चैनलों का ‘आजाद’ सच
आनंद प्रधान , एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएमसी
अभी हाल में, यूपीए सरकार ने जब चैनलों के नियमन (रेगुलेशन) के लिए एक भारतीय राष्ट्रीय प्रसारण प्राधिकरण (एनबीएआई) के गठन का मसौदा चैनलों के पास विचार के लिए भेजा तो चैनलों ने उसे अपनी आज़ादी को कम करने की कोशिश बताते हुए उसका विरोध किया। यह विरोध बिल्कुल जायज है। निश्चय ही, चैनलों को ऐसी किसी भी कोशिश का खुलकर विरोध करना चाहिए जो उनकी आज़ादी को कम करने या उसमें हस्तक्षेप करने और सच को दबाने की कोशिश करती हो।
बात जैसे ही सत्ता संरचना और उसमें बैठे शीर्ष व्यक्तियों तक पहुंचती है, चैनलों की आज़ादी और उनका सच हकलाने लगते हैंलेकिन क्या चैनल ऐसी हर कोशिश का इसी तरह से विरोध करते हैं जो उनकी आज़ादी को कम करने या सच को दबाने की कोशिश करती है? ऊपर से देखें तो ऐसा लगता है कि ये चैनल पूरी तरह से आज़ाद हैं। लेकिन शायद यह पूरा सच नहीं है। कई मामलों में चैनलों की यह आज़ादी और सच बोलने का उनके दावे सीमित और सतही मालूम होते हैं। खासकर पाकिस्तान, कश्मीर, उत्तर पूर्व, माओवाद जैसे मसलों पर हमारे चैनलों की यह ‘आज़ादी’ और उनका ‘सच’ अकसर ‘देशभक्ति’ और ‘राष्ट्रहित’ आदि से टकराकर लड़खड़ाने लगते हैं।
अभी पिछले महीने माओवादी नेता चेरुकुरी राजकुमार (आज़ाद) और स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद्र पाण्डेय की कथित पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने की खबर को ही लें। चैनलों ने इस मामले को न सिर्फ एक रूटीन खबर की तरह दिखाकर निपटाने की कोशिश की बल्कि पुलिस के दावे को ही सच मानकर उसकी और जांच-पड़ताल की कोई कोशिश नहीं की। आज़ाद के मामले में ‘आज़ाद’ और ‘सच’ बोलने वाले चैनलों की चुप्पी हैरान करने वाली है जबकि इस पूरे मामले में ऐसे कई तथ्य हैं जो और पहलुओं को छोड़ भी दें तो सिर्फ एक खबर के लिहाज से भी उसे बड़ी खबर बनाते हैं। ऐसा भी नहीं कि इन तथ्यों की खोज के लिए चैनलों को बहुत दौड़-भाग या खोजी पत्रकारिता करने की जरूरत थी।
लेकिन किसी भी चैनल ने इस खबर को खबर की तरह दिखाने की कोशिश नहीं की। जैसे, दिल्ली में स्वामी अग्निवेश प्रमाण सहित यह जानकारी दे रहे थे कि किस तरह माओवादी नेता आज़ाद माओवादी पार्टी और सरकार के बीच शांति वार्ता के प्रमुख सूत्रधार थे। ध्यान रहे कि अग्निवेश माओवादियों और सरकार के बीच बातचीत शुरू कराने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने शांति वार्ता की यह कोशिश गृहमंत्री पी चिदंबरम की पहल पर शुरू की थी। स्वामी अग्निवेश के मुताबिक आज़ाद कथित पुलिस मुठभेड़ में मारे जाने से पहले स्वामी जी की वह चिट्ठी लेकर माओवादी नेतृत्व के पास जाने की तैयारी कर रहे थे जिसमें वार्ता शुरू करने के लिए गृहमंत्रालय की ओर से रखी गई जरूरी शर्त 72 घंटे के युद्ध विराम की तीन तारीखों का प्रस्ताव था।
आज़ाद क्यों और किन परिस्थितियों में मारे गए? उनके साथ स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद्र पांडेय कैसे मारे गए? क्या वह मुठभेड़ वास्तविक थी? इस मुठभेड़ की न्यायिक जांच से सरकार क्यों कतरा रही है? क्या इस मुठभेड़ का मकसद शांति वार्ता की कोशिशों को आगे बढ़ने से रोकना नहीं था? आखिर सरकार और उससे बाहर वे कौन लोग हैं जो शांति वार्ता नहीं चाहते? शांति वार्ता न होने से किसे फायदा होनेवाला है? ये और ऐसे ही दर्जनों सवाल हैं जो गहराई से जांच-पड़ताल की मांग करते हैं। इसलिए भी कि गुजरात में सोहराबुद्दीन मामले की सीबीआई जांच से न सिर्फ फर्जी पुलिसिया मुठभेड़ों की आपराधिक सच्चाई सामने आ रही है बल्कि उसमें राज्य के गृहमंत्री अमित शाह तक जेल पहुंच चुके हैं।
क्या आज़ाद की मुठभेड़ में हत्या ऐसी खबर नहीं थी जिसकी सच्चाई सामने लाने की कोशिश की जाती? क्या इस देश की जनता को सच जानने का हक नहीं है? लेकिन अफ़सोस की बात है कि इतने महत्वपूर्ण मामले को चैनलों ने गहरी छानबीन के लायक नहीं समझा जबकि माओवादी-पुलिस हिंसा-प्रतिहिंसा में सैकड़ों बेगुनाह लोग लगातार मारे जा रहे हैं। ये वही चैनल हैं जिन्होंने मॉडल विवेका बाबाजी की आत्महत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए कई दिनों तक घंटों कीमती एयर टाइम खर्च किया। क्या फिर यह मान लिया जाए कि चैनलों की आज़ादी का दायरा सिर्फ विवेका या थोड़ा आगे बढ़कर जेसिका लाल या रुचिका या प्रियदर्शिनी मट्टू आदि मामलों को उठाने तक सीमित हो चुका है जहां कुछ बड़े और रसूखदार लोगों के खिलाफ बोलना ही सच की सीमा है?
लेकिन बात जैसे ही कुछ व्यक्तियों से आगे बढ़कर सत्ता संरचना और उसकी संस्थाओं और उसमें बैठे शीर्ष व्यक्तियों तक पहुंचती है, चैनलों की आज़ादी और उनका सच हकलाने लगते हैं। सच पूछिए तो आज़ाद चैनलों की आज़ादी की सीमा की जांच के लिए आज़ाद की मौत एक टेस्ट केस बन गई है। इस मामले में चैनलों के साथ-साथ समूचे कॉर्पोरेट मीडिया की चुप्पी या खुलकर सरकार के साथ खड़े होने से उनकी आज़ादी की सीमाएं बेपर्द हो गई हैं। साफ है, चैनलों ने खुद ही अपनी आज़ादी सरकार के सच को समर्पित कर दी है। सरकार बेवकूफ है, ऐसे समर्पित चैनलों के लिए नियमन की क्या जरूरत है?
(तहलका से साभार)
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- 30/01/2012
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ऑनलाइन संचार दुनिया भर में विचार का विषय है। बेशक इसके मार्फत धोखाधड़ी और हेरफेर के मामले भी सामने आ रहे हैं, पर किसी भी एक कार्रवाई का प्रभाव कितना दूरगामी होगा, इसे देखने की ज़रूरत भी है। - 20/01/2012
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आनंद प्रधान, एसोसिएट एडिटर आईआईएमसी
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