कैसे हिंदी हो चुकी है अब विश्व भाषा, बताया सांसद आर.के. सिन्हा ने...

Thursday, 14 September, 2017

आर.के.सिन्हा

सांसद, राज्यसभा ।।

अब आप न्यूयॉर्क से लंदन और न्यूजीलैंड से नाइजीरिया, सिंगापुर से सिडनी, फिजी से फ़िनलैंड, म्यामार से मारीशस कहीं भी चले जाइये आपको हिंदी सुनने को मिल ही जाएगी। बाजारों, मॉल्स, यूनिवर्सिटी कैंपस, एफएम रेडियो और दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर लोग-बाग हिंदी में बातचीत करते हुये मिल ही जायेंगे। यानि कि हिंदी ने एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में अपना स्थान बना लिया है।

इसकी दो-तीन वजहें समझ आ रही हैं। पहली, पूरी दुनिया में करीब डेढ़ करोड़ से ज्यादा प्रवासी भारतीय बसे हुए हैं। ये आपको संसार के हर बड़े-छोटे शहरों में मिल ही जायेंगे। ये भारतीय अपने साथ हिंदी भी लेकर बाहर गए हैं। भले ही तमिलनाडु का कोई शख्स भारत में तमिल में ही बतियाता हो, पर देश से बाहर वो किसी अन्य भारतीय के साथ हिंदी ही बोलता है। उससे भी मिस्र, मलेशिया, थाईलैंडखाड़ी और अफ्रीकी देशों में एयरपोर्ट पर मिलने वाले टूरिस्ट गाइड से लेकर होटलों का स्टाफ तक भी, भले ही टूटी-फूटी हिंदी में ही सही, संवाद स्थापित करने कि कोशिश करते है। दरअसल, जैसे ही हम भारतीय किसी अन्य देश के एयरपोर्ट से बाहर निकलते हैं हमें भारतीय के रूप में पहचाना जाने लगता है। आपको क्या हालचाल है?’ ‘भारतीय हो?’ ‘कैसे हो?’ ‘नमस्ते’ ‘प्रणामजैसे छोटे वाक्य और शब्द सुनने को मिलने लगते हैं।

दूसरा, अब भारतीय भी दुनियाभर में घूम रहे हैं। चूंकि, इनकी आर्थिक स्थिति अब सुधर रही है। ये दुबई से लेकर डरबन तक हवाई से ऑस्ट्रेलिया तक जा रहे हैं, दुनिया देखने के लिए, मौज-मस्ती करने के लिए। इसलिए इन धनी हिन्दुस्तानियों को प्रभावित करने के लिए तमाम देशों के पर्यटन उद्योग से जुड़े लोग कुछ हिंदी सीख रहे हैं। मैं हाल के दौर में स्कॉटलैंड, लंदन से लेकर सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया गया अपने कामकाज के सिलसिले में। मुझे थोड़ी बहुत हिंदी बोलते हुए अफ्रीकी देशों के अधिकांश नागरिक मिले। लंदन में केन्या मूल के एक कारोबारी मिले। मैंने उन्हें बातचीत में बताया कि मैं भारत से हूं। इस पर वे कलेजे पर हाथ रखकर कहने लगे, ‘भारत तो मेरी जान है। मैं जयपुर में पढ़ा हूं।’  चेस कैनयाटा नाम के वे सज्जन गुजारे लायक हिंदी जानते-समझते थे।

एक बार मैं मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुईस के व्यस्त बाजारों के बीच पैदल निकल रहा था कि कोई पुकार आई, ‘आईए आईए, एकदम सस्ता है, बढ़ियां है।मैंने दायें-बाएं देखा, सारी दुकानों पर चाइनीज ही बैठे नजर आये, तब तक कपड़े की एक दुकान से एक बूढ़े चाइनीज ने इशारा किया, ‘अन्दर आ जाइए। मैं अन्दर गया और पहला प्रश्न पूछा, ‘आपको हिंदी, आती है क्या?’ चाइनीज दुकानदार मुस्कुराया और बोला,’ मॉल बेचना है तो हिंदी भी तो सीखना ही पड़ता है न? यहां भारतीय बड़ी संख्या में आते हैं, फ्रेंच और अंग्रेज के बराबर ही। तो मुझे तो चाइनीज के अलावा फ्रेंच, अंग्रेजी, हिंदी और क्रियोल (स्थानीय अफ्रीकी) सभी कुछ बोलना जरूरी होता है। नहीं तो मेरा मॉल बिकेगा कैसे? यह है बाज़ारवाद की मजबूरी। जब हिंदी भाषी खरीददारों में शामिल हो गए तो बाज़ार को हिंदी सीखनी पड़ी।

यकीन मानिए हिंदी को जानने-समझने की लालसा समूचे संसार में देखी जा रही है। बेशक हिंदी प्रेम और मानवीय संवेदनाओं की बेजोड़ भाषा है। लगभग सभी टैक्सी वाले भी कुछ न कुछ हिंदी समझ लेते हैं। कम से कम एकाध लाइन हिंदी फिल्मों का गाना तो गुनगुना ही देते हैं।

इसके साथ ही भारत की पुरातन संस्कृति, इतिहास और बौद्ध धर्म से संबंध भी स्वाभाविक रूप से बाकी विश्व को हिंदी भारत से जोड़ते हैं। कम ही लोगों को मालूम है कि टोक्यो यूनिर्विसिटी में 108 वर्ष पूर्व सन 1908 में ही हिंदी के उच्च अध्ययन का श्रीगणेश हो गया था। कुछ साल पहले इस विभाग ने अपनी स्थापना के 100 साल पूरे किए। जापान में भारत को लेकर जिज्ञासा के बहुत से कारण रहे। गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर चार बार वहां की यात्रा पर गए। बौद्ध धर्मावलम्बी देशों के लोगों का  भारत से स्वाभाविक संबंध तो रहा ही हैं। अब तो जापानी मूल के लोग ही टोक्यो यूनिवर्सिटी में हिंदी भी पढ़ा रहे हैं, क्या यह छोटी बात है? वहां पर हर वर्ष करीब 20 विद्यार्थी हिंदी में स्नातकोत्तर अध्ययन के लिए दाखिला लेते हैं। अमेरिका के भी येले, न्यूयॉर्क, विनकांसन वगैरह विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। इनमें छात्रों की तादाद भी लगातार बढ़ती जा रही है। वहां भी अमेरिकी या भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक ही हिंदी अध्यापन कर रहे हैं।

जर्मनी और पूर्व सोवियत संघ और उसके सहयोगी देशों जैसे पोलैंड, हंगरी, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया वगैरह में भी हिंदी के अध्ययन की लंबी परम्परा रही है। कुछ दिन पहले जर्मनी के ट्यूबिन्यन विश्वविद्यालय में कार्यरत प्रोफेसर दिव्यराज अमिय मुझसे मिलने आये थे। वे बता रहे थे कि जर्मन मूल के हिंदी और संस्कृत के प्राध्यापक जितने गंभीर और गहरे भाषा विज्ञान के विशेषज्ञ हैं उतने तो भारतीय मूल वाले प्राध्यापक भी नहीं हैं ।

 एक दौर में सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप के बहुत से देशों और भारत की नैतिकताएं और मान्यताएँ भी लगभग समान थीं। वहां पर कम्युनिस्ट व्यवस्था थी,जबकि भारत में नेहरुवियन सोशलिज्म का प्रभाव था। दुनिया के बहुत से नामवर विश्वविद्लायों में हिंदी चेयर इंडियन काउंसिल आफ कल्चरल रिलेशंस (आईसीसीआर) के प्रयासों से ही स्थापित हुई। इनमें साऊथ कोरिया के बुसान और सियोल विश्वविद्लायों के अलावा पेइचिंग, त्रिनिडाड, इटली, बेल्जियम, स्पेन, तुर्की,रूस वगैरह के विश्वविद्लाय शामिल हैं। उधर साऊथ कोरिया में हिंदी को सीखने की वजह विशुद्ध बिजनेस संबंधी है। दरअसल वहां की अनेक बहुराष्ट्रीय  कंपनियां भारत में तगड़ा निवेश कर चुकी हैं। इनमें हुंदुई, सैमसंग, एलजी शामिल हैं।

ये अपने उन्ही पेशेवरों को भारत भेजती हैं,जिन्हें हिंदी का कुछ ज्ञान तो हो। मतलब यह है कि बाजार का फीडबैक लेने के लिए साऊथ कोरिया की कंपनियों को भारत के मुलाजिमों पर ही भरोसा न करना पड़े।

भले ही हिंदी के लिए यह कहा जाता रहे कि यह रोजी-रोटी के साथ न जुड़ी हो, पर प्रेम,संस्कृति और मानवीय संवेदना की भाषा के रूप में तो इसने अपने लिए हर देश में जगह बना ली है। उसी के चलते हर साल हजारों विदेशी हिंदी का अध्ययन करते हैं। अब तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भी कई विभागों जैसे मार्केटिंग, प्रोक्योरमेन्ट और कस्टमर रिलेशन्स में काम करने वालों के लिए काम चलाऊ हिंदी का ज्ञान अनिवार्य बना दिया है और इसके लिए बाकायदा क्लासेज भी लगाई जाती हैं। जब से चीनी कंपनियों ने भारत के बाज़ार में तेजी के अपनी पैठ बनाना शुरू किया है, सुनने में आ रहा है कि अब चीनी कंपनियों ने पाकिस्तानियों को नियुक्त करना शुरू कर दिया है जो कि चीनी व्यवसायियों और प्रबंधकों को हिंदी सिखा रहे हैं।

निर्विवाद रूप से हिंदी को संसार के कोने-कोने में लेकर जाने में हिंदी फिल्मों और राजकपूर, देवानंद और अमिताभ बच्चन जैसे महान कलाकारों की  शानदार भूमिका रही है।

हिंदी फिल्मों को देखने के प्रति भारतवंशी ही लालयित नहीं रहते। इनको लेकर पूर्व सोवियत यूनियन (अब रूस) से लेकर खाड़ी के देशों में, अफ्रीका से लेकर दक्षिण पूर्व एशियाई समेत तमाम अन्य देशों में अभूतपूर्व क्रेज है। पूर्व सोवियत संघ और उसके सहयोगी देशों जैसे पोलैंड, हंगरी, बुल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया वगैरह में हिंदी फिल्मों के लाखों चाहने वाले रहे हैं।

किसे नहीं मालूम कि राज कपूर ने अपनी फिल्मों के माध्यम से हिंदी की कितनी सेवा की है। एक दौर में सोवियत संघ की जनता राज कपूर की आवारा’, ‘श्री420’, ‘मेरा नाम जोकरसमेत तमाम फिल्मों को इसलिए पसंद करती थी, क्योंकि, उनमें भविष्य को लेकर एक संभावना का संदेश मिलता था। राजकपूर की फिल्में निराशावादी नहीं होती थीं। सोवियत संघ में राज कपूर की कामायबी की वजह मुझे ये समझ आती है कि यही हाल भारतीय भोजन का है। नान-रोटी और करी चिकेन से लेकर मसाला डोसा तक अंतर्राष्ट्रीय व्यंजन बन चुके है। जब मैं विदेशों में भारतीय रेस्टोरेंट में जाता हूं तो वहां बैठे 75 फीसद लोग विदेशी मूल के ही होते है  और कामचलाऊ हिंदी बोलते मिलते हैं ।

पिछले साल की एक मनोरंजक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा। मैं स्काटलैंड की सुदूर ग्रामीण इलाके आयरशायर के एक भारतीय रेस्टोरेंट रूपी रूममें भोजन के लिए गया। जब मैं भोजनोपरांत हाथ-मुहं धोने बाथरूम में गया, जब मैं हाथ-मुहं धोकर बाहर निकल रहा था तब एक लम्बा-चौड़ा स्काटिश अधेड़ व्यक्ति दरवाजे पर ही खड़ा था। इसने मुझे देखते ही दोनों हाथ जोड़कर ऊंची आवाज में नमस्तेकहा। शायद उसे हिंदी का एक ही शब्द आता था। यह है हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता।

पिछली सदी के पांचवे दशक का दौर रूस के लिए बेहद निराशा-हताशा का दौर था। दूसरे महायुद्ध ने रूस को खोखला कर दिया था। तब हर तरह की कमी देश में महसूस की जा रही थी। उस दौर में राजकपूर की फिल्मों ने उनके देशवासियों को जीने के लिए प्रेरित किया था। रूस के पूर्व राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन का तो पंसदीदा गाना था,... ‘अवारा हूं...

अब कुछेक सालों से जापान में भी हिंदी फिल्मों की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। जर्मनी में तो हिंदी फिल्मों का प्रदर्शन कर ही हिंदी सिखायी जाती हैI ‘एक था टाइगर’, ‘धूम-टू’, ‘थ्री इडियट्सऔर इंग्लिश-विग्लिशजैसी हिंदी फिल्मों को जापानी जनता ने खूब सराहा। उन्हें अपार सफलता मिली। और हिंदी फिल्मों के संगीत के तो क्या कहने?

मैं बीते चालीस सालों में दुनिया के 50 से भी ज्यादा देशों में गया। मैंने पाया कि सभी देशों के नागरिक हिंदी फिल्मों और इसके संगीत से जरूर वाकिफ हैं। ईस्ट अफ्रीकी देशों जैसे केन्या, तंजानिया और यूंगाडा में बसे भारतवंशियों के किसी कार्यक्रम में हिंदी फिल्मों के गाने न बज रहे हो ये नहीं हो सकता।

और सात समंदर पार हिंदी फिल्मों के सितारों में अमिताभ बच्चन लोकप्रियता के शिखर पर हैं। हिंदी फिल्मों के गीतों को सभी आयु वर्ग के लोग गुनगुनाते रहते हैं। डॉन फिल्म का मशहूर गाना खाई के पान बनारस वाला...तो मैंने कई देशों के लोगों के मुंह से गाते हुए सुना है।

बेशक, हिंदी का देश से बाहर जो अध्ययन कर रहे हैं, वे बड़ी तादाद में हिंदी फिल्मों से भी प्रेरित होते रहे हैं। और, जहां-जहां भारतीय बसे हैं, वहां भारतीय व्यंजनों की तरह हिंदी फिल्में भी पहुंचने लगीं हैं। डिजिटल क्रांति के बाद हिंदी फिल्में तेजी से मूल रूप में सारी दुनिया में दस्तक देने लगी हैं। सर्वाधिक भारतीयवंशी अफ्रीकी देशों में बसे हुए हैं। वे अपने मनोरंजन के लिए हिंदी फिल्में देखते हैं। कुछ साल पहले दक्षिण अफ्रीका में ही आइफा अवॉर्ड समारोह में आमिर खान की लगान फिल्म का भव्य व‌र्ल्ड प्रीमियर हुआ था।

होता यह है कि आप जैसे ही भारत से बाहर कदम रखते हैं तो आप पाते हैं कि सभी भारतवंशियों की ही नहीं, पाकिस्तानियों, बांग्लादेशियोंनेपालियों की भी संपर्क भाषा हिंदी ही है। अमेरिका के कई हिंदी सिखाने वाले स्कूलों में दूसरी-तीसरी पीढ़ी के भारतवंशियों को चर्चित हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय गानों और संवादों के माध्यम से हिंदी सिखाई जा रही है। देश से बाहर हिंदी को स्थापित करवाने में कई विदेशी विद्वानों का योगदान भी उल्लेखनीय रहा है।

इस लिहाज से मैं ब्रिटेन के प्रो. रोनाल्ड स्टुर्टमेक्ग्रेगर का उल्लेख करना चाहूंगा। वे हिंदी के सच्चे प्रेमी थे। उनसे ज्यादा शायद ही किसी ने पश्चिमी दुनिया में हिंदी की सेवा की हो। उन्होंने 1964 से लेकर 1997 तक कैम्बिज यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाई। वे चोटी के भाषा विज्ञानी, व्याकरण के विद्वान, अनुवादक और हिंदी साहित्य के इतिहासकार थे।

प्रो. मेक्रग्रेगर ने आचार्य रामचंद्र शुक्ल पर गंभीर शोध किया। उन्होंने हिंदी साहित्य के इतिहास पर दो खंड तैयार किए। इसी क्रम में एक नाम चीन के प्रोफ़ेसर च्यांग चिंगख्वेइ का लेने का भी मन कर रहा है। प्रो. च्यांगचिंगख्वेह ने चीन में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया है। वे लगभग 25 सालों से पेइचिंग यूनिर्वसिटी के हिंदी विभाग से जुड़े हैं। वे आजकल पेइचिंग यूनिर्विसिटी के सेंटर फॉर इंडियन स्टडीज के अध्यक्ष हैं।

उन्हें  2007 में न्यूयॉर्क में आयोजित आठवें विश्व हिंदी सम्मेलन में सम्मानित किया गया था। वे हिंदी में लगातार कहानियां भी लिख रहे हैं। और एक नाम ब्रिटेन की गिलयिन राइट का भी उल्लेखनीय है।

राही मासूम रजा का आधा गांवऔर श्रीलाल शुक्ल के कालजयी उपन्यस राग दरबारीका उन्होंने अंग्रेजी में अनुवाद किया। उन्होंने भीष्म साहनी की कहानियों का भी अनुवाद किया। इन तीनों दिग्गजों के कामों का अनुवाद करके गिलियन ने अपने लिए हिंदी जगत में एक खास जगह बना ली है। श्रीलाल शुक्ल और रजा के उपन्यासों में आंचलिकता का खासा पुट है। आचंलिक मुहावरे हैं। उन्होंने आंचलिक शब्दों और मुहावरों को जिस बखूबी के साथ अंग्रेजी में अनुवाद किया, उसकी जितनी तारीफ की जाए कम है। तो हिंदी के विश्व भाषा के रूप में स्थापित होने में इसी प्रकार की कई ठोस वजहें रहीं। और अब तो हिंदी के विकास-विस्तार उसी तरह से हो रहा है, जैसे किसी स्वच्छ नदी का प्रवाह होता है। इस तरह देखें तो हिंदी हर पैमाने पर एक प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय भाषा बन चुकी है और अंग्रेज़ी तथा चायनीज के बाद विश्व की तीसरी बड़ी भाषा बन चुकी है। यानि कि विश्व की प्रमुख भाषाओं फ्रेंच, जर्मन और स्पेनिश से कहीं ऊपर पहुंच गई है हिंदी।

 

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