प्रवासी क्षेत्रीय पत्रकारिता का उदय

alok-tomar.gif

आलोक तोमर,एडिटर, डेटलाइन इंडिया

अगर हैदराबाद से दैनिक मिलाप निकल सकता है, बंगलुरु से राजस्थान पत्रिका के रहते दक्षिण भारत राष्ट्रमत जैसा अखबार सिर्फ निकल ही नहीं सकता बल्कि सफल भी हो सकता है, गुजरात से निकलने वाला विराट वैभव दिल्ली से अपना संस्करण निकालने की हिम्मत कर सकता है, पंजाबी भाषी जालंधर से न सिर्फ बहुत बड़ा हिंदी अखबार पंजाब केसरी और अजीत समाचार निकलते हैं और उत्तर भारत के जागरण, अमर उजाला और दैनिक भास्कर को भी वहां जा कर सफलता मिलती हैं तो इससे एक सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर अहिंदी भाषी के नाम पर जिन इलाकों को किनारे कर दिया जाता है और जिनके बारे में कोई सोचता तक नहीं वहां हिंदी का अस्तित्व और वर्चस्व पत्रकारिता में कैसे बना हुआ है?
 
मुंबई से यशोभूमि नाम का एक दैनिक निकलता है जो आपको शायद अभिजात घरो के शानदार ड्रॉइंग रूम में नहीं दिखे लेकिन हर टेक्सी में ड्राइवर के पास रखा हुआ मिल जाएगा और अगर आपके नल ठीक करने या दूध का हिसाब करने के लिए लोग आते हैं जो आम तौर पर मुंबई में हिंदी भाषा ही होते हैं, तो यशोभूमि के पाठक वे भी होते हैं। मुंबई से राज और उद्वव ठाकरे के हिंदी विरोधी आंदोलन के बावजूद उदयपुर का प्रातः काल पनप रहा है और काफी लोकप्रिय है।
 
कोलकाता में सन्मार्ग की तूती कई बांग्ला अखबारो से ज्यादा जोर से बोलती है। वैसे भी बंगाल हिंदी पत्रकारिता का तीर्थ रहा है। देश का पहला अखबार यहां से निकला और पहला हिंदी अखबार भी यहां से निकला। यहां से निकलने वाला विश्वमित्र एक जमाने में काफी लोकप्रिय था और फिल्मों में जब किसी अखबार को दिखाने की जरूरत पड़ती थी तो विश्वमित्र ही दिखाया जाता था। दूर पूर्वोत्तर में गुवाहाटी में हिंदी के दो अखबार निकलते हैं और दोनांे ही कारोबार के हिसाब से पर्याप्त सफल है। पूर्वांचल प्रहरी और सेंटिनल के बगैर वहां के हजारों पाठकों का काम नहीं चलता।
 
यह पहेली नहीं हैं। आखिर एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश रोजगार या कारोबार के सिलसिले में गए लोगों को अपने गांव, देहात की याद आती ही है। वे वहां के हालात के बारे में सूचित और सचेत रहना चाहते हैं। इसीलिए कोलकाता और गुवाहाटी में रहने वाले मारवाड़ियों को अगर सूरतगढ़, सुजानगढ़ और शेखावाटी की खबरे हजारो मील दूर मिल जाती है तो उनके लिए इससे ज्यादा संतोष की बात और क्या हो सकती है? यही काम प्रातः काल मुंबई में राजस्थान पत्रिका और राष्ट्रमत बंगलुरु में कर रहे हैं।
 
यशोभूमि की सफलता की अलग कहानी हैं। मुंबई में ज्यादातर हिंदीभाषी पूर्वी उत्तर प्रदेश के तीन चार जिलों के हैं। जौनपुर, गाजीपुर, मिर्जापुर और सुल्तानपुर। टेक्सी चालक तो लगभग शत प्रतिशत इन्हीं जिलों के हैं। यशोभूमि की सबसे खासियत यह है कि यह मुंबई में बसे लोगों को उन्हीं की भाषा में उनके गांव देहात की खबरे देता है। अगर यूपी का कोई मंत्री मुंबई आ रहा है तो उसकी खबर सबसे पहले यशोभूमि में मिलेगी और अगर आने वाला राजस्थान की कोई विभूति है तो सबसे पहले मुंबई में खबर प्रातः काल में मिलेगी और कोलकाता में सन्मार्ग में।
 
इस घटना में एक संदेश छिपा हुआ है। लोग अपने लोगों के बारे में जानना और पढ़ना चाहते हैं। लोग कहीं भी हो और कितने भी समृद्ध हो, अपनी अपनी दहलीज और अपने घर आंगन को नहीं भूलते। आखिर दैनिक भास्कर का अमेरिका संस्करण शुरू करने के पीछे भी यही तर्क था। पाठकों पर हावी होने का जमाना गया और अपने बुद्वि और विचार से उन्हें आतंकित करने का जमाना भी अब नहीं रहा। क्षेत्रीय पत्रकारिता ने अपने आपको अखिल भारतीय मानने वालों का दंभ तोड़ कर रख दिया है और प्रवासी क्षेत्रीय पत्रकारिता एक कदम आगे बढ़ कर बहुत सफलता से यही प्रयोग कर रही है।
 
टीवी चैनलों के मामले में भी यह प्रयोग किया गया है और कई क्षेत्रीय चैनल खासे लोकप्रिय हुए है। आखिर ई टीवी के राजस्थान, उत्तर, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ चेैनलों को देखने वाले लोग हैं ही। सहारा और साधना टीवी भी इसी रास्ते आगे बढ़ रहे हैं। टीआरपी को एक तरफ रखिए मगर आप अगर किसी दूसरे प्रदेश से आ कर दिल्ली में बसे हैं और हिंदी जानते बूझते है तो दिन में एक बार ये प्रादेशिक चैनल जरूर लगा लेंगे। अपनी जमीन का मोह कभी नहीं छूटता। मगर लोकल छाप वाले चैनलों का अच्छा खासा कबाड़ा हो चुका है। दिल्ली में एनसीआर चैनल अभी तक बहुत सफल नहीं कहे जा सकते और छोटे शहरों के केबल टीवी जब तक सिनेमा नहीं दिखाते तब तक उन्हें विज्ञापन नहीं मिलते। मुंबई का हाल दूसरा है मगर वहां रहने वाले दक्षिण भारतीय अपने यहां के तमाम अच्छे चैनल देखते हैं और मराठी माणुष अपने चैनल देखता है। हिंदी वालों के लिए तो खैर चैनलों की कमी है ही नहीं।
 
नोट: समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडिया पोर्टल एक्सचेंज4मीडिया का नया उपक्रम है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें samachar4media@exchange4media.com पर भेज सकते हैं या 09899147504/ 09911612942 पर संपर्क कर सकते हैं।
 

 

  • 30/01/2012

    आनंद प्रधान, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएमसी

    भारतीय मीडिया और खासकर टी.वी उद्योग में इन दिनों खासी हलचल है। वर्ष २०१२ की शुरुआत बहुत धमाकेदार रही। देश में शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों में बाजार पूंजीकरण के लिहाज से सबसे बड़ी कंपनी, मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज ने टी.वी-18/नेटवर्क-18 (मनोरंजन चैनल कलर्स और न्यूज चैनल सी.एन.एन-आई.बी.एन, सी.एन.बी.सी आदि) में कोई 17 अरब रूपये के निवेश का एलान करके सबको चौंका दिया।

     

  • 17/01/2012

    प्रमोद जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

    इस बार पेड न्यूज़ पर भी आयोग की नज़र है। पर आयोग इसे प्रत्याशी के खर्च का मामला मानता है। उसके आगे उसकी दिलचस्पी नहीं। एक पत्रकार और पाठक के लिए यह साख को बेचने का मामला है। इसलिए पेड न्यूज की तमाम उन शक्लों पर भी विचार करने की ज़रूरत है जो चुनाव की परिधि से बाहर हैं।

     

  • 02/01/2012
    अरविन्द विद्रोही, वरिष्ठ पत्रकार  

    वर्ष २०११ के विदाई और वर्ष २०१२ के आगमन की बेला में सप्ताह भर चले रात के उत्सवो ने जहां लाखो नागरिको को आनंदित कर के ऐश्वर्य के रसा स्वादन का अवसर दिया वही दूसरी तरफ करोडो-करोड़ आम जन ,मेहनत कश तबका पूंजी वाद के, ऐश्वर्य व भोग विलास के इस अदभुत नज़ारे को देख कर ,सुनकर हतप्रभ से है |

  • 21/12/2011
    उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार

    1999  की तीखी गर्मियों के बीच देश के तमाम नेता आमचुनाव के प्रचार में धूल फांक रहे थे...तब दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय में कपिल सिब्बल ने अपनी पार्टी का पक्ष रखने और तत्कालीन वाजपेयी सरकार की बखिया उधेड़ने की कमान संभाल रखी थी। इन्हीं दिनों बतौर रिपोर्टर उनसे मिलने का मौका मिला

  • 19/12/2011
    शेष नारायण सिंह, वरिष्ठ पत्रकार  

    हिन्दी के नामी कवि और संगीत मर्मज्ञ कुलदीप कुमार को इस साल का मीडिया एक्सीलेंस अवार्ड दिया जाएगा. २१ दिसंबर को मुंबई के एन सी पी ए सभागार में रोल आफ मीडिया इन द प्रमोशन ऑफ़ म्यूजिक इन इण्डिया नाम का  सेमिनार आयोजित किया गया है . इसी अवसर पर इस पुरस्कार को देने का  कार्यक्रम है