नाम पर न्यास बनाने, आडंबरी आयोजनों में जुट रहे हैं। महिला विमर्श के नाम पर भी प्रायः अवर्ण बनाम सवर्ण, वाम बनाम दक्षिण खेमेबंदी को शह दी जा रही है। जिसके बाद कुछ नाखुश पत्रकार उतनी ही मुखरता से न्यास तथा उसके सदस्यों या महिला लेखिकाओं को लेकर बेवजह अपनी बिरादरी के तमाम गड़े मुर्दे उखाड़ने में जुट जाते हैं। हिंदी मीडिया से आज भी गंभीर स्नेह व सरोकार रखने वाले लोगों के लिए इस तरह की आपाधापी दुखद और शर्मनाक है।
 
यह अनायास नहीं कि देश की राष्ट्रपति, मुख्य चुनाव आयुक्त तथा मीडिया व राजनीति के पुरोधाओं की तरफ से मीडिया में बढ़ते छिछोरेपन, गहराते भ्रष्टाचार तथा मीडिया संस्थानों द्वारा पैसा लेकर खबरें छापने पर, इधर लगातार कई गंभीर टिप्पणियां जारी हुई हैं। ये टिप्पणियां मीडियाकारों के एक भाग में कायम इस खुशफहमी को सिरे से निरस्त करती हैं, कि आज के पतनशील समय में जनता के आगे मीडिया ही सार्वजनिक जीवन में अन्याय के मारों का वह जहांगीर है, जिसके दर पर घंटा बजाने या एसएमएस भेजने वाला हर शख्स न्याय पाता है, कि पत्रकार चाहें, तो चुटकी बजाते बड़े से बड़े आदमी की साख बना या मिटा सकते हैं।
 
सच तो यह है कि लोकतंत्र के सभी पायों की तरह मीडिया में भी समय के साथ भले व बुरे, दोनों किस्म के तत्व पनप आए हैं। हिंदी मीडिया की बात करें, तो जो विराट प्रभाव क्षेत्र, पूंजी निवेश और तकनीकी तरक्की उसे आज हासिल है, जो दसेक साल पहले अकल्पनीय था। हिंदी पट्टी में हर बड़े अखबार के आज दर्जन से अधिक सुंदर रंगीन छपाई वाले सुघड़ संस्करण हैं, जो पूरी दुनिया में कहीं भी पढ़े जा सकने वाले ई-संस्करण तथा ब्लॉग भी पाठकों को दे रहे हैं। उन सभी के लिए निजी व सार्वजनिक क्षेत्र के विज्ञापन उपलब्ध हैं, हर प्रांत में दुर्गम इलाकों से भी ताजातरीन खबरें तुरंत पाने की क्षमता, यह सब, भाषाई अखबारों को पहले कहां उपलब्ध था? और यह मानने में भी कोई हर्ज नहीं कि इससे हिंदी अखबारों का स्वरूप और उसकी खबरों तथा पाठकों का दायरा, दोनों के लिए अथाह संभावनाएं उपजी हैं। पर ईमान से पूछिए कि जनहित में मीडिया की इस नई ताकत का कितना समायोजन हुआ है? उत्तर मिलेगा, लगभग नहीं। वजह क्या है?
 
हाल में जब हिंदी के पत्रकार अपनी अक्षमता का पूरा ठीकरा भ्रष्ट पाठकीय रुचि या पूंजीवादी बाजार के सिर पर फोड़ रहे थे, मीडिया फाउंडेशन तथा द हूट पोर्टल द्वारा पेड न्यूज पर प्रेस काउंसिल की ताजा रपट पर एक संजीदा संगोष्ठी की गई। उसमें कई वरिष्ठ पत्रकारों ने कहा कि यह निराशाजनक है कि प्रेस काउंसिल ने पेड न्यूज मुद्दे पर 36,00 शब्दों की जो रपट अंततः अपनी वेबसाइट पर जारी की है, उसमें (परंजय गुहाठाकुरता के नेतृत्व में) बहुत मेहनत के साथ पड़ताल करके पेश की गई मूल 36,000 शब्दों की रपट का वह महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं है, जिसमें ठाकुरता समिति द्वारा दोषी पाए गए अखबारों तथा कर्मियों के नाम तथा सुनवाई के दौरान उनके द्वारा दिए गए बयानात थे। ठाकुरता की रपट पर ऊहापोह देखते हुए बारह सदस्यीय अन्य समिति बनाई गई। उसके द्वारा जारी रपट में सिर्फ संदर्भ वृत्त बनकर रह गई, जिसे हासिल करने के लिए सूचनाधिकार का प्रयोग करना होगा।
 
आज हिंदी मीडिया का असली संकट पाठकों के बीच अपनी विश्वसनीयता बचाए रखने का है। और इसकी चुनौती बाहर कम, भीतर ज्यादा गहरी है। मीडिया का काम खबर के नाम पर अफवाहबाजी करना या अपुष्ट सुबूतों के बूते बड़े लोगों पर कीचड़ उछालना नहीं, कई स्रोतों से लगातार गंभीर सूचनाएं इकट्ठा कर उनको व्यवस्थित बनाकर हर दिन पाठक को देना होता है। वरिष्ठ जनों का कर्तव्य यह भी होता है कि वे रातोंरात खोजी पत्रकारिता के इंडियन आइडल या सबसे तेज बनने के बचकाने आग्रह से खिंचे चले आए युवा मीडियाकर्मियों को आगाह करें, कि उत्साहातिरेक में खबर बंदर के हाथ का उस्तरा बनकर नाक भी कटवा सकती है। लालच या हड़बड़ी में राजनीतिक या कॉरपोरेट हितों की तरफ से एक गुप्त रणनीति के तहत लीक हुई खबरें कई बार उनके द्वारा स्वहित में छेड़े गुरिल्ला छायायुद्ध का हथियार भर साबित हुई हैं। फटाफट शोहरत से आत्ममुग्ध हिंदी मीडिया यह तो लगभग भुला बैठा है, कि किसी भले आदमी के खिलाफ खबर छापने से पहले उससे उसका पक्ष भी जानना कितना जरूरी है। एक पूरी फसल इस तरह के लोगों की खड़ी हो गई है, जो अपना, अपनी राजनीतिक सरपरस्त पार्टी तथा कंपनी के शेयर धारकों का हित धंधई उसूलों से ऊपर रखते हुए खबर बेच रहे हैं। अच्छा होता कि पेड न्यूज रपट उनका नाम सार्वजनिक कर उनको शर्मसार करती और दूसरों को चेताती।
 
पगड़ी संभाल इस सबके बावजूद हमारे पत्रकार अपने लिए किसी तरह की आचरण संहिता बनाए जाने की संभावना से बिदक रहे हैं। स्मरणीय है कि हमारे मीडिया की आजादी देश के नागरिकों को संविधान द्वारा दी गई सूचना पाने की आजादी (विषयक अनुच्छेद 19 ए) से ही निकली है। इसलिए सूचना में किसी भी तरह से घालमेल करना मीडिया को सीधे जनता तथा संविधान के आगे दोषी बनाता है। यदि सांविधानिक मर्यादा या पत्रकारीय शील की दुहाई कारगर न रह जाए, और मीडिया की छवि समाज में कपटी लुटेरों सरीखी बनती जाए, तो यकीन मानिए कि एक दिन आएगा, जब मीडिया के काली पट्टी जुलूस या पेन डाउन हड़ताल जैसे तेवर भी बेमतलब हो जाएंगे, क्योंकि अब तक हमारा सबसे बड़ा और काबिल पक्षधर, हमारी आजादी का जागरूक पहरूआ बना रहा समझदार पाठक, हमारी ही गलतियों से दुर्खी होकर हम से फिरंट हो चुका होगा।
(अमर उजाला से साभार)
 
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  • 30/01/2012

    प्रमोद जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

    ऑनलाइन संचार दुनिया भर में विचार का विषय है। बेशक इसके मार्फत धोखाधड़ी और हेरफेर के मामले भी सामने आ रहे हैं, पर किसी भी एक कार्रवाई का प्रभाव कितना दूरगामी होगा, इसे देखने की ज़रूरत भी है।

     

  • 20/01/2012

    वर्तिका नन्दा, वरिष्ठ मीडिया  विश्लेषक

    तीन दिनों तक प्रियंका ही खबरों में रहीं। उनकी मुस्कुराहट, उनके कपड़ों का रंग, हंसने की अदा, फुर्ती, हाजिरजवाबी, मन को मोहने वाली बातें, अपनी
    दादी से मिलता चेहरा, मिलनसारिता, उनके व्यक्तित्व का करिश्मा और भी न जाने क्या-क्या। हालांकि इनमें से किसी भी बात से इंकार नहीं किया जा सकता पर मीडिया की मुग्ध होती रिपोर्टिंग और रसीली एंकरिंग के कुछ पहलुओं पर इंकार जतलाना जरूरी लगता है।

     

  • 17/01/2012

    आनंद प्रधान, एसोसिएट एडिटर आईआईएमसी

    इन विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों खासकर आक्युपाई वाल स्ट्रीट प्रदर्शनों में सिर्फ बड़े कारपोरेट समूह, सत्ता प्रतिष्ठान और राजनीतिक वर्ग ही निशाने पर नहीं थे बल्कि खुद कारपोरेट मीडिया और उसका झूठ भी निशाने पर थे। सच पूछिए तो इस आंदोलन ने जिस तरह से मुख्यधारा के कारपोरेट मीडिया को नकार दिया और नए और वैकल्पिक मीडिया के जरिये लोगों के बीच सूचना-संवाद-बहस और गोलबंदी शुरू की है, वह भविष्य की ओर संकेत करता है।

     

  • 10/01/2012

    एन. के. सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

    नोबल पुरस्कार विजेता एवं विख्यात अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने इस साल के प्रथम सप्ताह में ही मीडिया की खराब गुणवत्ता की दो घटनाएं झेलीं। लोकपाल से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने जवाब दिया। अगले दिन जब उन्होंने देश के एक बड़े अंग्रेजी अखबार और कई टीवी चैनलों को देखा, तब उसमें शीर्षक पाया ‘लोकपाल विधेयक सूझ-बूझ से लाया गया बिल-अमत्र्य सेन’। जबकि कुछ अखबारों ने शीर्षक दिया था- ‘लोकपाल विधेयक बगैर सोचे-समझे लाया गया बिल- सेन’। एक अन्य आर्थिक समाचार पत्र ने एक दिन पहला शीर्षक दिया और दूसरे दिन दूसरा शीर्षक

  • 03/01/2012
    वर्तिका नन्दा, वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक
    विज्ञापन के दौर में आ गई पत्रकारिता के लिए यह साल बहुत रोचक और चुनौतीपूर्ण होने वाला है। इंदिंरा के बाद कौन, राजीव के बाद जैसे सवालों से भारतीय जनता का सामना हमेशा हुआ। अब अन्ना के बाद कौन। अन्ना के जिस ब्रांड के भरोसे मीडिया का बाजार गुलाबी हुआ, वह बहुत ही जल्द फीका भी पड़ गया। मुद्दे उठे, लाइव रिपोर्टिंग हुई, संसद तक में हंगामा भी पर फिर सब कुछ पूरी तरह से ठस्स।

टिप्पणी

मृणाल जी कि सभी बातों से मै

मृणाल जी कि सभी बातों से मै सहमत हूँ. खास तौर पर मीडिया कर्मियों के लिए एक आचार संहिता के सन्दर्भ मे मेरा भी मानना यही है कि जिस प्रकार का बाजारू रवैया आज का मीडिया कर्मी अपना रहा है, उससे सभी कि छवि धूमिल हो रही है. पाठक व दर्शक को बुरे मे से सबसे कम बुरा चुनना पड़ रहा है, यह हमारे लिए काफी शर्म की बात है. हमेशा की तरह, मृणाल जी का लेख अच्छा लगा...

achha laga. mukhar tippaniya

achha laga. mukhar tippaniya hamesha pasand ki jati hain, par hame yeh bhi salta hai. ki jab hamare hath me taqat thi, to hamne kya kiya, kitne imandaron ko apne sath joda....