उमेश चतुर्वेदी, स्वतंत्र टिप्पणीकार
सितंबर महीने की पहली तारीख जैसे-जैसे नजदीक आने लगती है, सरकारी दफ्तरों का एक विभाग अचानक से सक्रिय हो उठता है। दफ्तर में एक कोने में बैठे उस विभाग के अधिकारी और कर्मचारी यूं तो पूरे साल उबासियां लेते और कभी-कभार एक-दो फाइलें निबटाते रहते हैं। लेकिन सितंबर की तारीखें नजदीक आते ही उनकी केबिनों की साफ सफाई कर दी जाती है। उन्हें नए सिरे से झाड़पोंछ कर जैसे दफ्तर में सजा दिया जाता है। दफ्तर में अगर कांफ्रेंस की कोई जगह हुई तो उसकी साफ-सफाई की निगरानी भी इन दिनों वह खास विभाग ही करता है। जी हां, ठीक फरमाया आपने, यह हालत होती है राजभाषा विभाग या प्रकोष्ठ की।
दशहरा-दीवाली पर अपने घरों को साफ करने, बरसाती सीलन से मुक्ति के लिए ठंड भरी धूप में कपड़े दिखाने की परंपरा अपने यहां काफी पुरानी है। लेकिन कुछ इसी अंदाज में राजभाषा विभाग की सफाई की यह परंपरा सिर्फ साठ साल पुरानी ही है। कुछ दिनों के लिए अपनी राजभाषा और उसके ध्वजवाहक सितंबर के पहले पखवाड़े में जाग-जाते हैं। उत्साह का कुछ ऐसा माहौल होता है कि पूरे साल अंग्रेजी में फाइलों पर टिप्पणियां लिखने वाले दफ्तर के मुखिया तक खुश हो जाते हैं। अपने बच्चों तक को अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ाने वाले लोग भी हिंदी में कुछ कहानी-कविता और स्कूली टाइप निबंध लिखने में जुट जाते हैं। राजभाषा का यह पखवाड़ा एक तरह से दफ्तर को निर्बंध कर देता है। हिंदी के नाम पर कहानी-कविता और वावविवाद की कुछ प्रतियोगिताएं भी पूरी हो जाती हैं और हिंदी के नाम पर दफ्तर के लोगों को कुछ इनाम-विनाम और मिठाई-नमकीन भी मिल जाती है। राजभाषा विभाग के कर्णधारों का संपर्क अगर किसी साहित्यकार से हुआ तो मुख्य कार्यक्रम में वे भी आ जाते हैं। वैसे भी यहां गंभीरता से ज्यादा लोकप्रियता का खयाल किया जाता है। लिहाजा सबसे ज्यादा मुख्य अतिथि स्थानीय कवि और उसमें भी हास्य कवि ही होते हैं। कुल मिलाकर हास्य कविताओं के जरिए उपजे ठहाकों और दफ्तर के प्रमुख व्यक्ति की माइक के सामने चिंताओं के बीच यह कार्यक्रम इतनी कुशलता से संपन्न हो जाता है कि चारों तरफ हिंदी की जय-जय होने लगती है। इस जयकार से राजभाषा विभाग का सीना गर्व से फूल जाता है। उन्हें इस बात का गंभीर अहसास होने लगता है कि आखिरकार राजभाषा के लिए उन्होंने कुछ तो किया। जाहिर है, इस पूरी कवायद में इस विभाग को थकान भी होती है, लिहाजा हिंदी दिवस के बाद एक-दो दिन की छुट्टी भी ले ली जाती है। दफ्तर के प्रमुख को छुट्टी देने में कोई दिक्कत भी नहीं होती है। उसके बाद राजभाषा विभाग के लोग जब दफ्तर लौटते हैं तो ताजगी की बजाय पुरानी उबासी ही लेकर चले आते हैं और फिर गणपति बप्पा अगली बार की तरह फिर से अगले सितंबर का इंतजार शुरू हो जाता है। दफ्तर में आदेश अंग्रेजी में दिए जाने शुरू हो जाते हैं। फाइलों पर नोटिंग और ड्राफ्टिंग का काम एक बार फिर पुराने ढर्रे पर लौट आता है। अंग्रेजी की बिना कहे ही जयजयकार होने लगती है। जिंदगी फिर से पटरी पर वापस लौट आती है। लेकिन यह सवाल अनुत्तरित ही रह जाता है कि क्या सचमुच हमारी हिंदी आगे बढ़ पाई है।
राजभाषा विभागों को लेकर आम अधिकारियों का क्या व्यवहार रहा है। इसे समझने के लिए एक दृष्टांत मौजूं हैं। इसका जिक्र हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा नीड़ का निर्माण फिर में किया है। उन्हें विदेश मंत्रालय में डिप्टी सेक्रेटरी के पद पर पंडित नेहरू ने तैनात किया। उनका काम विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के साथ ही मंत्रालय में हिंदी के विकास की भूमिका भी तय करनी थी। लेकिन हिंदी से चिढ़ने वाले अफसर हरिवंश राय बच्चन का ही मजाक उड़ाने से नहीं चूके। उन्होंने बच्चन से पूछना शुरू किया कि बच्चन साहब डिप्टी सेक्रेट्री का क्या अनुवाद होगा और दूसरा तुरंत अनुवाद करता नीच सचिव। कहना न होगा यह मानसिकता आज भी हावी है। इसी तरह का दूसरा उदाहरण रेल मंत्रालय के राजभाषा विभाग का है। रेलवे में जब सिर्फ रेल इंजन को अंग्रेजी में लाइट इंजन कहा जाता है। लेकिन एक अधिकारी ने इसका अनुवाद किया प्रकाश इंजन। साफ था कि राजभाषा के अधिकारी महोदय ने मक्षिका स्थाने मक्षिका के सिद्धांत से अनुवाद किया। इन घटनाओं के बीते काफी वक्त हो चुका है। लेकिन हिंदी को लेकर दोनों तरह के अधिकारियों का बरताव आज भी कुछ ऐसा है। कहना न होगा कि पाखंड के पखवारे के बीच इसी प्रवृत्ति को बार-बार दोहराया जाता है। क्या बेहतर नहीं होगा कि इस पाखंड को रोक दिया जाय। इसी बहाने खर्च होने वाली रकम हिंदी के विकास की किसी जमीनी योजना में लगाई जाय। देर-सवेर इसका जवाब तो हमें खोजना ही होगा।
नोट: समाचार4मीडिया देश के प्रतिष्ठित और नं.1 मीडिया पोर्टल एक्सचेंज4मीडिया का नया उपक्रम है। समाचार4मीडिया.कॉम में हम आपकी राय और सुझावों की कद्र करते हैं। आप अपनी राय, सुझाव और ख़बरें हमें
samachar4media@exchange4media.com पर भेज सकते हैं या
09899147504/ 09911612942 पर संपर्क कर सकते हैं।
टिप्पणी
इसीलिये तो हिन्दी का ये हाल
इसीलिये तो हिन्दी का ये हाल है ।