तो फिर यही समझा जाए कि किसी ने कुछ नहीं किया
सुनील जैन, सीनियर एसोसिएट एडिटर, बिजनेस स्टैंडर्ड
प्रेस परिषद कहती है कि उसके पास सीमित अधिकार हैं जो उसे कदाचार के दोषियों पर दंड आरोपित करने की अनुमति नहीं देते और टेलीविजन न्यूज के मामले में ये सीमित अधिकार भी लागू नहीं होते। लेकिन वह किसी का नाम लेकर उसे आसानी से शर्मसार कर सकती थी। इससे संकेत मिलता है कि पेड न्यूज के कारोबार में शामिल अखबार कितने ताकतवर हैं कि उन्होंने प्रेस परिषद को अपना नाम सामने आने देने से भी रोक दिया।
परिषद कहती है कि उसके पास उलाहना या निंदा पारित करने की शक्ति है, लेकिन आप इसे भूल जाइये। ऐसे में अगर इसका सुझाव है कि प्रेस परिषद अधिनियम 1978 की धारा 15 (4) में संशोधन होना चाहिए ताकि इसका निर्देश बाध्यकारी हो, पर ऐसा होने की संभावना नहीं है। एक ओर जहां पेड न्यूज छापने वाले अखबारों के बारे में बात करना एक बात है और साबित करना दूसरी बात।
उदाहरण के तौर पर कई लोगों ने संदेह व्यक्त किया है कि प्राइवेट ट्रीटीज अखबार (मसलन टाइम्स ऑफ इंडिया) के पास और कुछ नहीं बल्कि पेड न्यूज होती है, इस मामले में अखबार को मुफ्त में विज्ञापन की जगह उपलब्ध कराने के बदले कंपनी की हिस्सेदारी मिलती है, लेकिन चूंकि अखबारों के निवेश की कीमत सिर्फ तभी बढ़ती है जब आपकी कंपनी बेहतर प्रदर्शन करती है, आरोप है कि विभिन्न अखबार अपनी प्राइवेट ट्रीटीज कंपनियों की सिर्फ अच्छी खबरें प्रकाशित करते हैं। लेकिन आप इसे कैसे साबित करेंगे?
राजनेताओं के मामले में भी ऐसी ही बातें हैं। यह कहना आसान है कि वे सभी भ्रष्ट हैं, लेकिन रकम के स्रोत का पता लगाना आसान नहीं है। राजनेताओं के फैसलों की जांच का मामला भी कुछ इसी तरह का है। ऐसे में 2जी लाइसेंस के मामले में मंत्रालय में रकम के प्रवाह का पता लगाने की वास्तव में दरकार नहीं है। आपको यह बताने की दरकार होगी कि कुछ चुनिंदा कंपनियों ने साल 2008 में उसी दर पर लाइसेंस हासिल कर लिया, जिस दर पर साल 2001 में इन्हें बेचा गया था।
इसी तरह, खनन लाइसेंस या किसी और छूट के मामले में अगर किसी तरह की बोली नहीं मंगाई गई तो फिर सहापराधिता दिखाने के लिए यह पर्याप्त है। लेकिन प्रेस काउंसिल की उपसमिति, जिसमें प्रांजय गुहा ठाकुरता और के. श्रीनिवास रेड्डी शामिल थे, ने मोटे तौर पर यही किया। उन्हें बड़ी संख्या में लोगों की गवाही मिली, जिसे आप हल्के में नहीं ले सकते।
1. इसने आंध्र प्रदेश की लोकसत्ता पार्टी के श्री पोरचा कोडांडा राम राव के मामले का उद्धरण पेश किया जिसने औपचारिक रूप से चुनाव आयोग से कहा कि अपने पक्ष में खबर प्रकाशित करने के लिए इन्होंने इनाडु को रकम दी थी और इस रकम को अपने आधिकारिक खर्च सूची में शामिल किया था। 2. भाजपा नेता लालजी टंडन ने ऑन रिकॉर्ड कहा कि प्रसार के मामले में सबसे बड़े भाषायी अखबार ने उनके बारे में कोई भी खबर प्रकाशित करने से इनकार कर दिया था, जब तक कि मैंने रकम नहीं चुकाई।
इसी तरह का आरोप बसपा के तमिलनाडु सचिव के. रामसुब्रमण्यन (परिषद को लिखे पत्र में), भाकपा के अतुल अंजान, कांग्रेस के संदीप दीक्षित और भाजपा की सुषमा स्वराज ने भी अन्य अखबारों पर लगाया था। 3. पत्रिका प्रथम प्रवक्ता ने पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री हरमोहन धवन को उद्धरित करते हुए लिखा था कि पंजाब केसरी, दैनिक जागरण और दैनिक भास्कर के प्रतिनिधियों ने उनसे संपर्क कर कहा था कि अगर वे उनका पैकेज खरीदेंगे तो उन्हें अच्छा कवरेज मिलेगा। इस पत्रिका में इस तरह का आरोप संतोष सिंह (आजमगढ़ के कांग्रेस प्रत्याशी), इसी चुनाव क्षेत्र के रमाकांत यादव (भाजपा), सपा के अरशद जमाल ने भी लगाया था।
आप तर्क दे सकते हैं कि यह किसी दूसरे के खिलाफ सिर्फ एक व्यक्ति के शब्द हैं (जिन अखबारों पर आरोप लगाए गए थे उन्होंने इसमें शामिल होने से इनकार किया है), पर उपसमिति ऐसी खबरों का उदाहरण पेश करती है। दैनिक जागरण के रांची संस्करण में 13 अप्रैल 2009 को एक खबर छपी थी कि चतरा लोकसभा क्षेत्र के राजद उमम्मीदवार को किस तरह सभी वर्गों का समर्थन मिल रहा है।
उसी पृष्ठ पर एक और खबर थी कि इसी लोकसभा सीट के जदयू प्रत्याशी किस तरह स्पष्ट विजेता के तौर पर उभरेंगे! कुछ और उदाहरण पेश किए गए हैं - आंध्र ज्योति में एक खबर छपी थी कि नरसापुरम के तेदपा प्रत्याशी को बड़ी जीत हासिल होगी, एक अन्य पृष्ठ पर उसी चुनाव क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी की की एक खबर छपी थी जिसमें उसकी जीत की बात कही गई थी।
द हिंदू के रूरल अफेयर्स एडिटर पी. साईनाथ की वह खबर वास्तव में पक्की दलील जैसी है जिसमें उन्होंने लिखा था कि किस तरह तीन मराठी अखबार - लोकमत, पुढारी और महाराष्ट्र टाइम्स - ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण की प्रशंसा करने के लिए किस तरह से शुरू से आखिर तक एक जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। जब प्रेस परिषद ने उनसे पूछताछ की तो चव्हाण ने कहा कि हो सकता है सभी अखबारों ने उन्हीं सामग्री का इस्तेमाल किया होगा, जो प्रेस कॉन्फ्रेंस में वितरित की गई थी और फिर कहा कि उनका मानना है कि ऐसी शिकायतों को चुनौती देने का उपयुक्त फोरम अदालत है और चुनाव याचिका के जरिए ऐसा किया जा सकता है।
प्रेस परिषद की 13 पेज वाली विस्तृत रिपोर्ट एक भी ऐसा उद्धरण पेश नहीं करता जो कि उपसमिति की 71 पृष्ठ की रिपोर्ट में है, जो कहती है कि यह काउंसिल के रिकॉर्ड में यह संदर्भ दस्तावेज के रूप में बना रह सकता है। पर वास्तविक रिपोर्ट परिषद की वेबसाइट पर भी नहीं है। इसे देखते हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार या रेड्डी बंधुओं के खनन घोटाले पर अखबारों द्वारा शोर मचाना पाखंडपूर्ण लगता है? शायद हमें उस तरह के शीर्षक से चिपके रहना चाहिए, 'किसी ने भी राष्ट्रमंडल खेलों में रकम नहीं बनाई' या 'कर्नाटक के खनन घोटाले में कोई शामिल नहीं।' हो सकता है यह आपको कुछ न कहे, लेकिन परिषद की रिपोर्ट पर भी कुछ नहीं कहेगा।
- 30/01/2012
प्रमोद जोशी, वरिष्ठ पत्रकार
ऑनलाइन संचार दुनिया भर में विचार का विषय है। बेशक इसके मार्फत धोखाधड़ी और हेरफेर के मामले भी सामने आ रहे हैं, पर किसी भी एक कार्रवाई का प्रभाव कितना दूरगामी होगा, इसे देखने की ज़रूरत भी है। - 20/01/2012
वर्तिका नन्दा, वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक
तीन दिनों तक प्रियंका ही खबरों में रहीं। उनकी मुस्कुराहट, उनके कपड़ों का रंग, हंसने की अदा, फुर्ती, हाजिरजवाबी, मन को मोहने वाली बातें, अपनी
दादी से मिलता चेहरा, मिलनसारिता, उनके व्यक्तित्व का करिश्मा और भी न जाने क्या-क्या। हालांकि इनमें से किसी भी बात से इंकार नहीं किया जा सकता पर मीडिया की मुग्ध होती रिपोर्टिंग और रसीली एंकरिंग के कुछ पहलुओं पर इंकार जतलाना जरूरी लगता है।
- 17/01/2012
आनंद प्रधान, एसोसिएट एडिटर आईआईएमसी
इन विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों खासकर आक्युपाई वाल स्ट्रीट प्रदर्शनों में सिर्फ बड़े कारपोरेट समूह, सत्ता प्रतिष्ठान और राजनीतिक वर्ग ही निशाने पर नहीं थे बल्कि खुद कारपोरेट मीडिया और उसका झूठ भी निशाने पर थे। सच पूछिए तो इस आंदोलन ने जिस तरह से मुख्यधारा के कारपोरेट मीडिया को नकार दिया और नए और वैकल्पिक मीडिया के जरिये लोगों के बीच सूचना-संवाद-बहस और गोलबंदी शुरू की है, वह भविष्य की ओर संकेत करता है। - 10/01/2012
एन. के. सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
नोबल पुरस्कार विजेता एवं विख्यात अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने इस साल के प्रथम सप्ताह में ही मीडिया की खराब गुणवत्ता की दो घटनाएं झेलीं। लोकपाल से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने जवाब दिया। अगले दिन जब उन्होंने देश के एक बड़े अंग्रेजी अखबार और कई टीवी चैनलों को देखा, तब उसमें शीर्षक पाया ‘लोकपाल विधेयक सूझ-बूझ से लाया गया बिल-अमत्र्य सेन’। जबकि कुछ अखबारों ने शीर्षक दिया था- ‘लोकपाल विधेयक बगैर सोचे-समझे लाया गया बिल- सेन’। एक अन्य आर्थिक समाचार पत्र ने एक दिन पहला शीर्षक दिया और दूसरे दिन दूसरा शीर्षक
- 03/01/2012वर्तिका नन्दा, वरिष्ठ मीडिया विश्लेषकविज्ञापन के दौर में आ गई पत्रकारिता के लिए यह साल बहुत रोचक और चुनौतीपूर्ण होने वाला है। इंदिंरा के बाद कौन, राजीव के बाद जैसे सवालों से भारतीय जनता का सामना हमेशा हुआ। अब अन्ना के बाद कौन। अन्ना के जिस ब्रांड के भरोसे मीडिया का बाजार गुलाबी हुआ, वह बहुत ही जल्द फीका भी पड़ गया। मुद्दे उठे, लाइव रिपोर्टिंग हुई, संसद तक में हंगामा भी पर फिर सब कुछ पूरी तरह से ठस्स।


