नये साल में मीडिया की चुनौती
एन. के. सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
एक अन्य बैठक में उसी दिन सेन ने कैंसर पर भाषणदिया। एक अखबार की हेडलाइन थी- ‘धूम्रपान एक निजी मामला है - सेन’ जबकिदूसरे अखबार ने- ‘धूम्रपान करने वालों की आजादी पर रोक लगनी चाहिए- अमत्र्यसेन’। तीसरी घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि देश के एक बड़ेअंग्रेजी अखबार ने 15 दिसंबर को शीर्षक दिया, ‘भ्रष्टाचार से जनता सड़क परनहीं निपट सकती- अमत्र्य सेन’। अमत्र्य सेन का कहना था कि उन्होंने एक भीऐसा स्टेटमेंट नहीं दिया और ऑडियो-टेप इसके गवाह हैं।
दरअसल इस पूरी समस्या के मूल में जाना होगा। पत्रकारिता में कौन-सा वर्ग आरहा है? उसके प्रशिक्षण के उपादान व संस्थाएं कैसी हैं? पत्रकारों कीनियुक्ति में किन चीजों पर ध्यान देने की जरूरत है? यह भी देखना उतना हीजरूरी होगा कि एक बार पत्रकारिता में आने के बाद अखबार या चैनल उन्हें कैसीट्रेनिंग देते हैं। आज रिपोर्टरों का एक बड़ा वर्ग है, जो सीधे देश कीसर्वोच्च प्रजातांत्रिक संस्था संसद की रिपोर्टिंग के लिए भेज दिया जाता हैजबकि उसे यह नहीं मालूम होता कि अन्य निचली संस्थाएं कैसे काम करती हैं यासंविधान में संघीय ढांचे के तहत किन संस्थाओं के क्या कर्तव्य औरजिम्मेदारियां हैं? अगर एक पॉलिटिकल रिपोर्टर को, जो कि संसद की रिपोर्टिंगकरता है, जिला परिषद नाम की संस्था के कर्तव्य या अधिकार नहीं मालूम हैंतब वह प्रजातांत्रिक पद्धति को पूरी तरह न तो समक्ष पाएगा और न ही उसकीरिपोर्टिंग परिपक्व होगी।
चूंकि सामाजिक विकास एक सतत प्रक्रियाहै लिहाजा बेहतर यह होगा कि पत्रकारों को सबसे निचली संस्थाओं वप्रक्रियाओं से गुजारा जाए। जैसे- थाना, नगरपालिका, विकासखंड, निचलीअदालतें आदि। इसके बाद इन्हें राज्य के बड़े शहरों या राजधानी में बड़ीसमस्याओं की रिपोर्टिंग के लिए एक नए रिफ्रेशर कोर्स के बाद भेजा जाए। यहांकहने का अभिप्राय यह नहीं है कि निचली संस्थाओं की रिपोर्टिंग कोई निम्नकिस्म की पत्रकारिता है बल्कि यह कि इन संस्थाओं के कार्यकलापों व उपादेयताको जाने बगैर पूरी प्रजातांत्रिक व्यवस्था या संसदीय प्रणाली को समझनामुश्किल होता है। ऐसे तमाम वरिष्ठ पत्रकार मिलते हैं, जो बगैर उत्तर प्रदेशगए पूरे चुनाव का विश्लेषण कर देते हैं जबकि उन्हें यह भी नहीं मालूम होताकि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी का प्रतिशत कितना है, या बुंदेलखंडप्रदेश के पश्चिम में है या पूर्व में या मानव विकास सूचकांक क्या होता हैऔर किन आधार पर बनाया जाता है।
अभी हाल ही में चंडीगढ़ हाईवे केपास दो सांड़ों की जबर्दस्त लड़ाई हुई। कई गाडिय़ां क्षतिग्रस्त हुईं। एकटीवी एंकर ने स्पॉट पर पहुंचे रिपोर्टर से लाइव चैट में पूछा - दोनों सांड़किस बात पर लड़े थे? जाहिर है, एंकर को समुचित ट्रेनिंग नहीं दी गई है।यहां यह भी बताना जरूरी है कि भारतीय पत्रकारिता की बुराई करने वालों का एकबड़ा वर्ग है जो स्वयं सुविधाभोगी रहा है और पत्रकारिता की बुराई वहबुद्धि-विलास के रूप में करता है। पी.साईनाथ के लेखों से कुछ आंकड़ेनिकालकर पत्रकारिता पर आरोप लगाता है कि इन्हें गरीबों की चिंता नहीं है।यूरोप का थोड़ा-बहुत इतिहास जानकर वह यह बताना चाहता है कि भारत का पत्रकारअशिक्षित है और गालिब के कुछ शेर उद्धृत करके वह अपने को धर्मनिरपेक्षबताना चाहता है। भारतीय पत्रकारिता की ऐसे लोगों को चिंता करने की जरूरतनहीं है लेकिन जब समाज का एक वर्ग या अमत्र्य सेन जैसे लोग पत्रकारिता परप्रश्नचिह्न लगाएं, तब यह सोचना पड़ता है कि गलती कहां हुई है।
गरीबी के प्रति संवेदनशील होने के लिए हमें गरीबी को जानना होगा। दिल्ली सेउड़कर पटना के फाइव-स्टार होटल में पड़ाव डालकर स्कॉर्पियो से बिहार कीगरीबी देखकर कोई पत्रकार गरीबी की विभीषिका पर लिखना चाहता है तब उसके समझमें नहीं आएगा। एक किस्सा याद आता है। किसी धनी व्यक्ति की बेटी से एक गरीबपर निबंध लिखने को कहा गया। उसने लिखा, गरीब आदमी इतना गरीब होता है किउसका बंगला भी गरीब होता है, उसकी गाड़ी भी गरीब होती है, उसका ड्राइवर भीगरीब होता है, उसका माली भी गरीब होता है, सब कुछ गरीब होता है।
पत्रकारों की संस्थाओं को और वरिष्ठ संपादकों को इस ओर ध्यान देना होगा। एकसामूहिक फैसले के तहत पत्रकारिता के पेशे में गुणात्मक सुधार एक सततप्रक्रिया है। लोकपाल बिल की सूक्ष्मताओं से लेकर यूरिया खाद की अनुपलब्धतातक सभी पक्षों पर एक सम्यक ज्ञान के बिना पत्रकारिता की पूरी उपादेयतानहीं बन पाएगी।
- 17/05/2012
वर्तिका नंदा, मीडिया विश्लेषक.
तस्वीरें काफी तेजी से बदलती हैं। जुलाई 2007 में को मीडिया की सुर्खियां प्रतिभा सिंह पाटिल थीं - देश की पहली महिला राष्ट्रपति, सौम्य, सजग, संवेदनशील वगैरह। उनके लिए वे तमाम विश्लेषण इस्तेमाल किए गए जो किसी की गरिमा को चार चांद लगा सकें।
- 14/05/2012
एनके सिंह, ग्रुप एडिटर, साधना न्यूज
सम्प्रेषण के मूल सिद्धान्तों में जो एक सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त है वह यह कि सम्प्रेषण तभी कारगर होता है जब लक्षित सामाजिक समूह की चेतना के साथ तादात्म्य बना सकें। अगर संदेश के लिए गलत माध्यम चुना गया या उसकी विषय-वस्तु उसे समाज-समूह की समझ से परे रहा तब संदेश संप्रेषण बेमानी हो जाता है। सरकार की क्षेत्रीय चैनलों को लेकर नई नीति इस दिशा में एक सार्थक प्रयास है। इस नई नीति के तहत भारत सरकार न केवल क्षेत्रीय चैनलों के माध्यम से अपने कार्यक्रमों का विज्ञापन करेगी बल्कि इन चैनलों के रिपोर्टरों को अपने कार्यक्रमों के बारे में बताते हुए इन कार्यक्रमों की मॉनिटरिंग के प्रति भी रुझान पैदा करेगी - 10/05/2012
संजय द्विवेदी, प्रोफेसर, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय
हिंदुस्तान में रहते हुए हम किसी भी इलाके में जाएं उर्दू हमारा साथ नहीं छोड़ती। वह हिंदी की ही तरह राष्ट्रभाषा है, जिसकी जमीन बहुत व्यापक और जड़ें बहुत गहरी हैं। पाकिस्तान के निर्माण ने उर्दू की इस रफ्तार को रोक दिया। उर्दू एक खास तबके की भाषा बनकर रह गयी। वह हिंदुस्तानी जबान से एक कौम की जबान बन गयी या बना दी गयी। ऐसे समय में उर्दू सहाफत (पत्रकारिता) पर बात करना सच में अतीत के उन सुनहरे पन्नों को टटोलने की कोशिश है
- 07/05/2012वर्तिका नन्दावरिष्ठ मीडिया विश्लेषकआमिर के बहाने ही सही, शायद सच को इस बार जीतने में मदद मिल जाए। बरसों पहले रामायण और महाभारत वाले सुबह के स्लाट पर आमिर ने सामाजिक सरोकारों पर कुछ नया करने की कोशिश की। मुबारक आमिर,मुबारक उदय शंकर, मुबारक स्टार।
- 30/04/2012
आनंद प्रधान, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएमसी
बाबाओं का साम्राज्य सिर्फ धार्मिक चैनलों तक सीमित नहीं है. मनोरंजन चैनलों से लेकर न्यूज चैनलों तक पर भी सुबह की कल्पना उनके बिना संभव नहीं है. इन बाबाओं/बापूओं/स्वामियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि धर्म और ईश्वर भक्ति से उनका बहुत कम लेना-देना है.


