इंडियन रीडरशिप सर्वे और इसकी विश्वसनीयता

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मनजीत घोषाल, एम डी और सीईओ, मिड-डे इंफोमीडिया 
समाचारपत्र और पत्रिकाओं पर 12,000 करोड़ रुपये विज्ञापन के खर्च होते हैं। इस राशि का लगभग 80 प्रतिशत भाग मार्केट के पहले तीन बड़े मीडिया एजेंसीयों पर होता है। रैंकिंग का निर्धारण आईआरएस के आंकड़ों के द्वारा होता है। आईआरएस के रिपोर्ट से सभी आशान्वित होते हैं। हालांकि, न तो पुराने शोध पद्धति न ही नए पद्धतियों से कोई भी मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल को गंभीरता से लेने के सुझाव देता है।
 
मैंने एक्सचेंज4मीडिया पर कुछ साल पहले इस विषय पर एक लेख लिखा था। मुझे अभी भी मीडिया के विभिन्न क्षेत्रों से लेख पर प्रतिक्रिया आती है और वे उस पर अपनी सहमति जताते हैं जिनके परिवर्तन के लिए मैंने लेख लिखा था। दुनिया भर में बहुत कम उदाहरण ऐसे होंगे जहां इतने महत्वपूर्ण रिपोर्ट को ऐसे लापरवाह तरीके से तैयार किया जाता हो।
उत्तरदाताओं के लिए फॉर्म इतनी मोटी होती है कि एक सामान्य व्यक्ति के लिए इतना समय नहीं होता है कि वह इसका जवाब दे (मिड-डे पाठकों के लिए निश्चित रूप से नहीं)। मैं मीडिया में पिछले दस सालों से हूं और मैं किसी व्यक्ति के संपर्क में नहीं आया जिसने आईआरएस फॉर्म भरा हो, मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता है। (मैं ऐसे व्यक्तियों को जानता हूं जो मीडिया इंडस्ट्री में 40 वर्षों से हैं और वे सभी किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिले जिन्होंने आईआरएस फॉर्म भरा हो, इसलिए मैं नाराज नहीं हूँ।)
 
एक पाठक को मीडिया खपत का हिस्सा बनने से पहले अनगिनत अन्य प्रश्नों के जवाब देना होता है। रिसर्च को जिस तरीके से संचालित किया जाता है, अधिकतर अस्थायी कर्मचारियों के द्वारा रिसर्च संचालित किया जाता है, उत्तरदाताओं की गुणवत्ता, जो इतनी लंबी प्रश्नावलियों का जवाब देने के लिए काफी समय लेता है .... सभी मिलकर मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह उठाते हैं। यहां तक कि यह मिड-डे जैसे मीडिया प्रोडक्ट के लिए अच्छी बात नहीं है, क्योंकि इस तरह के अधिकांश सर्वेक्षण घरों में आयोजित किए जाते हैं।
 
रिसर्च के तरीकों को लगातार विकसित और उद्योग जगत में निरंतर होने वाले बदलाव के साथ बदलने की जरूरत है। हालांकि मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल लगातार रिसर्च को सांख्यिकी पैटर्न पर वृद्धिशील और आकस्मिक परिवर्तन करता रहा है। आईएनएस कोशिश कर रहा है कि एनआरएस को अधिक व्यवहारिक दृष्टिकोण दिया जाये। 
 
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  • 30/01/2012

    प्रमोद जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

    ऑनलाइन संचार दुनिया भर में विचार का विषय है। बेशक इसके मार्फत धोखाधड़ी और हेरफेर के मामले भी सामने आ रहे हैं, पर किसी भी एक कार्रवाई का प्रभाव कितना दूरगामी होगा, इसे देखने की ज़रूरत भी है।

     

  • 20/01/2012

    वर्तिका नन्दा, वरिष्ठ मीडिया  विश्लेषक

    तीन दिनों तक प्रियंका ही खबरों में रहीं। उनकी मुस्कुराहट, उनके कपड़ों का रंग, हंसने की अदा, फुर्ती, हाजिरजवाबी, मन को मोहने वाली बातें, अपनी
    दादी से मिलता चेहरा, मिलनसारिता, उनके व्यक्तित्व का करिश्मा और भी न जाने क्या-क्या। हालांकि इनमें से किसी भी बात से इंकार नहीं किया जा सकता पर मीडिया की मुग्ध होती रिपोर्टिंग और रसीली एंकरिंग के कुछ पहलुओं पर इंकार जतलाना जरूरी लगता है।

     

  • 17/01/2012

    आनंद प्रधान, एसोसिएट एडिटर आईआईएमसी

    इन विरोध प्रदर्शनों और आन्दोलनों खासकर आक्युपाई वाल स्ट्रीट प्रदर्शनों में सिर्फ बड़े कारपोरेट समूह, सत्ता प्रतिष्ठान और राजनीतिक वर्ग ही निशाने पर नहीं थे बल्कि खुद कारपोरेट मीडिया और उसका झूठ भी निशाने पर थे। सच पूछिए तो इस आंदोलन ने जिस तरह से मुख्यधारा के कारपोरेट मीडिया को नकार दिया और नए और वैकल्पिक मीडिया के जरिये लोगों के बीच सूचना-संवाद-बहस और गोलबंदी शुरू की है, वह भविष्य की ओर संकेत करता है।

     

  • 10/01/2012

    एन. के. सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

    नोबल पुरस्कार विजेता एवं विख्यात अर्थशास्त्री अमत्र्य सेन ने इस साल के प्रथम सप्ताह में ही मीडिया की खराब गुणवत्ता की दो घटनाएं झेलीं। लोकपाल से संबंधित एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने जवाब दिया। अगले दिन जब उन्होंने देश के एक बड़े अंग्रेजी अखबार और कई टीवी चैनलों को देखा, तब उसमें शीर्षक पाया ‘लोकपाल विधेयक सूझ-बूझ से लाया गया बिल-अमत्र्य सेन’। जबकि कुछ अखबारों ने शीर्षक दिया था- ‘लोकपाल विधेयक बगैर सोचे-समझे लाया गया बिल- सेन’। एक अन्य आर्थिक समाचार पत्र ने एक दिन पहला शीर्षक दिया और दूसरे दिन दूसरा शीर्षक

  • 03/01/2012
    वर्तिका नन्दा, वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक
    विज्ञापन के दौर में आ गई पत्रकारिता के लिए यह साल बहुत रोचक और चुनौतीपूर्ण होने वाला है। इंदिंरा के बाद कौन, राजीव के बाद जैसे सवालों से भारतीय जनता का सामना हमेशा हुआ। अब अन्ना के बाद कौन। अन्ना के जिस ब्रांड के भरोसे मीडिया का बाजार गुलाबी हुआ, वह बहुत ही जल्द फीका भी पड़ गया। मुद्दे उठे, लाइव रिपोर्टिंग हुई, संसद तक में हंगामा भी पर फिर सब कुछ पूरी तरह से ठस्स।

टिप्पणी

श्री घोषाल अपने निजी दर्द को

श्री घोषाल अपने निजी दर्द को सारे जहाँ का बता रहे हैं. रीडरशिप सर्वेक्षणों की प्रक्रिया में समयानुसार परिवर्तन की आवश्यकता है , इसमें संदेह नहीं. पर एक भी सेम्पल श्री घोषाल के हत्थे नहीं लगा, इसलिए यह सर्वेक्षण संदेह पैदा करता है, ऐसा कहना उतना ही तार्किक है जितना पृथ्वी पर खड़े हो कर यह बयां करना कि मैंने पचास साल गुजार लिए है इस पृथ्वी जीते हुए, पर इसे घूमता हुआ कभी नहीं देखा..!
2.41 लाख सेम्पल कंजूमर के सर्वेक्षण को 8.71 करोड़ [१२+ उम्र ] लोगों में विस्तार किया जाता है. अर्थात एक सेम्पल ३६२० लोगो में एक्स्ट्रापोलेट होता है. यदि श्री घोषाल को जानने वालों की मंडली का विस्तार ३६२० लोगोंमें है तो अवश्य ही कोई न कोई सेम्पल उनके हत्थे चढ़ जाता.
सर्वेक्षण का एक और मूलभूत नियम है. यदि सर्वेक्षण के दौरान किसी भी सेम्पल ने यह जाहिर किया कि वह मिडिया से, रिसर्च से, या विज्ञापन कि दुनिया से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़ा है तो सर्वेक्षक को उसी वक़्त इंटरव्यू ख़त्म कर अन्य किसी सेम्पल कि ओर बढ़ जाना है.
किसी भी कंजूमर सर्वेक्षणों का आधार यही है कि उसे उपभोक्ता के घर [household ] पर ही कंडक्ट किया जाए. घर की परिभाषा भी साफ़ बताई गयी है. और यह निर्धारण मार्केट रिसर्च सोसाइटी ऑफ़ इण्डिया द्वारा तय की गयी है. यदि श्री घोषाल की पीढ़ा यह है कि उनका अखबार दफ्तरों में पढ़ा जाता है इसलिए सर्वेक्षण दफ्तरों में भी हो तो यह भी तर्क संगत नहीं है. प्रश्नावली में अखबार के मत्थे को दिखा कर पुछा जाता है कि कंजूमर ने वह अखबार पढ़ा या नहीं. यदि पाठक ने हामी जताई तो वह उस अखबार के पाठकों कि गणना में आ ही जाता है, भले ही वह मांग कर या दफ्तर में पढ़ा हो.
श्री घोषाल मुंबई में कार्यरत हैं. और उस पद पर आसीन है जहाँ से वें आसानी से एम.आर.यू.सी से अपने अखबार के हित में बैक चेक की मांग कर सकते हैं, पर उनके इस लेख को पढ़ कर यह लगता है कि वें भी अन्य नि:सहाय्यों की भांति अपनी वेदना व्यक्त कर सिर्फ एम.आर.यू.सी को बलवान जताने का काम कर रहें हैं.