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BARC: दूसरे नंबर पर पहुंची ये पॉलिटिकल पार्टी, लिखी मार्केटिंग की नई परिभाषा

Published At: Thursday, 17 May, 2018 Last Modified: Thursday, 17 May, 2018

नीतू मोहन व मधुवंती साहा ।।

हाल ही में हुए कर्नाटक चुनाव के नतीजों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। हालांकि येदियुरप्पा ने कर्नाटक के 25वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली।

कुल मिलाकर चुनाव परिणामों ने एक तरह से अनिर्णय की स्थिति पैदा कर दी है लेकिन यदि चुनाव प्रचार और मतदान की बात करें तो दोनों ही काफी अच्छे रहे थे। भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों ने विभिन्न माध्यामों से प्रचार-प्रसार में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। घर-घर जाकर जनसंपर्क करने के अलावा बड़े-बड़े अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन देने के साथ ही उम्मीदवारों ने सोशल मीडिया पर भी कैंपेन चलाया था और अपने पक्ष में हवा बनाने के लिए किसी भी तरह की कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसारभाजपा ने इस दौरान विज्ञापनों पर 300 करोड रुपए खर्च किए और इस राशि में सबसे ज्यादा खर्च प्रिंट को दिए जाने वाले विज्ञापनों पर किया जबकि कांग्रेस ने 50-60 करोड़ रुपए विज्ञापनों पर खर्च किए।

रिपोर्ट के अनुसारभाजपा ने कर्नाटक के एक अखबार को विज्ञापन के लिए तीन करोड़ रुपए दिए थे जबकि उसी अखबार में विज्ञापन के लिए कांग्रेस और जेडीएस ने दो-दो करोड़ रुपए खर्च किए थे।

भाजपा ने जहां अंग्रेजी के साथ ही प्रादेशिक अखबारों पर भी विज्ञापन पर पैसा खर्च कियावहीं कांग्रेस और जेडीएस का ज्यादा फोकस प्रादेशिक अखबारों पर ही रहा। इसलिए प्रादेशिक अखबार जैसे- 'प्रजावाणी' (Prajavani) और 'कन्नड़ प्रभा' (Kannada Prabha) पर भी दोनों पार्टियों का ध्यान केंद्रित रहा। इसके साथ ही क्षेत्र के विभिन्न प्रमुख अखबारों में मास्ट हेड के नीचे का हिस्सा करीब दो हफ्ते तक भाजपा ने बुक करा लिया था।  

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसारइस बीचनवंबर 2017 में गठित हुई अखिल भारतीय महिला सशक्तिकरण पार्टी (All India Mahila Empowerment Party) ने भी 'विजय कर्नाटक' (Vijay Karnataka) नामक अखबार में पूरे पेज का विज्ञापन दिया था। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इसके लिए पार्टी ने 50 लाख रुपए दिए थे। इस तरह यह पार्टी भी अखबारों पर विज्ञापन खर्च करने वाले बड़े दलों में शामिल हो गई थी।


'TV9 Kannada' के डायरेक्टर 'क्लिफोर्ड पिरिया' (Clifford Pereira) ने बताया कि इन पार्टियों द्वारा टेलिविजन पर भी काफी खर्चा किया गया।

कर्नाटक चुनाव के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा अप्रैल के आखिरी हफ्ते से विज्ञापन देना शुरू कर दिया गया था। भाजपा ने दो हफ्ते के लिए रोजाना करीब 70 स्लॉट बुक कराए थे। इस तरह ये विज्ञापन पूरे दिन चैनल पर चलते रहते थे। वहींकांग्रेस ने शुरुआत में बहुत कम रोजाना पांच स्लॉट बुक कराए थे। इसके बाद उन्होंने रोजाना 40 स्लॉट और इसके बाद 80-100 स्लॉट बुक कराए। जेडीएस ने दो हफ्तों तक रोजाना पांच स्लॉट बुक कराए थे।   

इस हिसाब से 'बार्क' (BARC) के टॉप 10 एडवर्टाइजर्स की लिस्ट में भाजपा भी शामिल हो गई और 18वें हफ्ते (28 अप्रैल- 04मई) की रेटिंग में 10012 'इंसर्शंस' (insertions) के साथ दूसरे नंबर पर आ गई।

इंटरनेशनल ब्रैंड एक्स्पर्ट और 'ब्रैंड्स ऑफ डिजायर' (Brands of Desire) के सीईओ सौरभ उबोवेजा राजनीतिक दलों द्वारा खर्च की गई इस राशि को ज्यादा नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि जो भी पार्टी सत्ता चाहती हैउसे चुनाव प्रचार पर बहुत ज्याiदा खर्च करना होगा। 

उन्होंने कहा, 'जो भी पार्टी सत्ता में होती है वह सरकार की विभिन्न योजनाओं आदि की मार्केटिंग और कैंपेन पर बहुत ज्यादा खर्च करती है। इसलिए यह भाजपा का मार्केटिंग बजट नहीं बल्कि सरकारी मार्केटिंग है।'

सोशल मीडिया के दौर में विभिन्न पार्टियों द्वारा पल-पल की अपडेट के लिए ट्वीट्स और हैशटैग आदि का भी काफी सहारा लिया गया।

एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार के अनुसारकांग्रेस की सोशल मीडिया टीम में 30 सदस्य थे जबकि भाजपा के लिए दो अलग टीम- बीजेपी कर्नाटक और बीएस येदियुरप्पा थीं।

कांग्रेस ने #INC4Karnataka, #KarnatakaDefeatsBJP और #JanaAashirwadaYatre हैशटैग का इस्तेमाल कियाजबकि भाजपा ने #CongressMuktKarnataka, #BJPWaveInKarnataka और #KarnatakaTrustsModi का इस्तेमाल किया। इसके अलावा #KarnatakaElections2018, #KarnatakaPolls जैसे हैशटैग का इस्तेमाल भी किया गया।चुनाव प्रचार के दौरान वॉट्सऐप ने भी काफी अहम भूमिका निभाई। अपनी उपलब्धियों और वादों को लोगों तक पहुंचाने के लिए उम्मीदवारो ने वॉट्सऐप का भी सहारा लिया। 12 मई को मतदान से पूर्व भाजपा और कांग्रेस ने अपने संदेश देने के लिए कम से कम 50,000 वॉट्सऐप ग्रुप इस्तेमाल करने का दावा किया था। वोटर्स तक अपनी बात पहुंचाने के लिए इन राजनीतिक दलों ने 'फेसबुकऔर 'यूट्यूबका भी इस्तेमाल किया।

उबोवेजा का कहना है, 'पिछले दो महीनों में भाजपा ने वॉट्सऐप पर काफी खर्च किया। वे सीधे लोगों तक जुड़ने का प्रयास कर रहे थे। चूंकि आजकल लगभग सभी लोगों के पास मोबाइल फोन है। ऐसे में विडियो मार्केटिंग भी खूब हुई।

गांधीनगर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार दिनेश गुंडू के पब्लिक रिलेशन की कमान संभालने वाले 'बोस कम्युनिकेशंस' (Bose Communications) के संजय बोस का कहना है कि हमने ज्यादा से ज्‍यादा लोगों तक पहुंच बनाने का काम किया और उन्हें उम्मीदवार द्वारा क्षेत्र में कराए गए विकास कार्यों से अवगत कराया। इसके लिए हमने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे 'फेसबुक', 'वॉट्सऐप 'ट्विटरआदि का सहारा लिया। क्षेत्र में कराए गए विकास कार्यों की शॉर्ट विडियो बनाकर भी हमने वॉट्सऐप मैसेज के जरिए विधानसभा क्षेत्र के लोगों तक पहुंचाईं।

कर्नाटक में प्रत्येक चौक-चौराहों पर विभिन्न उम्मीदवारों के होर्डिंग और पोस्टर्स लगाए गए थे। अपने एजेंडा और उपलब्धियों के बारे में लोगों को बताने के लिए राजनीतिक दलों ने पैम्प्लेट और नोटिस का भी सहारा लिया।

कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि इस बार कर्नाटक चुनाव में विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा अपनाई गई मार्केटिंग स्ट्रैटजी ने आगामी चुनावों के लिए एक नई परिभाषा लिख दी है। अब सरकार के गठन के बाद ही तय होगा कि आखिर किसकी स्ट्रैटजी ने अपना काम बाखूबी किया।

 

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