'टोटी' और 'गांजा-अफीम' तक पहुंची यूपी की सियासत

'टोटी' और 'गांजा-अफीम' तक पहुंची यूपी की सियासत

Thursday, 14 June, 2018

अमर आनंद

वरिष्ठ पत्रकार ।।

फिल्म प्रेसिंडेंट में कुंदनलाल सहगल के गाने एक बंगला बने न्यारा... की तरह तो नहीं लेकिन अखिलेश यादव का बंगला उससे कम भी नहीं था। सरकारी खर्च और कई और खर्चों से बने इस बंगले से अखिलेश और उनकी सांसद पत्नी डिंपल का आत्मीय लगाव होना लाजमी है। मुमकिन है कि वो उसमें से कुछ ऐसे सामान अपने साथ ले गए होंगे, जो उन्हें बेहद अपना जरूरी लगा होगा। इनमें कुछ ऐसे सामान होंगे जिससे उनकी पत्नी और बच्चों का लगाव होगा, ये बात अस्वाभाविक नहीं है, अतार्किक हो सकती है।

बहरहाल इस बात के समर्थन और विरोध में उत्तर प्रदेश की पूरी सियासत घूम रही है और इससे कई जरूरी मुद्दें गैरजरूरी बन गए हैं। बंगले में तोड़फोड़ के इस सवाल को इसलिए भी गंभीर बनाने की कोशिश की जा रही है कि सरकार की तरफ से इसकी साज सज्जा में 42 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे। बंगले की तस्वीरें देखकर ये तो लगता है कि तोड़फोड़़ हुई है और अब ये मामला इतना बढ़ गया कि राज्यपाल ने भी इस मामले योगी सरकार को चिट्ठी लिखकर कार्रवाई करने को कह रहे है और खुद अखिलेश भी सफाई दे रहे हैं।

राज्य संपदा विभाग की सक्रियता, खास तौर से बंगले का सूरते हाल दिखाने के लिए तैयार करवाई गई मीडिया की फौज। काश ऐसी ही संजीदगी तो गोरखपुर में हुई बीमारी से बच्चों की मौत और उन्नाव रेप के मामले में भी दिखी होती, लोग सरकार की वाह-वाह कर रहे होते, लेकिन इस घटना को  कुछ लोग गोरखपुर और फूलपुर के बाद कैराना में हुई बीजेपी की हार के खुंदक के तौर पर भी देख रहे है, जैसा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में टोटी लेकर हाजिर हुए अखिलेश यादव ने भी कहा है। अखिलेश यादव ने यहां तक कहा है कि जो अधिकारी टोटी खोज लाए हैं वो कल गांजा- चिलम और अफीम भी ढूंढ़ लाएंगे। अखिलेश यादव ने साफ कहा कि जिस स्विमिंग पूल की बात की गई थी, वो था ही नहीं। सामान ले जाने के आरोपों की सफाई देने पहुंचे अखिलेश यादव ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ तौर पर कहा कि जो उनका सामान था वही साथ ले गए हैं और उन्होंने सरकारी बंगले के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की है।

सामान के बहाने सम्मान पर हमला किए जाने से बिफरे अखिलेश यादव ने गुस्से में गांजा-अफीम तक की बात कह दी। अखिलेश यादव ने कहा कि तस्वीरें इस हिसाब से ली गई हैं, जो दिखाई पड़े जिससे पता चले कि पूरे बंगले में तोड़फोड़ की गई हो। अखिलेश यादव तो सफाई में जो कह रहे हैं, सो कह रहे हैं। इससे अलग भी सवाल है जो खड़े हो रहे हैं। 

दो जून को जिस दिन अखिलेश यादव बंगला छोड़कर गए तस्वीरें उस दिन क्यों नहीं खिंची गई। एक सप्ताह रुककर 'योजनाबद्ध' तरीके से मीडिया को बुलाकर तस्वीरें खिंचवाने के पीछे आखिर क्या वजह थी? दूसरा सवाल पूर्व मुख्यमंत्रियों के कुछ और बंगले थे जिनसे सामान हटाने की बात कही जा रही है उनके बारे में राज्य की संपदा विभाग कुछ क्यों नहीं कह रही है? जहां तक हमारा मानना है कि बंगले के सामानों का ब्यौरा और लेनदेन की बातें मीडिया ईंवेंट बनाए बगैर की जा सकती थी, लेकिन ऐसा तभी संभव था, जब सरकार ऐसा करना चाहती। विरोधी ये भी कह सकते हैं चूंकि मुख्यमंत्री योगी खुद परिवार के साथ नहीं रहते इसलिए परिवार और बच्चों की जरूरतों और उनके सामानों के बारे में भला वह क्यों सोचेंगे

बंगले को कैराना उप चुनाव की हार की खुंदक से जोड़कर इसलिए भी देखा जा रहा है  कैराना में जीत की उम्मीद लेकर चल रहे योगी ने चुनाव प्रचार में अखिलेश यादव पर तीखे हमले करते हुए आरोप लगाया था कि अखिलेश के हाथ दंगों और मासूमों के खून से सने हुए हैं। यूपी कैबिनट की तमाम कोशिशों और जिन्ना वाले मुद्दे के बावजूद जब बीजेपी कैराना हार गई, तो जाहिर तौर  उसके एक कारण अखिलेश भी थे, जिन पर सरकार का गुस्सा होना स्वाभाविक है और बदले जैसा नजर आ रहा है। बंगले की इस सियासत को 2019 से भी जोड़कर देखा जाना चाहिए। यूपी की सरकार और सरकारी पार्टी बीजेपी ने एक तरफ जहां बंगले को क्षतिग्रस्त किए जाने के मामले में अखिलेश यादव पर हमलावर रुख अख्तियार किया है, वहीं दूसरी तरफ बीएसपी सुप्रीमो मायावती के द्वारा अपने बंगले को कांशीराम मेमोरियल बनाए जाने के मामले में खामोश है। इस मामले में बीजेपी 'फूट डालों और मिला लो' की रणनीति पर काम कर रही है। अखिलेश समर्थक ये मानते हैं कि बंगले की तोड़फोड़ की बात कर बीजेपी की सरकार का इरादा समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव के इमेज को करना और उनका मनोबल कमजोर करने की कोशिश करना है। जाहिर तौर पर 2019 में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों की भूमिका नई सरकार के लिए अहम होगी और उन सीटों के लिए चुनावी रणनीति में अखिलेश की भूमिका भी अहम होगी। इस लिहाज से योगी और बीजेपी के लिए अखिलेश यादव सियासी दुश्मन नंबर एक होंगे।

देखा जाए तो बंगले की सियासत से दोनों की ही छीछालेदर हुई है सरकार की भी, अखिलेश यादव की भी, लेकिन योगी और अखिलेश एक बात कॉमन है। दोनों ही विकास की बात करते हैं। लेकिन लखनऊ मेट्रो और गाजियाबाद के एलिवेटेड रोड समेत पुरानी अखिलेश सरकार के कई प्रोजेक्ट पर काम पूरा होने के बाद शुभारंभ कर चुके मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी का विकास अभी उत्तर प्रदेश को देखना बाकी है। राज्य की जनता ये उम्मीद रहेगी कि वो अखिलेश से भी बेहतर सरकार देकर जनता की नजरों में उनका कद खुद के मुकाबले छोटा करें, जो बंगले जैसे प्रसंग से कभी संभव नहीं है।

गोरखनाथ पीठ के कर्ताधर्ता योगी धर्मगुरु हैं, खांटी संगठन कर्ता और जमीनी नेता है। हिंदुत्ववादी राजनीति के अगुवा होने के बावजूद कुछ हद तक मुस्लिम आबादी में भी सम्मान पाते हैं, लेकिन बतौर मुख्यमंत्री योगी का दिल समर्थकों के लिए, सियासी विरोधियों के लिए और राज्य की जनता के लिए बहुत बड़ा होना चाहिए, दो- दो बंगलों को मिलाकर बनाई गई चार विक्रमादित्य के अखिलेश के उस बंगले से भी बड़ा, जिसे लेकर फिलहाल यूपी की सियासत गर्माई हुई है।

 

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