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23/01/2012एस निहाल सिंह, ‘द स्टेट्समैन’ के पूर्व संपादकनेटवर्क18’और ‘ईटीवी’ समूह के बीच हुए समझौते पर मेरी पहली प्रतिक्रिया थी कि भारत के लिए यह सही समय है कि मीडिया में एकाधिकार के विरूद्ध एक कड़ा कानून लाया जाए। सभी प्रजातांत्रिक देशों, यहां तक कि सबसे अधिक विकसित देशों में भी इस तरह के कानून/प्रथा/आदर्श हैं।
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23/01/2012दिलीप चेरियन, मीडिया विश्लेषकवैश्विक स्तर पर हमने देखा है कि जब बड़ी पूंजी मीडिया में प्रवेश करती है तो उसका किस तरह से असर होता है, वास्तव में हम क्या कर रहे हैं, हम खुद को दोहरा रहे हैं।
आज, विश्व भर में मीडिया में अल्पाधिकार की प्रवृति दिखाई दे रही है, चाहे वह सिल्वियो बर्लुस्कोनी हो या रूपर्ट मर्डोक। सच्चाई यह है कि वे ना सिर्फ बड़े पैमाने पर मीडिया को प्रभावित करते हैं बल्कि राजनीति को भी प्रभावित करते हैं।
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23/01/2012महेंद्र त्रेहान, संस्थापक, संपादक इंडिया टुडेअगर सरकार और कॉरपोरेट अधिक सर्तक रहेंगे तो ऐसा नहीं होगा। एक व्यक्ति कई संपत्तियों का मालिक है। “2जी टेप (नीरा राडिया प्रकरण) से सभी को पहले से ही मालूम है कि कॉरपोरेट के द्वारा सभी कुछ निर्धारित किया जा रहा है। यह काफी खतरनाक है कि मुकेश अंबानी आपके सारे फैसले लेंगे, कहने का अर्थ की नीतियों का निर्धारण करेंगे क्योंकि जैसा कि आप सभी को मालूम है कि पहले (अतीत में) क्या हुआ है। चाहे वह किसी से बात करना या किसी की आलोचना करना या उसे बेनकाब करना हो.।”
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