टीवी मीडिया पर भरोसा कैसे होगा
पुण्य प्रसून वाजपेयी, वरिष्ठ पत्रकार
आंबेडकर को लेकर मायावती हो या राहुल गांधी, दोनों ही वही कुछ बताने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके खिलाफ आंबेडकर थे। राहुल गांधी ने आंबेडकर नगर में आंबेडकर जयंती मनाते वक्त मंच पर गांधी और आंबेडकर की एक साथ, एक बराबर तस्वीरों को माल्यार्पण कर अपनी सभा की शुरुआत की। चैनलों ने कहा कि मायावती के वोटबैंक को साधने के लिए गांधी के बराबर आंबेडकर को कांग्रेस ने रख दिया। लेकिन सच गायब है कि गांधी से कभी आंबेडकर की सहमति नहीं हुई। मायावती ने पहले आंबेडकर की आदमकद प्रतिमा पर माल्यार्पण कर अपनी सभा की शुरुआत की। लेकिन यह सच चैनल से गायब रहा कि आंबेडकर जीवन भर मूर्ति पूजा के खिलाफ रहे। अब कोई चैनल न तो अपने दर्शकों को बताता है और न ही मायावती को पाठ पढ़ाता है कि आंबेडकर की पहली जयंती 1933 में आंबेडकर की तस्वीर के बगैर ही मनाई गई थी। असल में 1933 में नागपुर के दलित समुदाय के लोगों ने तय किया कि वे आंबेडकर की जयंती मनाएंगे। नागपुर की संतरा मार्केट में जयंती मनाने के लिए कार्यक्रम की शुरुआत हुई, जिसमें आंबेडकर की तस्वीर या प्रतिमा की जगह उनकी किताबों को रखा गया। इस सभा में जितने लोग पहुंचे, सभी को उनकी लिखी किताब की एक-एक प्रति भेंट में दी गई। मायावती तो आंबेडकर जयंती के वक्त अकेली वक्ता होती हैं। उनके अगल-बगल खड़े लोगों को बोलने की इजाजत तक नहीं होती, लेकिन आंबेडकर की इस पहली जयंती में एक दर्जन से ज्यादा वक्ताओं ने भाषण दिया।
हो सकता है ये तमाम सवाल मायावती के लिए मायने न रखते हों, क्योकि उनकी सत्ता का मंत्र दलित को दलित बनाए रखते हुए उच्च जाति की राजनीति के खिलाफ एक वोटबैंक में गोलबंद करने की सोच रही हो। या फिर दलितों की भावनाओं को संसदीय राजनीति के अंतर्विरोध में उभार कर सामाजिक-आर्थिक मुश्किलों को सिर्फ दलितों के लिए बताना रहा हो। इसलिए साठ फीसदी से ज्यादा दलित उत्तर प्रदेश में आज भी पांचवी पास नहीं हैं और आठवीं पास दलितों की संख्या 12 से 15 फीसदी पार नहीं कर पा रही है। लेकिन, न्यूज चैनलों के पास इसे बताने-दिखाने का वक्त नहीं है, क्योंकि यह तात्कालिक नहीं है। आंबेडकर ने जीते-जी कई ऐसे प्रयोग किए, जो मायावती तो दूर वामपंथी भी नहीं कर पाए। मसलन, आंबेडकर ने असेंबली चुनाव के लिए सबसे पहले स्वतंत्र मजदूर पक्ष 1935 में इसीलिए बनाया था कि यह पक्ष चुनाव लड़ सके और इसके जरिए राजनीति को मजदूरों की नीति बनाने की दिशा में मोड़ा जा सके। जाहिर है मायावती के लिए मजदूर का सवाल बेमानी है।
राहुल न्यूज चैनलों के लिए ब्रांड हैं। ब्रांड की लाग-लपेट में चैनल अगर खो जाएं तो दर्शकों को सच कौन बताएगा। हुआ भी यही। राहुल गांधी ने गांधी के बराबर आंबेडकर को रखकर यह जतलाने का प्रयास किया कि कांग्रेस के सिर्फ गांधी नहीं हैं, और आंबेडकर सिर्फ बहुजन समाज पार्टी के नहीं है। लेकिन, तात्कालिकता चैनलों की प्राथमिकता है तो इतिहास गायब है और किसी ने यह बताने की जुर्रत नहीं समझी कि महात्मा गांधी के साथ न देने की वजह से ही आंबेडकर ने 1936 में कहा था कि हिंदू धर्म में पैदा होना तो उनकी मजबूरी थी, लेकिन हिंदू धर्म में मौत न हो, इसकी व्यवस्था तो वह कर ही सकते हैं। तभी से दलित समाज के लोगों ने मान लिया था कि संघर्ष तो हिंदुत्व से है। असल में 16 जून,1934 में आंबेडकर की पहली मुलाकात गांधी से हुई। मुंबई में हुई इस मुलाकात में आंबेडकर ने गांधी के सामने यही सवाल रखा कि उन्हें अस्पृश्य समाज की मदद में सामाजिक-सांगठनिक और आर्थिक तौर पर आगे आना चाहिए, इसलिए हरिजन सेवक संघ को इसमें मदद करनी चाहिए। लेकिन गांधी ने मदद से सीधे इंकार कर दिया। आंबेडकर ने हर उस आधार को ध्वस्त किया, जिसमें हिंदुओं की मौजूदगी रही है।
कांग्रेस के तौर-तरीकों को लेकर आंबेडकर ने कभी गांधी का समर्थन नहीं किया। एक वक्त, जब आंबेडकर को लेकर यह कयास लगने लगे कि वह कांग्रेस में शामिल हो जाएंगे तो आंबेडकर ने कांग्रेस को जलता हुआ घर कह कर कांग्रेसी सोच पर पानी डाल दिया।
जाहिर है न्यूज चैनल अगर इस तरह से खबरों को पकड़ने लगें तो भागती-दौड़ती मीडिया की जिंदगी ठहरेगी। देखने वाले सोचेंगे। तब पत्रकारिता सरोकार वाली होगी। लेकिन यह सब नहीं है, तो न्यूज चैनलों का अपना जीवन कैसे धोखे और फरेब वाला है, यह आईपीएल के धंधे के खिलाफ न्यूज चैनलों की खबरों से समझा जा सकता है। जब सभी न्यूज चैनलों की स्क्रीन पर आईपीएल के खिलाफ आक्रोश पैदा कर उस पर प्रतिबंध लगाने तक के राग गाए जा रहे थे, उसी दिन देश के एक राष्ट्रीय हिंदी न्यूज चैनल के परिसर में आदमकद पर्दा लगाकर प्रोजेक्टर से आईपीएल मैच दिखाने की व्यवस्था थी। यानी जो पाठ स्क्रीन पर था, वह पाठ असल जीवन में खारिज था। तो क्या यही वजह नहीं है कि आम लोगों का भरोसा इलेक्ट्रानिक मीडिया से उठ रहा है।
- 30/01/2012
आनंद प्रधान, एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएमसी
भारतीय मीडिया और खासकर टी.वी उद्योग में इन दिनों खासी हलचल है। वर्ष २०१२ की शुरुआत बहुत धमाकेदार रही। देश में शेयर बाजार में लिस्टेड कंपनियों में बाजार पूंजीकरण के लिहाज से सबसे बड़ी कंपनी, मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज ने टी.वी-18/नेटवर्क-18 (मनोरंजन चैनल कलर्स और न्यूज चैनल सी.एन.एन-आई.बी.एन, सी.एन.बी.सी आदि) में कोई 17 अरब रूपये के निवेश का एलान करके सबको चौंका दिया। - 17/01/2012
प्रमोद जोशी, वरिष्ठ पत्रकार
इस बार पेड न्यूज़ पर भी आयोग की नज़र है। पर आयोग इसे प्रत्याशी के खर्च का मामला मानता है। उसके आगे उसकी दिलचस्पी नहीं। एक पत्रकार और पाठक के लिए यह साख को बेचने का मामला है। इसलिए पेड न्यूज की तमाम उन शक्लों पर भी विचार करने की ज़रूरत है जो चुनाव की परिधि से बाहर हैं। - 02/01/2012अरविन्द विद्रोही, वरिष्ठ पत्रकार
वर्ष २०११ के विदाई और वर्ष २०१२ के आगमन की बेला में सप्ताह भर चले रात के उत्सवो ने जहां लाखो नागरिको को आनंदित कर के ऐश्वर्य के रसा स्वादन का अवसर दिया वही दूसरी तरफ करोडो-करोड़ आम जन ,मेहनत कश तबका पूंजी वाद के, ऐश्वर्य व भोग विलास के इस अदभुत नज़ारे को देख कर ,सुनकर हतप्रभ से है |
- 21/12/2011उमेश चतुर्वेदी, वरिष्ठ पत्रकार
1999 की तीखी गर्मियों के बीच देश के तमाम नेता आमचुनाव के प्रचार में धूल फांक रहे थे...तब दिल्ली के कांग्रेस मुख्यालय में कपिल सिब्बल ने अपनी पार्टी का पक्ष रखने और तत्कालीन वाजपेयी सरकार की बखिया उधेड़ने की कमान संभाल रखी थी। इन्हीं दिनों बतौर रिपोर्टर उनसे मिलने का मौका मिला
- 19/12/2011शेष नारायण सिंह, वरिष्ठ पत्रकार
हिन्दी के नामी कवि और संगीत मर्मज्ञ कुलदीप कुमार को इस साल का मीडिया एक्सीलेंस अवार्ड दिया जाएगा. २१ दिसंबर को मुंबई के एन सी पी ए सभागार में रोल आफ मीडिया इन द प्रमोशन ऑफ़ म्यूजिक इन इण्डिया नाम का सेमिनार आयोजित किया गया है . इसी अवसर पर इस पुरस्कार को देने का कार्यक्रम है


