ग्लैमर बनाम पत्रकारिता

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अरूण सिन्हा
ग्लैमर..... एक सपना जो युवाओं की ज़िदगी में इस कदर छा चुका है कि इसे पाने के लिए वो हर जुगत लगाने को तैयार रहते हैं। सुबह उठने से लेकर शाम को कॉलेज में दोस्तों के साथ कैंटीन में चाय की चुस्की लेते वक्त भी बेचारे यही सोचते रहते है कि ये सपना कहां से पूरा हो और इसी उधेड़बुन में उन्हें कभी एक्टर बनने का विचार आता है तो कभी मॉडल और अगर कुछ ना सूझे तो मीडिया तो है हीं। ये बातें हवा में करने के बजाए जब मैने कुछ युवा पत्रकारों से पूछा कि भाई क्यों चुना इस पेशे को तो उनमें से कुछ ने अपनी मंशा को छुपाते हुए कहा कि वो समाज को न्याय दिलाएंगे और उनकी लड़ाई लड़ेंगे। इतना हीं नहीं जब मैने पूछा कि मीडिया के तो कई प्रारूप है, किसमे काम करने का मन है तो कहने लगे न्यूज़ चैनल्स में, बस वहीं मेरे दिमाग की घंटी बजी कि सब को चैलन्स में हीं क्यों जाना है मैग्ज़ीन या पेपर में क्यों नहीं। इन सवालों के बाद जो अगला सवाल पूछा तो बातें कुछ कुछ साफ सी हो गई क्यों कि उनमें से ज्यादातर लोगों ने मुझे बताया कि वे या तो रिपोर्टर बनना चाहते है या फिर एंकर। लबोलुआब ये है कि ख़बर तो करनी हीं है पर स्क्रीन पर जमना भी जरुरी है भाई नहीं तो ग्लैमर वाले सपनों का क्या होगा।
 
मैं यहां किसी की भावना पर चोट नही करना चाहता बस चाहता हुं कि पत्रकारिता को ग्लैमर का ज़रिया ना बनाकर संचार का वो माध्यम बनाया जाए जिसमें आम और खास के बीच की कड़ी बनकर हम आवाम की आवाज़ बनें। पर सच तो ये हैं कि इस पेशे को बतौर करियर चुनने वाले युवाओं का एक हिस्सा इसे ग्लैमर का ज़रिया बनाना चाहता है, जो कि गलत है। मैं ये नहीं कह रहा कि युवा वर्ग गलत है या फिर गलत रासते पर है मगर युवा किसी भी देश का भविष्य तभी बेहतर कर सकता है जब उन्हें अनुभवी लोगों का मार्गदर्शन भी साथ में मिलता रहे। अब मुद्दे की बात ये है कि पत्रकारिता के क्षेत्र में पांव रखने वाले युवा बिग्रेड का मार्गदर्शक कौन बनेगा।
 
इस पेशे में अपनी किस्मत आज़माने वालों की संख्या को बढ़ता देख आज दिल्ली एनसीआर में हीं ना जाने कितने मीडिया इन्स्टिटूट खुल चुके हैं जिनमें देखा जाए तो मीडिया के इस्तेमाल में आनेवाले ना तो उपकरणों को खरीदने की हैसियत है और ना हीं अनुभवी शिक्षकों को तनख़्वाह देने की, पर गेट के बाहर लगे बोर्ड को देखें तो किसी भी चीज़ की कमी नहीं दिखाई पड़ती। देखा जाए तो इन संस्थानों में युवाओं को बरगलाकर पैसा ऐंठने का करोबार चलता है जहां उन्हें ग्लैमर वर्ल्ड में जॉब दिलाने का सपना इस कदर दिखाया जाता है कि बेचारे लुटने के बाद भी समझ नहीं पाते कि ना तो वे घर के रहे और ना हीं घाट के। दरअसल ये वो संस्थान है जिन्होंने युवाओ के बीच मीडिया को लेकर बढ़ रहे क्रेज़ को पैसा कमाने का हथियार बना लिया है।
 
ऐसा नहीं है कि सारे संस्थान एक जैसे है, देशभर में कुछ ऐसे भी इंस्टिटूट है जहां पर खरे और निपुण पत्रकारों को पत्रकारिता के असल गुर सिखाए जाते है और उन्हें इस पेशे की सच्चाई से अवगत कराकर उन्हे सफल पत्रकार बनाया जाता है। पर सोचने की बात तो ये है कि, आखिर सूझ-बुझ और आत्मविश्वास से ओतप्रोत युवाओं को लुटने का ज़रिया इन कुछएक भ्रष्ट मीडिया संस्थानों ने ग्लैमर को कब और कैसे बना लिया है। सच बताउं तो अब जरुरत है इस पेशे में कुछ ऐसे मानक बनाने की जहां ग्लैमर की चाहत रखने वाले और ग्लैमर का झांसा देने वालों को  सही रास्ता दिखाना चाहिए ताकि मीडिया वर्ल्ड अपने आदर्शो और मुल्यों के लिए हीं अग्रसर रहे।