शशि शेखर से भेंट वार्ता

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शशि शेखर- एक परिचय
30 जून 1960 को मैनपुरी (उत्तरप्रदेश) के गांव चंदीकारा में जन्मे शशि शेखर ने बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व में एम.ए किया है। उनके कॅरिअर की शुरुआत वाराणसी के प्रसिद्ध दैनिक आज से हुई। बाद में वे आज के इलाहाबाद और आगरा संस्करण के संपादक भी रहे। सन 2001 में वे आज तक न्यूज चैनल में चले गए। वहां डेढ़ साल रहने के बाद वे वापिस प्रिंट मीडिया में आ गए और इस बार उन्होंने अमर उजाला मेरठ में कार्यकारी संपादक का कार्य संभाला। पत्रकारिता तथा समाचारपत्र प्रबंधन में उनकी कार्यकुशलता से प्रभावित होकर अमर उजाला मैनेजमेंट ने उनको ग्रुप एडिटर और प्रेसीडेंट(न्यूज़) नियुक्त किया। सितंबर 2009 से वे दैनिक हिंदुस्तान, नंदन और कादंबिनी के मुख्य संपादक के पद पर कार्यरत हैं।
 
 
पिछले दिनों दैनिक हिन्दुस्तान, नंदन और कादंबिनी के मुख्य संपादक शशि शेखर से समाचार4मीडिया के संवाददाता हरेश कुमार और नितिन पाण्डेय की एक मुलाकात हुई। मुलाकात में शशि शेखर ने भारत में हिंदी मीडिया के भविष्य सहित कई अन्य ज्वलंत मुद्दों पर अपनी बेबाक राय दी। प्रस्तुत है उनसे भेंटवार्ता के प्रमुख अंश :: 
 
पिछले कुछ दिनों में हिन्दुस्तान ने कंटेंट को ध्यान में रखते हुए जो बदलाव किये हैं, उन पर जरा विस्तार से प्रकाश डालें।
हमने पाठकों को ज्यादा जगह दी है। एक तो हमने डिजाइनिंग को रीडर फ्रेंडली बनाया। कुमकुम और कलश, सदाबहार रंग आदि नए परिवर्तन इंट्रोड्यूस किए हैं, न्यूज पेपर के आठ फॉर्मेट डिजाइन किए हैं। ग्राफिक्स पर हमने काफी ध्यान दिया है, पाठकों के दिमाग में हमने ग्रफिक्स के द्वारा जगह बनायी है। वह अखबार, अखबार नहीं जो जिंदगी की खबरें न छापता हो। अपराध की रुटीन खबरों से हटकर हमने 9 मुख्य मुद्दों पर फोकस करने का निर्णय किया है, जिनमें कारोबार, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन, टेलीकम्युनिकेशन, कृषि व सूचना का अधिकार के मुद्दे प्रमुख हैं। खबरें छापते समय हमें यह देखना है कि खबरें किसके लिए छापते हैं, हमारा पाठक हमसे क्या-क्या अपेक्षायें रखता है। हम आम आदमी के जीवन से जुड़े उन मुद्दों को उठायेंगे। उदाहरण के लिए राहुल गांधी अगर आज मुंबई में हैं तो उस खबर का असर बिहार में अलग, देश में अलग और मुंबई में अलग होगा। हमने अखबार में लेटर्स पर अधिक फोकस किया है तथा उसे और भी रीडर फ्रेंडली बनाया है। ऐसा नहीं है कि पहले अखबार में लेटर्स नहीं आते थे, पर अब हमने अपने पाठकों की प्रतिक्रिया को विशेष महत्व दिया है। आगरा और बरेली में नए संस्करण लांच किए हैं। हमें काफी अच्छा रिस्पांस मिला है। हमने इसे युवाओं पर केंद्रित किया है। समाज को लेकर चलना हमारा मुख्य फोकस है। इधर अखबारों का तेजी से विकास हुआ है। सिटीजन जर्नलिस्ट की अवधारणा पर हमने काम किया है। आगरा में हमें प्रतिदिन 15 से 20 खबरें इनके द्वारा मिलती है। 
 
हिन्दुस्तान भाषा की विविधता पर किस तरह ध्यान देता है ? क्या हिंदी भाषी क्षेत्रों जैसे इलाहाबाद, बरेली की भाषा और दिल्ली में अखबार की भाषा में अंतर रखा जाता है ?  
मैं हिंगलिश का पक्षधर नहीं हूं, लेकिन अंग्रेजी का विरोधी भी नहीं हूं। हमारी यही चाहत है कि देशज भाषायें सुरक्षित रहें। अगर अंग्रेजी हमारी भाषा ले सकती है तो हम अंग्रेजी से कुछ शब्द क्यों नहीं ले सकते ?  यह एक जाना-माना सच है कि हर दस किलोमीटर पर भाषा बदल जाती है। हिन्दुस्तान 1000 किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में फैला अखबार है। तो इसमें भाषा की विविधता तो आ ही जाती है। दिल्ली में सभी जगहों के लोग रहते हैं, यहां के अखबार में उसका ध्यान रखा जाता है जबकि स्थानीय संस्करणों में वहां की बोली का विशेष ध्यान रखा जाता है। हिंदी भाषी पूरे देश में फैले हुए हैं।  
 
कई सालों के प्रकाशन के बावजूद, क्षेत्रीय अखबार विश्वसनीयता के पैमाने पर खरे उतरने में कामयाब नहीं हो पाये हैंक्या हिंदी मीडिया आपको इस मुद्दे को लेकर सजग नजर आता है ? 
कौन कहता है कि हिंदी मीडिया विश्वसनीयता के पैमाने पर खरा नहीं उतरता है? वे लोग जो पाँच सितारा होटलों में बैठकर पत्रकारिता करते हैं ? मुंबई में बैठकर छोटे शहरों की खबरें करते हैं ? यही लोग नक्सलाइट का समर्थन करते हैं। रिस्पोंस तो छोटे शहरों से ही मिलता है। अगर छोटे शहरों में हम कोई गलत खबर छाप दें तो लोग तुरंत हमारी खबर लेने लगेंगे। बड़े शहरों में लोगों के पास समय कहां है ? हम इस बात के कायल हैं कि खबर सत्य से भटक गई तो खबर नहीं, स्टोरी हो जाती है। 
 
क्या लगता है, हिन्दी अखबार पिछले कुछ सालों में अपने आपको ब्रांड के तौर पर स्थापित करने में सक्षम रहे हैं?
अभी भारत में हिंदुस्तान नंबर 3 है, मैं चाहता हूं कि समाचार4मीडिया.कॉम में एक दिन छपे कि हिन्दुस्तान नंबर एक अखबार है। हम लोग एक छोटी सी नदी की लड़ाई करते हैं जो भूगोल के नक्शे में कहीं दिखायी भी नहीं देती । दिल्ली में बैठकर लोग राष्ट्रीय हो जाते हैं। उन्हें मालूम ही नहीं होता कि असल खबर तो गांवों से आती है। भारत एक गांवों का देश है और 70 % से अधिक आबादी गांवों में रहती है।  
 
कुछ हिन्दी अखबार, जैसे, दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण अपना आईपीओ लेकर आये। आप हिन्दी अखबारों के क्षेत्र में इस तरह के कदमों का क्या असर देखते हैं ?
आईपीओ की लिस्टिंग अच्छी बात है। हम भी लिस्टिंग के लिए जा रहे हैं। वह बाजार में सबके सामने है। अच्छा है, निष्पक्ष होकर काम करेंगे। 
 
हिन्दी अखबार देश में सबसे ज्यादा पढे़ जाते हैं फिर भी यह कहा जाता है कि यहाँ पैसे बहुत कम हैं। इसके मूल में विज्ञापन जगत की बेरुखी है या कुछ और कारण हैं ?
सितंबर 1980 में जब मैं बनारस में आज में काम करता था, उस समय से आज परिस्थिति में काफी बदलाव आये हैं। उस समय अधिकांशतः अखबार के मालिक गरीब थे। कई लोग सिर्फ मैट्रिक पास थे। अब नए लोग आ रहे है, इनके पास विजन है, नए विचार हैं, कुछ कर गुजरने की तमन्ना है। सारे अखबारों का प्रकाशन स्वतंत्रता संग्राम के समय शुरू हुआ था। उनके सामने राष्ट्रवाद का मुद्दा था, मैं आरएसएस के राष्ट्रवाद की बात नहीं कर रहा। उस समय उत्तर भारत के लोग काफी जागृत हुआ करते थे। हमने 30 सालों की लड़ाई लड़ी।
 
मैंने अमर-उजाला में जूनियर सब एडिटर का पद खत्म कराया। पहली बार कम से कम वेतन 13,000 रुपये फिक्स कराये। इसकी कोई चर्चा नहीं करता है। हमने यह व्यवस्था की कि जो पत्रकार काम करते हैं, पहले उनका पेट भरा होना चाहिए, उन्हें उचित पैसा मिलना चाहिए। देश के 5 बड़े अखबारों में 4 बड़े अखबार हिंदी के हैं। आगे चलकर हिंदी और अंग्रेजी में कोई फर्क नहीं रहेगा। भविष्य में हिंदी के पत्रकारों की स्थिति अंग्रेजी के पत्रकारों से अच्छी रहेगी। हिंदी विश्व में पाँचवीं या शायद तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। 
 
मंदी का असर भारत और चीन में कम रहा। हमने दुनिया को दिखा दिया कि हम किसी से कम नहीं हैं। मैं कई प्रधानमंत्रियों के साथ यूरोप और जापान गया हूं। यूरोप और जापान में निगेटिव ग्रोथ है। वहां के शासकों का कहना था कि आप हमें 10 लाख इंडियन दे दो, हम उन्हें अपनी भाषा सिखायेंगे। भारतीय काफी मेहनती और ईमानदार होते हैं। सिलिकॉन वैली का निर्माण एक दिन में नहीं हो गया, यह सब भारतीयों की लगातार मेहनत का फल है।     
 
विज्ञापन और मीडिया जगत की खबरें हिन्दी में दिखाने वाली वेबसाइट्स के भविष्य को आप कैसे देखते हैं?
हमें समाचार4मीडिया से बहुत उम्मीदें है। मुझे भवानी प्रसाद मिश्र की कविता इस अवसर पर याद आ रही है :
“जिस तरह तू घूमता है उस तरह तू दिख।
जिस तरह तू सोचता है उस तरह तू लिख।”
 
समाचार4मीडिया.कॉम से मुझे काफी उम्मीदें हैं। कुछ पोर्टल तो हिंदी में से हैं जिसमें लोग खाली गाली की भाषा का ही इस्तेमाल करते हैं। कुछ लोग बेरोजगार थे, उन्हें कुछ काम नहीं मिला तो उन्होंने हिंदी में इस तरह की वेबसाइट निकाल दी। लेकिन बड़ा काम यह किया कि उन्होंने हिंदी वाले लोगों को भी ऑनलाइन पढ़ने की आदत डाल दी। 1828 में हिंदी का पहला अखबार निकला, वह भी आज के ब्लॉग की तरह ही था। एक अंग्रेज ने तत्कालीन गवर्नर वारेन हेस्टिंगस से नाराज होकर अखबार का प्रकाशन शुरू किया था। उसे भारतीयों से कोई लगाव नहीं था, वह सिर्फ गवर्नर को अपनी नाराज़गी दिखाना चाहता था। मुझे समाचार4मीडिया.कॉम से काफी उम्मीदें हैं, मीडिया के लोग खुद अपनी खबरों से अनजान रहते हैं, उन्हें मीडिया जगत की सार्थक और गंभीर ख़बरें भी पढ़ने को मिलेंगी। इस अवसर पर मुझे साहिर लुधियानवी का गीत याद आता है, “जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला, हमने तो जब कलियां मांगीं, कांटों का हार मिला।” 
 
इस गाने को लुधियानवी जी ने कई लोगों को दिखाया, लेकिन सब ने उसे नकार दिया। इसी गाने पर जब गुरुदत्त की नज़र पड़ी तो प्यासा जैसी अनमोल फिल्म का निर्माण हुआ और यह गाना लोगों के दिलों में राज कर गया। मैं मानता हूँ कि हिंदी का भविष्य काफी उज्ज्वल है आने वाले समय में हिंदी क्षेत्र के लोगों की शिक्षा जैसे-जैसे बढ़ेगी हिंदी का और विस्तार होगा।
  • 04/09/2010
    नितिन, रेडियो जोकी, रेड एफएम   सबसे पहली प्रेरणा मुझे तब मिलती है जब मुझे हर महीने मेरी सैलरी का चेक मुझे दिया जाता है। (इट्स जोकिंग...) जब मेरे श्रोता मुझसे कहते है कि वो मुझे प्यार करते हैं और वे मुझे प्रत्येक सुबह सुनते हैं तो यह मुझे सबसे ज्यादा उत्साहित करता है। लेकिन सबसे ज्यादा आपको एनर्जी और गर्व तब होता है जब आपके काम के लिए आपको सम्मानित किया जाता है
  • 21/08/2010
    अनुषा रिज़वी, पत्रकार व फिल्म निर्देशिका
    भारतीय मीडिया के संवेदनहीन कैमरे से किसानों की खुदकुशी जैसी गंभीर समस्या को व्यंग्यात्मक शैली में दिखाकर ‘पीपली लाइव’ की निर्देशिका अनुषा रिज़वी ने पहली ही फिल्म से अपनी अलग पहचान गढ़ ली है। पत्रकारिता और फिल्म बनाने के अपने पहले अनुभव से लेकर तमाम दूसरे पहलुओं पर अनुषा रिज़वी से समाचार4मीडिया की खास बातचीत
  • 26/07/2010
    रजत शर्मा, चेयरमैन, इंडिया टीवी
    यह जनता की ही अदालत है और मैं जनता का ही वकील हूं. आपने देखा होगा कि मैं जो सवाल करता हूं वह एक संपादक की तरह या पत्रकार की तरह नहीं, बल्कि एक आम आदमी की तरह
    आपकी अदालत के सत्रह साल पूरे होने पर रजत शर्मा से समाचार4मीडिया की विशेष बातचीत
  • 08/07/2010

    राजीव वर्मा, सीईओ, एचटी मीडिया

    टीवी की दुनिया बहुत सीमित है और इसको बहुत कॉनसोलिडेशन की जरूरत है। और मुझे निकट भविष्य में ऐसा कुछ होता हुआ नहीं दिखाई दे रहा है। प्रिंट की दुनिया में अभी भी बहुत संभावनाए हैं
  • 28/06/2010

    विनोद कापड़ी, मैनेजिंग एडिटर, इंडिया टीवी         इंडिया टीवी की खासियत यह है कि वह खबरों को सबसे पहले समझ लेता है, लोग उसके बाद हमें फॉलो करते हैं। हमारी पहचान इसलिए है क्योंकि हम आम जनता से जुड़ी खबरें दिखाते हैं अपने सुख के लिए पंचायत नहीं बिठाते।

टिप्पणी

very nice

shashi shekhar ji ne amar ujala me vakai patrakaaron ke liye bahut kiya hai. Log ise yaad bhi karte hain. yahan ke log unhe pyar bhi karte hain. kuch logon ki baaton par na jayen shashi ji, mass apke saath ha......

Ji, aapne sahee kaha sandeep.

Ji, aapne sahee kaha sandeep. Shashi ji ek bade nam hain. Kuch ke role model bhi. Aise me kuch ka unse jalna swabhavik hai..but truly as far as I know he is a very nice person...