बैगपाइपर पत्रकारिता के बीच

vartika new.jpg

वर्तिका नन्दा, वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक

तीन दिनों तक प्रियंका ही खबरों में रहीं। उनकी मुस्कुराहट, उनके कपड़ों का रंग, हंसने की अदा, फुर्ती, हाजिरजवाबी, मन को मोहने वाली बातें, अपनी दादी से मिलता चेहरा, मिलनसारिता, उनके व्यक्तित्व का करिश्मा और भी न जाने क्या-क्या। हालांकि इनमें से किसी भी बात से इंकार नहीं किया जा सकता पर मीडिया की मुग्ध होती रिपोर्टिंग और रसीली एंकरिंग के कुछ पहलुओं पर इंकार जतलाना जरूरी लगता है।

दरअसल गाना गाती यह रिपोर्टिंग चुनावी माहौल में ज्यादा मुखर तरीके से नोटिस में ली जाती है, ली जानी चाहिए भी। उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी के चुनावी दौरे के समय तमाम चैनल एक साथ प्रियंकामय हो गए तो बात उनके करिश्मे के साथ ही मीडिया के आचार-व्यवहार और चुनावी सीमाओं के पास भी जाकर पहुंची। माहौल चुनावी न होता तो शायद ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। समझा यही जाता कि मीडिया को भी खबर की अपनी जरूरतों को पूरा करना होता है और टीआरपी देखने होती है पर इस बार बात चुनावों की है। ऐसे में मीडिया की पुरानी किताबों को दोबारा खंगालने की जरूरत भी महसूस हुई। मीडिया आलोचक अडवर्ड एस हरमन और नोम चोमस्की ने 1988 में प्रोपोगेंडा मॉडल पर बात की थी जिसके मुताबिक निष्पक्षता को अगर नजर अंदाज किया जाए तो वह सरकार(सत्ता) और ताकतवर घरानों की तरफदारी की रिपोर्टिंग बन कर रह जाती है। 1957 में टाइम्स के संपादक डिलेन ने कहा था कि पत्रकार का काम एक इतिहासकार जैसा ही होता हैः उसे तथ्यों की बात करनी होती है पर साथ ही सुनिश्चित करना होता है कि सच को उसी रूप में दिखाया जाए जो पूरी तरह से खालिस हो और वहीं खत्म होता हो जहां तक वह जरूरी हो। उसका काम पाठक को स्टेटक्राफ्ट में ढाल कर सच परोसने का नहीं है। न्यूज मीडिया की हदें और सरहदें काफी हद तक तय हैं।

तो बात फिर प्रियंका की रिपोर्टिंग की। तीन साल बाद अचानक रायबरेली-अमेठी जाने पर प्रियंका को पलकों में बिठाया गया है। यहां इस शिकायत पर ज्यादा तवज्जो नहीं है कि वे अब तक अपने पारिवारिक क्षेत्र से इतने दिनों तक दूर क्यों रहीं। वे राजनीति में आने के बारे में सीधा और खाली जवाब क्यों नहीं देतीं और यह कि इस बात के मायने क्या हैं कि वे राहुल बाबा के कहने पर यहां आईं हैं। क्या किसी चुनावी क्षेत्र का दौरा सिर्फ अपने भाई की खुशी और सफलता की दरकार पर ही किया जाता है। इसके अलावा यह महिमामंडित प्रचार क्या पूरी तरह से चुनावी आचार संहिता के अंतर्गत आता है। सवाल कई हो सकते हैं। एक सवाल यह भी कौंधता है कि रिपोर्टिग का जो सुर हमने इन तीन दिनों में सुना और देखा, क्या यह वही होता अगर किसी और राजनीतिक चेहरे ने अरसे बाद अपने इलाके की सुध ली होती। क्या मीडिया तब भी गुड़ वाली गजकी पत्रकारिता करता और ओबी वान भगा-भगा कर अपने स्टार पत्रकारों के जरिए प्रियंका को स्टार कैंपेनर कहता।

प्रियंका के जादू से किसी को इंकार नहीं और न ही उनकी संवेदना से भरपूर भारतीय जनता पर पकड़ को किसी भी तरह से नकारा जा सकता है पर सवाल हमारा अपना है। क्या मीडिया का काम जादू की रिपोर्टिंग करना है। क्या उसका काम व्यक्ति केंद्रित होना है, क्या उसका काम (खास तौर पर चुनाव के समय पर) कौंधती रौशनी से नहाए किसी एक हिस्से को पूरी तरह से सर्वोपरि बना देना है। क्या मीडिया का काम असंतुलित होकर जागरण में बैठ जाना है। क्या आने वाले दिनों में रिपोर्टिंग को लेकर कई मापदंड तय किए जाएंगे और अगर हां, तो उन्हें कौन, कब करेगा। बैग पाइपर जर्नलिज्म को क्या जर्नलिज्म माना जाना चाहिए? मेरा सवाल यहीं से शुरू होता है।

 

  • 17/05/2012

    वर्तिका नंदा, मीडिया विश्लेषक.
    तस्वीरें काफी तेजी से बदलती हैं। जुलाई 2007 में को मीडिया की सुर्खियां प्रतिभा सिंह पाटिल थीं - देश की पहली महिला राष्ट्रपति, सौम्य, सजग, संवेदनशील वगैरह। उनके लिए वे तमाम विश्लेषण इस्तेमाल किए गए जो किसी की गरिमा को चार चांद लगा सकें।
     

  • 14/05/2012

    एनके सिंह, ग्रुप एडिटर, साधना न्यूज

    सम्प्रेषण के मूल सिद्धान्तों में जो एक सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त है वह यह कि सम्प्रेषण तभी कारगर होता है जब लक्षित सामाजिक समूह की चेतना के साथ तादात्म्य बना सकें। अगर संदेश के लिए गलत माध्यम चुना गया या उसकी विषय-वस्तु उसे समाज-समूह की समझ से परे रहा तब संदेश संप्रेषण बेमानी हो जाता है। सरकार की क्षेत्रीय चैनलों को लेकर नई नीति इस दिशा में एक सार्थक प्रयास है। इस नई नीति के तहत भारत सरकार न केवल क्षेत्रीय चैनलों के माध्यम से अपने कार्यक्रमों का विज्ञापन करेगी बल्कि इन चैनलों के रिपोर्टरों को अपने कार्यक्रमों के बारे में बताते हुए इन कार्यक्रमों की मॉनिटरिंग के प्रति भी रुझान पैदा करेगी
  • 10/05/2012

    संजय द्विवेदी, प्रोफेसर, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय

    हिंदुस्तान में रहते हुए हम किसी भी इलाके में जाएं उर्दू हमारा साथ नहीं छोड़ती। वह हिंदी की ही तरह राष्ट्रभाषा है, जिसकी जमीन बहुत व्यापक और जड़ें बहुत गहरी हैं। पाकिस्तान के निर्माण ने उर्दू की इस रफ्तार को रोक दिया। उर्दू एक खास तबके की भाषा बनकर रह गयी। वह हिंदुस्तानी जबान से एक कौम की जबान बन गयी या बना दी गयी। ऐसे समय में उर्दू सहाफत (पत्रकारिता) पर बात करना सच में अतीत के उन सुनहरे पन्नों को टटोलने की कोशिश है

  • 07/05/2012
    वर्तिका नन्दा
    वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक
    आमिर के बहाने ही सही, शायद सच को इस बार जीतने में मदद मिल जाए। बरसों पहले रामायण और महाभारत वाले सुबह के स्लाट पर आमिर ने सामाजिक सरोकारों पर कुछ नया करने की कोशिश की। मुबारक आमिर,मुबारक उदय शंकर, मुबारक स्टार।
  • 30/04/2012

    आनंद प्रधान, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएमसी
    बाबाओं का साम्राज्य सिर्फ धार्मिक चैनलों तक सीमित नहीं है. मनोरंजन चैनलों से लेकर न्यूज चैनलों तक पर भी सुबह की कल्पना उनके बिना संभव नहीं है. इन बाबाओं/बापूओं/स्वामियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि धर्म और ईश्वर भक्ति से उनका बहुत कम लेना-देना है.