टीवी मीडिया पर भरोसा कैसे होगा

PUNYA

पुण्य प्रसून वाजपेयी, वरिष्ठ पत्रकार   

नीला रंग यानी मायावती या दलित राजनीति। गांधी के साथ आंबेडकर यानी कांग्रेस राजनीति या राहुल की माया विरोधी राजनीति। ललित मोदी यानी आईपीएल धंधा। ये प्रतीक न्यूज चैनलों के हैं, जिसमें टीवी स्क्रीन पर रेंगते ऐसे ही चंद फामरूलों के जरिए समूची कहानी कही जाती है। जिस दौर में जो कहानी लोकप्रिय चल रही होती है, उसी के अनुरूप न्यूज चैनल की स्क्रीन पर कहानी के अंश लिखे हुए उभरते जाते हैं और तत्काल की जो भी सूचना सबसे संवेदनशील होती है, उसे ही सनसीखेज तरीके से न्यूज चैनलों की स्क्रीन पर बार-बार उकेर कर न्यूज चैनल खबरों को भिदते आगे बढ़ जाते हैं। यानी जो दिखा, वही खबर और उसी के अनुरूप जो कहा गया, वही पत्रकारिता। ऐसे में राजनीति या समाज का मर्म पकड़ने में कैसे न्यूज चैनल चूकते हैं और खबरो के लिए प्रिंट के पीछे चलना उनकी फितरत हो जाती है और चैनल कभी भी किसी के लिए भी प्यादा बनकर काम करने लगते हैं, यह पकड़ना रोचक है। मसलन, पूरा लखनऊ नीला है यानी मायावती के रंग में है। यह मायावती की ठसक है। चैनल की खबर यही है। जबकि यह मायावती का सोशल इंजीनियरिंग से तौबा कर पुरानी राजनीति में लौटना भी है, जहां उग्र तरीके से दलित प्रतीकों को न सिर्फ उभारना है, बल्कि उसके आतंक तले दलितों को भी भरोसा दिलाना है कि बिना इसके दलितों का जीवन मुश्किल है। यह समझ न्यूज चैनल से गायब है।

आंबेडकर को लेकर मायावती हो या राहुल गांधी, दोनों ही वही कुछ बताने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके खिलाफ आंबेडकर थे। राहुल गांधी ने आंबेडकर नगर में आंबेडकर जयंती मनाते वक्त मंच पर गांधी और आंबेडकर की एक साथ, एक बराबर तस्वीरों को माल्यार्पण कर अपनी सभा की शुरुआत की। चैनलों ने कहा कि मायावती के वोटबैंक को साधने के लिए गांधी के बराबर आंबेडकर को कांग्रेस ने रख दिया। लेकिन सच गायब है कि गांधी से कभी आंबेडकर की सहमति नहीं हुई। मायावती ने पहले आंबेडकर की आदमकद प्रतिमा पर माल्यार्पण कर अपनी सभा की शुरुआत की। लेकिन यह सच चैनल से गायब रहा कि आंबेडकर जीवन भर मूर्ति पूजा के खिलाफ रहे। अब कोई चैनल न तो अपने दर्शकों को बताता है और न ही मायावती को पाठ पढ़ाता है कि आंबेडकर की पहली जयंती 1933 में आंबेडकर की तस्वीर के बगैर ही मनाई गई थी। असल में 1933 में नागपुर के दलित समुदाय के लोगों ने तय किया कि वे आंबेडकर की जयंती मनाएंगे। नागपुर की संतरा मार्केट में जयंती मनाने के लिए कार्यक्रम की शुरुआत हुई, जिसमें आंबेडकर की तस्वीर या प्रतिमा की जगह उनकी किताबों को रखा गया। इस सभा में जितने लोग पहुंचे, सभी को उनकी लिखी किताब की एक-एक प्रति भेंट में दी गई। मायावती तो आंबेडकर जयंती के वक्त अकेली वक्ता होती हैं। उनके अगल-बगल खड़े लोगों को बोलने की इजाजत तक नहीं होती, लेकिन आंबेडकर की इस पहली जयंती में एक दर्जन से ज्यादा वक्ताओं ने भाषण दिया।

हो सकता है ये तमाम सवाल मायावती के लिए मायने न रखते हों, क्योकि उनकी सत्ता का मंत्र दलित को दलित बनाए रखते हुए उच्च जाति की राजनीति के खिलाफ एक वोटबैंक में गोलबंद करने की सोच रही हो। या फिर दलितों की भावनाओं को संसदीय राजनीति के अंतर्विरोध में उभार कर सामाजिक-आर्थिक मुश्किलों को सिर्फ दलितों के लिए बताना रहा हो। इसलिए साठ फीसदी से ज्यादा दलित उत्तर प्रदेश में आज भी पांचवी पास नहीं हैं और आठवीं पास दलितों की संख्या 12 से 15 फीसदी पार नहीं कर पा रही है। लेकिन, न्यूज चैनलों के पास इसे बताने-दिखाने का वक्त नहीं है, क्योंकि यह तात्कालिक नहीं है। आंबेडकर ने जीते-जी कई ऐसे प्रयोग किए, जो मायावती तो दूर वामपंथी भी नहीं कर पाए। मसलन, आंबेडकर ने असेंबली चुनाव के लिए सबसे पहले स्वतंत्र मजदूर पक्ष 1935 में इसीलिए बनाया था कि यह पक्ष चुनाव लड़ सके और इसके जरिए राजनीति को मजदूरों की नीति बनाने की दिशा में मोड़ा जा सके। जाहिर है मायावती के लिए मजदूर का सवाल बेमानी है।

राहुल न्यूज चैनलों के लिए ब्रांड हैं। ब्रांड की लाग-लपेट में चैनल अगर खो जाएं तो दर्शकों को सच कौन बताएगा। हुआ भी यही। राहुल गांधी ने गांधी के बराबर आंबेडकर को रखकर यह जतलाने का प्रयास किया कि कांग्रेस के सिर्फ गांधी नहीं हैं, और आंबेडकर सिर्फ बहुजन समाज पार्टी के नहीं है। लेकिन, तात्कालिकता चैनलों की प्राथमिकता है तो इतिहास गायब है और किसी ने यह बताने की जुर्रत नहीं समझी कि महात्मा गांधी के साथ न देने की वजह से ही आंबेडकर ने 1936 में कहा था कि हिंदू धर्म में पैदा होना तो उनकी मजबूरी थी, लेकिन हिंदू धर्म में मौत न हो, इसकी व्यवस्था तो वह कर ही सकते हैं। तभी से दलित समाज के लोगों ने मान लिया था कि संघर्ष तो हिंदुत्व से है। असल में 16 जून,1934 में आंबेडकर की पहली मुलाकात गांधी से हुई। मुंबई में हुई इस मुलाकात में आंबेडकर ने गांधी के सामने यही सवाल रखा कि उन्हें अस्पृश्य समाज की मदद में सामाजिक-सांगठनिक और आर्थिक तौर पर आगे आना चाहिए, इसलिए हरिजन सेवक संघ को इसमें मदद करनी चाहिए। लेकिन गांधी ने मदद से सीधे इंकार कर दिया। आंबेडकर ने हर उस आधार को ध्वस्त किया, जिसमें हिंदुओं की मौजूदगी रही है।

कांग्रेस के तौर-तरीकों को लेकर आंबेडकर ने कभी गांधी का समर्थन नहीं किया। एक वक्त, जब आंबेडकर को लेकर यह कयास लगने लगे कि वह कांग्रेस में शामिल हो जाएंगे तो आंबेडकर ने कांग्रेस को जलता हुआ घर कह कर कांग्रेसी सोच पर पानी डाल दिया।

जाहिर है न्यूज चैनल अगर इस तरह से खबरों को पकड़ने लगें तो भागती-दौड़ती मीडिया की जिंदगी ठहरेगी। देखने वाले सोचेंगे। तब पत्रकारिता सरोकार वाली होगी। लेकिन यह सब नहीं है, तो न्यूज चैनलों का अपना जीवन कैसे धोखे और फरेब वाला है, यह आईपीएल के धंधे के खिलाफ न्यूज चैनलों की खबरों से समझा जा सकता है। जब सभी न्यूज चैनलों की स्क्रीन पर आईपीएल के खिलाफ आक्रोश पैदा कर उस पर प्रतिबंध लगाने तक के राग गाए जा रहे थे, उसी दिन देश के एक राष्ट्रीय हिंदी न्यूज चैनल के परिसर में आदमकद पर्दा लगाकर प्रोजेक्टर से आईपीएल मैच दिखाने की व्यवस्था थी। यानी जो पाठ स्क्रीन पर था, वह पाठ असल जीवन में खारिज था। तो क्या यही वजह नहीं है कि आम लोगों का भरोसा इलेक्ट्रानिक मीडिया से उठ रहा है।

 
(दैनिक भास्कर से साभार)
 
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  • 04/09/2010

    आनंद प्रधान, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएमसी

    समाचार चैनलों के आलोचकों का दायरा लगातार बढ़ रहा है और हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए  यह शुभ संकेत नहीं । समाचार चैनलों के लिए खतरे की घंटी तो काफी समय से बज रही है लेकिन अब लगता है कि पगली घंटी भी बज गई है। चैनल न सिर्फ सार्वजनिक मजाक और आलोचना के विषय बन गए हैं बल्कि उनकी कारगुजारियों को लेकर भी लोगों में गुस्सा बढ़ता जा रहा है।

  • 04/09/2010

    आलोक तोमर , एडिटर, डेटलाइन इंडिया

    देश भर के अखबारों और छोटे बड़े मझोले टीवी चैनलों में संपादक से ले कर प्रोड्यूसर तक के नाम पर एक प्रजाति होती है और उसका नाम है स्ट्रिंगर। अब काम चलाऊ इज्जत देने के लिए इन लोगों को संवाद सहयोगी या संवाददाता कहा जाने लगा है। ये वे लोग है जो कस्बों और देहातों यानी असली भारत से शेष भारत और दिल्ली में बसे इंडिया तक सच पहुंचाते हैं। मगर इन पत्रकारों का सच कितने लोग जानते हैं।

     

  • 02/09/2010

    उमेश चतुर्वेदी, स्वतंत्र टिप्पणीकार

    सितंबर महीने की पहली तारीख जैसे-जैसे नजदीक आने लगती है, सरकारी दफ्तरों का एक विभाग अचानक से सक्रिय हो उठता है। दफ्तर में एक कोने में बैठे उस विभाग के अधिकारी और कर्मचारी यूं तो पूरे साल उबासियां लेते और कभी-कभार एक-दो फाइलें निबटाते रहते हैं। लेकिन सितंबर की तारीखें नजदीक आते ही उनकी केबिनों की साफ सफाई कर दी जाती है।

  • 31/08/2010

    प्रमोद जोशी, पूर्व स्थानीय सम्पादक, हिन्दुस्तान, दिल्ली

    सितम्बर 1982 में यूएसए टुडे की शुरुआत टीवी के मुकाबले अखबारों को आकर्षक बनाए रखने की एक कोशिश का हिस्सा थी। दुनिया का पहला पूरी तरह रंगीन अखबार शुरू में बाजीगरी लगता था, पर जल्द ही अमेरिका का वह नम्बर एक अखबार बन गया। आज भी वॉल स्ट्रीट जर्नल के बाद यह दूसरे नम्बर का अखबार है। खबर यह है कि यूएसए टुडे अब प्रिंट की तुलना में अपने डिजिटल संस्करण पर ज्यादा ध्यान देगा।
  • 30/08/2010

    डॉ वर्तिका नन्दा,वरिष्ठ पत्रकार

     

    पीपली लाइव देखने जाना ही था। वजह फिल्म की चर्चा से कहीं ज्यादा यह थी कि महमूद और अनुषा के साथ मुझे एक लंबे समय तक एनडीटीवी में काम करने का अवसर मिला था। महमूद ने उन दिनों एक स्टोरी में पीटूसी करते हुए शेक्सपीयर के एक बहुत लंबे पद्य को जब मुंहजबानी बोल डाला था, तब मुझमें यह उत्कंठा जाग उठी थी कि यह अलग-सा शख्स है कौन।