नज़रिया

आईआरएस सर्वे पर उठते सवाल

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अनंत नाथ, डायरेक्टर, दिल्ली प्रेस
मर्फी के सबसे लोकप्रिय कानूनों में से एक ‘अगर यह कहा जाता है कि एक साइज सबसे लिए फिट बैठता है तो यह किसी के लिए फिट नहीं हो सकता।’ मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल की एक कहावत के अनुसार, अगर वे कुछ अच्छा कार्य करते हैं तो कुछ छिपाते भी हैं। इसे और अधिक प्रासंगिक रखने के लिए, साप्ताहिक टैम रेटिंग के साथ इस साल मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल ने यह निर्णय लिया है कि इंडियन रीडरशिप सर्वे (आईआरएस) को तिमाही के आधार पर निकाला जाये न कि पिछले साल की तरह अर्द्धवार्षिक आधार पर।
 
इरादा नेक है, लेकिन कोई इससे इंकार नहीं कर सकता कि सर्वेक्षण की अनुसंधान प्रणाली में पिछली विषंगितयों और दोषों को दूर करने के लिए कुछ नहीं किया गया है। काफी लंबे समय से बोर्ड भर में प्रकाशकों के डेटा प्रक्रिया के संग्रह की विश्वसनीयता और प्रक्रिया के बारे में सवाल उठाया जा रहा है, उनमें से बहुतों के बारे में अभी भी रहस्य बना हुआ है। त्रैमासिक आधार पर सर्वेक्षण के नतीजों को शामिल करने पर उनके निष्कर्ष पद्धति और विश्लेषण से पब्लिशिंग इंडस्ट्री को लाभ पहुंचाने के स्थान पर हानि ज्यादा होगी।
 
इन चिंताओं के बीच अग्रणी मुद्दा उपभोक्ताओं की प्रतिक्रिया की विश्वसनीयता को प्रश्नावली के बोझिल स्वरूप से समझा जा सकता है। एक प्रतिवादी से 40 से अधिक पन्नों के प्रश्नावली का सही जवाब की कोई उम्मीद कैसे कर सकता है? पिछली बार हममें से किसी ने कब एक पेज से ज्यादा उपभोक्ता फॉर्म भरा था? तेजी से बदलती जीवनशैली में हर कोई अनुभव करता है कि प्रश्नावली का उत्तर देते समय बिना ज्यादा सोचे एक सरसरी नजर दौड़ाते हुए भरते चले गए होंगे।
 
मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल से बार-बार सैंपल को पूर्ण संख्या में बदलने की पद्धति के बारे में पूछताछ की गई है और मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल तकनीकी समिति पर इस मुद्दे को डालकर निश्चिंत हो जाता है, इसकी विधि को काफी गोपनीय रखा जाता है। न ही प्रकाशक और न ही विज्ञापनदाताओं को इनकी डेटा संग्रह प्रक्रिया के बारे में पता है, कौन सा फॉर्मूला ये उपयोग करते हैं और क्या इनका अनुमान सही है।
 
इस समस्या की जटिलता के लिए मीडिया रिसर्च काउंसिल लगातार, ‘वन साइज फिट ऑल पॉलिसी’ अपनाता रहा है। एक ही मंच पर पत्रिका और समाचारपत्र के पाठकों को ला खड़ा करता है। पत्रिका अपनी प्रकृति के अनुसार उच्च भागीदारी उत्पाद है, लेकिन समाचारपत्र की तुलना में इसका प्रकाशन कम होता है। यहां काफी अनुसंधान की जरूरत है कि एक पाठक समाचारपत्र की अपेक्षा पत्रिका में किसी मुद्दे को ज्यादा पढ़ता है। समाचारपत्र को पढ़ना एक दैनिक दिनचर्या है जबकि, पत्रिका को ज्यादा इत्मीनान से पढ़ा जाता है, इसलिए इसका गहरा प्रभाव है।
 
अभी तक, अपनी प्रकृति के कारण, समाचारपत्र ऐसा उत्पाद है जिसे हर कोई प्रतिदिन बिना किसी रूकावट के देखता है, जबकि, पत्रिका के साथ ऐसी बात नहीं है, पत्रिका में जब कोई मुद्दा उठाया जाता है तो इसकी मांग होती है फिर धीरे-धीरे दिन प्रतिदिन कम हो जाती है, तब तक जब अगली बार फिर से कोई मुद्दा ना आये।
 
इसलिए अगर मैं ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ और ‘द इकनॉमिस्ट’ का पाठक हूं तो भी मैं ‘द इकनॉमिस्ट’ के किसी एक मुद्दे को ज्यादा ध्यान से और समय देकर पढूंगा ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के किसी विशेष मुद्दे की अपेक्षा। मैं ‘द इकनॉमिस्ट’ को ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की अपेक्षा अधिक एकाग्रता और अधिक बार पढ़ना चाहूंगा। न्यूयॉर्क टाइम्स को रूटीन की तरह सुबह के समय एक बार पढ़ूंगा।
 
भारत में समाचारपत्रों के साथ जुड़ने के स्तर को हम इस तरह से भी समझ सकते हैं। यहां समाचारपत्र का मूल्य इतना कम है कि अगर किसी को पढ़ने का मन न भी हो तो भी वह खरीद लेता है क्योंकि पुराने समाचारपत्रों को रद्दी में बेचनेपर भी उसे कवर प्राइस से अधिक मिल जाता है। दूसरी ओर पत्रिका का मूल्य अधिक होता है। विदेशों में दैनिक समाचारपत्र और पत्रिका का मूल्य अनुपात क्रमश: 1:2 और 1:4 होता है, जबकि, भारत में इनका मूल्य अनुपात 1:10 से लेकर 1:20 तक है। दोनों के पाठक एक समान कैसे हो सकते हैं?
 
इस संबंध में, मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल के लिए उपयोगी यह होगा कि वे जब भी वे अपने सर्वेक्षण को डिजाइन करते हैं तो व्यावहारिक अर्थशास्त्र के सिद्धांतों पर गौर करें। व्यावहारिक अर्थशास्त्र में व्यक्तियों और संस्थाओं के द्वारा सामाजिक, संज्ञानात्मक और भावानात्मक कारकों का अध्ययन किया जाता है। मनोविज्ञान और अर्थशास्त्र के सिद्धांतो को एक साथ करके व्यावहारिक अर्थशास्त्र व्यक्तिगत निर्णयों को समझने के लिए सबसे विश्वसनीय विकल्प है। संक्षेप में, व्याहारिक अर्थशास्त्र का संबंध मानव के तर्कहीनता के प्रभावों से है। यह बिना किसी पूर्वाग्रह के हमारे तर्कसंगत निर्णय को प्रभावित कर सकता है।
 
रीडरशिप सर्वेक्षण को सम्मान देने के लिए पत्रिका को समाचारपत्रों के साथ विरोधाभासी डिजाइनिंग से बचना होगा। एक तरीका यह भी है कि पत्रिका के मामले में अधिक भागीदारी के लिए ज्यादा वजन देना होगा। अब आईआरएस की प्रश्नावली में सिद्धांतत: कुछ परिवर्तन करने होंगे (समाचारपत्रों के लिए एक दिन, साप्ताहिक के लिए एक सप्ताह, पाक्षिक के लिए एक पखवाड़ा)। लेकिन व्यावहारिकता में जब उत्तरदाता बिजली की गति से मास्टहेड पर नजर दौड़ाते हुए प्रश्नों के उत्तर देता है तो इस तरह का वर्गीकरण बेकार चला जाता है। उत्तरदाता अपनी यादादाश्त के आधार पर पत्रिकाओं की मदद करने के बजाय समाचारपत्रों के पक्ष में निर्णय देता है। यह पत्रिका के खिलाफ काम करता है।
व्यावाहारिक और संज्ञानात्मक सीमाओं के भीतर स्पष्ट रूप से कोई भी यह देख सकता है कि प्रतिक्रियायें किस तरह से काम करती हैं।
 
उपभोक्ता सर्वेक्षण स्वाभाविक रूप से सांख्यिकी व्यायाम है, जो अर्थशास्त्र का एक विस्तार है, व्यवहार के अध्ययन से, निश्चित रूप से फायदा मिलेगा। समाचारपत्र और पत्रिकाओं की खपत में व्यावहारिक रूप से अंतर होने के कारण मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल के द्वारा ‘वन साइज फिटस ऑल’ नीति स्पष्ट रूप से दोषपूर्ण है। मीडिया रिसर्च यूजर्स काउंसिल 150 से अधिक पत्रिकाओं को पहले ही कवर करता है और इनमें से कई को शामिल नहीं किया गया है। पत्रिकाओं के लिए अलग सर्वेक्षण नीति बनाने से ही इस समस्या का समाधान होगा। सर्वेक्षण को आप छोटे स्तर पर ही करें, समाचारपत्र से अलग, लेकिन कम से कम इसे और अधिक विश्वसनीय बनाना होगा और पत्रिकाओं के पाठकों को सही तरीके से मापने के लिए उपयुक्त यही है।
 
(लेखक दिल्ली प्रेस के डायरेक्टर हैं।)
 
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  • 26/08/2010
    मनजीत घोषाल, एमडी और सीईओ, मिड-डे इंफोमीडिया 
    मैं मीडिया में पिछले दस सालों से हूं और मैं ऐसे किसी व्यक्ति के संपर्क में नहीं आया जिसने आईआरएस फॉर्म भरा हो, मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता है। मैं ऐसे व्यक्तियों को भी जानता हूं जो मीडिया इंडस्ट्री में 40 वर्षों से हैं और वे सभी किसी ऐसे व्यक्ति से नहीं मिले, जिन्होंने आईआरएस फॉर्म भरा हो
  • 23/08/2010
    मृणाल पाण्डे, वरिष्ठ पत्रकार
    देश की राष्ट्रपति, मुख्य चुनाव आयुक्त तथा मीडिया व राजनीति के पुरोधाओं की तरफ से मीडिया में बढ़ते छिछोरेपन, गहराते भ्रष्टाचार तथा मीडिया संस्थानों द्वारा पैसा लेकर खबरें छापने पर, इधर लगातार कई गंभीर टिप्पणियां जारी हुई हैं।
  • 19/08/2010

    जय प्रकाश चौकसे, वरिष्ठ फिल्म समीक्षक

    इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की आत्मा का तोता टीआरपी नामक पिंजरे में कैद है। टेलीविजन पर लोकप्रियता का आकलन करने वाली अंतरराष्ट्रीय ख्याति की कंपनी ने सांस्कृतिक विविधता वाले भारत में मात्र सात हजार घरों में उनके मीटर लगाए हैं और यह बताना कठिन है कि मीटर नौकर के कक्ष में लगा है या मालिक के टीवी में। कितने मीटर ग्रामीण क्षेत्र में हैं और कितने महानगरों में।

  • 10/08/2010

    सुनील जैन, सीनियर एसोसिएट एडिटर, बिजनेस स्टैंडर्ड

    प्रेस परिषद कहती है कि उसके पास सीमित अधिकार हैं जो उसे कदाचार के दोषियों पर दंड आरोपित करने की अनुमति नहीं देते और टेलीविजन न्यूज के मामले में ये सीमित अधिकार भी लागू नहीं होते। लेकिन वह किसी का नाम लेकर उसे आसानी से शर्मसार कर सकती थी। इससे संकेत मिलता है कि पेड न्यूज के कारोबार में शामिल अखबार कितने ताकतवर हैं कि उन्होंने प्रेस परिषद को अपना नाम सामने आने देने से भी रोक दिया।

  • 05/08/2010

    आनंद प्रधान , एसोसिएट प्रोफेसर, आईआईएमसी

    अभी हाल में, यूपीए सरकार ने जब चैनलों के नियमन (रेगुलेशन) के लिए एक भारतीय राष्ट्रीय प्रसारण प्राधिकरण (एनबीएआई) के गठन का मसौदा चैनलों के पास विचार के लिए भेजा तो चैनलों ने उसे अपनी आज़ादी को कम करने की कोशिश बताते हुए उसका विरोध किया। यह विरोध बिल्कुल जायज है